लोकसभा चुनाव 2019: विदिशा सीट- जो बीजेपी नेताओं ने एक-दूसरे को गिफ्ट में दी
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लोकसभा चुनाव 2019: विदिशा सीट- जो बीजेपी नेताओं ने एक-दूसरे को गिफ्ट में दी
फाइल फोटो.

लोकसभा क्षेत्र में सांची और विदिशा छोड़कर बाकी की 6 विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्ज़ा है. यहां दो बार से सांसद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज रही हैं.

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विदिशा लोकसभा सीट एकलौती ऐसी सीट है, जो बीजेपी नेताओं ने एक-दूसरे को गिफ्ट की है. ये सीट पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने शिवराज सिंह चौहान को सौंपी थी. सीएम बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने इस सीट को सुषमा स्वराज को गिफ्ट में दिया था. अब सुषमा स्वराज ने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला लिया है ऐसे में शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह इस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं.

विदिशा लोकसभा सीट में 4 जिले रायसेन, विदिशा, सीहोर और देवास आते हैं. इस संसदीय सीट में 8 विधानसभा क्षेत्र हैं. इनमें रायसेन की-भोजपुर-सांची-सिलवानी, विदिशा ज़िले की- विदिशा और गंजबासौदा, सीहोर जिले की बुधनी-इछावर और देवास जिले की खातेगांव सीट आती हैं.

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लोकसभा क्षेत्र में सांची और विदिशा छोड़कर बाकी की 6 विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्ज़ा है. यहां दो बार से सांसद विदेश मंत्री सुषमा स्वराज हैं. स्वराज ने 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता लक्ष्मण सिंह को 41, 06,98 वोटों से हराया था. इस क्षेत्र की जनसंख्या 25 लाख 35 हजार 632 है. इसमें से 76 प्रतिशत लोग गांवों में और 23 प्रतिशत शहर में रहते हैं. 88 प्रतिशत आबादी हिंदू धर्म और 10 प्रतिशत लोग इस्लाम धर्म से हैं.
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विदिशा संसदीय क्षेत्र एतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है.इसे हिंदू,बौद्ध और जैन धर्म के समृद्ध केन्द्र के रूप में जाना जाता है. बौद्ध स्तूप का केंद्र सांची यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज में है. और अब विदिशा से नयी अंतर्राष्ट्रीय पहचान जड़ गयी है. शांति का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले कैलाश सत्यार्थी विदिशा के ही हैं. विदिशा संसदीय क्षेत्र 1967 में अस्तित्व में आया था.

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यहां पहले ही लोकसभा चुनाव में जनसंघ ने जीत का परचम लहराया था और पंडित शिव शर्मा यहां से पहले सांसद बने थे. उसके बाद 1971 के चुनाव में भी विदिशा में भगवा पताका फहराई लेकिन 1977 का चुनाव यहां से जनता पार्टी ने जीता.इसके बाद 1980 और 1984 के चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली. उसके बाद 1989 में यहां भाजपा की जीत हुई और तब से लेकर आज तक केवल यहां भाजपा का राज रहा है.

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साल 1991 के चुनाव में देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी इस सीट से जीते. अटल बिहारी ने उस साल विदिशा के साथ-साथ लखनऊ से भी चुनाव लड़ा था. वो दोनों जगह से विजयी हुए थे. उन्होंने लखनऊ को चुना और विदिशा को छोड़ दिया था.इसी वजह से बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान को विदिशा से उपचुनाव लड़ाया और शिवराज सिंह चौहान 1991 से लेकर 2005 तक विदिशा से सांसद रहे.
मध्य प्रदेश के सीएम बनने के बाद शिवराज सिंह को लोकसभा सीट से इस्तीफा देना पड़ा. उस वक्त हुए उपचुनाव में बीजेपी के रामपाल सिंह यहां से सांसद बने.साल 2009 के चुनाव में सुषमा स्वराज यहां भाग्य आजमाने आयीं और जीत गयी. 2014 में फिर से सुषमा स्वराज ही यहां से चुनी गयीं.

फाइल फोटो- अटल बिहारी वाजपेयी


विदिशा संसदीय सीट पर कांग्रेस अरसे से जीत के लिए तरस रही है. हालांकि इस बार विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद उसका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ है. साल 1977 से लगातार जीतती आ रही विदिशा विधानसभा सीट पर इस बार कांग्रेस ने बड़ी जीत दर्ज की है. लेकिन बीजेपी इस सीट को सुरक्षित मानती है. इस बार स्वास्थ्य कारणों से सुषमा स्वराज अब चुनाव ना लड़ने का एळान कर चुकी हैं. इलाके से शिवराज और साधना सिंह के गहरे रिश्ते और सक्रियता के कारण इस बार अटकलें हैं कि साधना सिंह को यहां से दावा जता सकती हैं. हालांकि टिकट सुषमा स्वराज की पसंद को ही दिया जाएगा.

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