MP by Election 2020 : मुरैना में गुर्जर और दिमनी में ब्राह्मण वोटर्स तय करते हैं प्रत्याशियों की जीत

मुरैना में अवैध रेत खनन और दिमनी में बेरोज़गारी बड़ी समस्या है.
मुरैना में अवैध रेत खनन और दिमनी में बेरोज़गारी बड़ी समस्या है.

मुरैना ज़िले की मुरैना ((Morens)और दिमनी (Dimni) दोनों सीटें कांग्रेस के कब्ज़े में हैं. यहां चुनाव में स्थानीय मुद्दे गौण हैं, जातिगत समीकरण ही हार-जीत तय करते हैं.

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भोपाल. विधान सभा उपचुनाव (Assembly by electio) में बीजेपी हो या फिर कांग्रेस दोनों ही पार्टियों ने जातिगत समीकरण बैठाने की भरपूर कोशिश की है. खासतौर से ग्वालियर चंबल में जातिगत समीकरण ही प्रत्याशी के भविष्य का फैसला करते हैं. मुरैना (Morena) में गुर्जर और दिमनी विधान सभा क्षेत्र में ब्राह्मण वोटर्स पर प्रत्याशियों की जीत निर्भर रहती है.

मुरैना विधानसभा सीट पर सबसे ज्यादा मतदाता गुर्जर समुदाय के हैं. इसलिए यहां पर भाजपा और कांग्रेस दोनों गुर्जर समुदाय के प्रत्याशियों पर दांव लगाती हैं. इसके बाद दूसरे नंबर पर दलित वर्ग के मतदाता आते हैं. यहां कुल मतदाता 250298 हैं.इसमें पुरुष मतदाता 138279 और महिला मतदाता 112005, अन्य 14 हैं.

मुरैना सीट का जातिगत समीकरण
-गुर्जर - 56 हजार
-अनुसूचित जाति - 35 हजार


-ब्राह्मण - 30 हजार
-ठाकुर - 12 हजार
-वैश्य - 35 हजार

जातिगत समीकरण पर फोकस
यहां का स्थानीय मुद्दा अवैध रेत उत्खनन है. लेकिन बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही जातिगत समीकरण पर ज्यादा फोकस करते हैं. पिछले चुनाव में रघुराज सिंह कंसाना 20,849 वोट से जीते थे, जबकि बीजेपी के रुस्तम सिंह को हार का सामना करना पड़ा था. वैसे इस सीट पर रुस्तम सिंह का प्रभाव ज्यादा है लेकिन 2018 चुनाव में बसपा ने कांग्रेस को समर्थन दे दिया था इसलिए यहां का चुनावी गणित गड़बड़ा गया था.

सिंधिया के असर से जीत का दावा
एक जानकारी के अनुसार रघुराज कंसाना के कांग्रेस छोड़ने से कोई खासा फायदा बीजेपी को नहीं होगा. पिछले विधान सभा चुनाव 2018 में बसपा के चुनावी समीकरण के कारण ही कांग्रेस जीत पाई थी.रघुराज कंसाना की छवि का कोई खासा फायदा बीजेपी को नहीं मिलेगा. बीजेपी को नुकसान ज्यादा है, क्योंकि पूरे जिले में दलबदलू नेताओं का विरोध हो रहा है.इस बार उपचुनाव में भाजपा से रघुराज कंसाना और कांग्रेस से राकेश मावई मैदान में हैं. बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता रजनीश अग्रवाल ने कहा इस सीट पर सिंधिया का प्रभाव है.इसलिए यहां बीजेपी की जीत पक्की है. पार्टी ज्यादा फोकस जातिगत समीकरण पर नहीं करती है. लेकिन जनता की डिमांड पर कैंडिडेट का चुनाव होता है.

 दिमनी का समीकरण
मुरैना ज़िले की दूसरी विधानसभा सीट दिमनी है. इस विधान सभा क्षेत्र में क्षत्रीय राजपूतों के सर्वाधिक वोट हैं. इसके बाद इस विधानसभा इलाके में निर्णायक स्थिति में ब्राह्मण मतदाता हैं. दिमनी विधानसभा सीट में कुल मतदाता 211151हैं. इनमें पुरुष मतदाता 115857 और महिला मतदाता- 95288 और अन्य 6 हैं.

दिमनी सीट पर जातिगत समीकरण
-ठाकुर - 84 हजार
-ब्राह्मण - 20 हजार
-गुर्जर 12 हजार
-हरिजन 25 हजार
-यहां का रोजगार एक प्रमुख मुद्दा है. पिछले चुनाव में गिर्राज दंडोतिया 18,477 वोटों से जीते थे, जबकि बीजेपी के शिव मंगल सिंह तोमर को हार का सामना करना पड़ा था. वैसे दिमनी बीजेपी की परंपरागत सीट रही है. लेकिन 2013 में बसपा के बलबीर दंडोतिया ने दिमनी सीट जीत ली थी. उसके बाद 2018 में कांग्रेस के गिर्राज दंडोतिया चुने गए. दंडोतिया के दल बदलने से लोगों में आक्रोश है. जिसका सामना उपचुनाव में बीजेपी को करना पड़ रहा है. अब इस बार उपचुनाव में भाजपा से गिर्राज दंडोतिया और कांग्रेस से रविन्द्र सिंह तोमर मैदान में हैं. कांग्रेस नेता भूपेंद्र गुप्ता का कहना है मुरैना जिले की पूरी पांचों सीटें कांग्रेस ने जीती थीं. ऐसे में भले ही सिंधिया बीजेपी में चले गए हों लेकिन उनका असर अब इन सीटों पर नहीं चलेगा.

वोट में बदल पाएगा जनता का आक्रोश
ये कांग्रेस के कर्जमाफी का असर था या सिंधिया का प्रभाव जो भी कहें लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव 2018 में ग्वालियर-चंबल इलाके की 16 सीटें कांग्रेस ने जीती थीं. इस बार दल बदलने से जनता में गुस्सा तो है लेकिन क्या गुस्सा वोट में बदल पाएगा.
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