Lok Sabha Election Result 2019 : MP में ऐसी चली सुनामी कि कांग्रेस के किले भी नहीं बच पाए
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Lok Sabha Election Result 2019 : MP में ऐसी चली सुनामी कि कांग्रेस के किले भी नहीं बच पाए
प्रधानमंत्री मोदी

जनता ने लोकल मुद्दों से ऊपर उठकर मोदी के नाम पर वोट दिया. जात-पात या हिंदुत्व के बजाए राष्ट्रवाद और सर्जिकल स्ट्राइक उसके जेहन में रही. रफेल और चौकीदार के मुद्दे उसके लिए गौण थे.

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लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में भी मोदी मैजिक चला. बीजेपी 28-1 से क्लीन स्वीप कर गयी. 28 पर बीजेपी और सिर्फ एक पर कांग्रेस जीत पायी. कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया. मोदी की इस सूनामी में सिंधिया घराने की परंपरागत सीट गुना-शिवपुरी भी नहीं बच पायी. ऐसा तो 2014 की मोदी लहर में भी नहीं हुआ था. उस वक्त गुना-शिवपुरी और छिंदवाड़ा कांग्रेस के पास बनी रही थीं. बाद में रतलाम झाबुआ सीट भी उपचुनाव में आ गयी थी. लेकिन इस बार सिर्फ और सिर्फ सीएम कमलनाथ के इलाके छिंदवाड़ा की सीट कांग्रेस बचा पायी. इस सीट से कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ 37 हज़ार 536 वोट से जीत पाए.

प्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में से बीजेपी 28 पर जीत गयी. कांग्रेस सिर्फ कमलनाथ का गढ़ छिंदवाड़ा बचा पाई है. सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नतीजा गुना लोकसभा सीट पर देखने को मिला जहां सिंधिया का किला ध्वस्त हो गया.

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छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर कांग्रेस की तरफ से उतरे कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ ने जीत हासिल की है उन्होंने बीजेपी के नत्थन शाह को हराया है. इसके अलावा छिंदवाड़ा से ही विधानसभा उपचुनाव लड़ रहे मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जीत हासिल की है.
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पूरे मध्य प्रदेश में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम हर तरफ कमल की जीत हुई. भोपाल लोकसभा सीट, जो इस बार मध्य प्रदेश ही नहीं पूरे देश में चर्चा का विषय थी, वहां प्रज्ञा ठाकुर ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को साढ़े तीन लाख से ज़्यादा वोट से हरा दिया. जबलपुर में बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह ने कांग्रेस के विवेक तन्खा को, खंडवा में नंद कुमार सिंह चौहान ने अरुण यादव को, नरेन्द्र सिंह तोमर ने राम निवास रावत को, सीधी में रीति पाठक ने अजय सिंह को भारी मतों के अंतर से परास्त कर दिया. इंदौर में ताई की सीट पर शंकर लालवानी ने बीजेपी की पताका नीचे नहीं होने दी. उन्होंने पंकज संघवी को मात दी.

विदिशा से सुषमा स्वराज की जगह अब बीजेपी के रमाकांत भार्गव संसद में प्रतिनिधित्व करेंगे. ये सीट अटल बिहारी वाजपेयी और सुषमा स्वराज को संसद भेज चुकी है. राजगढ़ की दिग्विजय सिंह के परिवार के दबदबे वाली सीट इस बार भी बीजेपी के पास चली गयी. रोडमल नागरने यहां मोना सुस्तानी को हरा दिया. बैतूल में दुर्गादास उइके कांग्रेस के रामू टेकाम पर भारी पड़े. उज्जैन में अनिल फिरोजिया, रतलाम में गुमान सिंह डामोर चुनाव जीत गए. मंदसौर में मीनाक्षी नटराजन फिर बीजेपी के सुधीर गुप्ता से बाज़ी हार गयीं.

मध्य प्रदेश के हर इलाके विंध्य, महाकौशल, ग्वालियर-चंबल, मध्य भारत और मालवा में बीजेपी अच्छे खासे अंतर से जीती. जबकि नवंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में ही कांग्रेस हर इलाके में जीती थी.  3  महीने में हुए इस उलट-फेर की कल्पना खुद बीजेपी को भी नहीं थी. हर इलाके में सिटिंग एमपी के खिलाफ एंटी इंकम्बेसी थी. अतंर्कलह सामने आ रही थी. टिकट वितरण को लेकर विरोध था. गुटबाज़ी ज़बरदस्त थी. अनुमान था कि कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन करेगी. एग्जिट पोल के नतीजे भी कांग्रेस को सिर्फ 2 सीटें प्रदेश में दिलाते रहे. लेकिन फिर भी ऐसी कामयाबी की ना तो बीजेपी को उम्मीद थी और ना ऐसी विफलता का अनुमान कांग्रेस को था.

एक नज़र चुनाव परिणाम पर 

1-सीधी - रीति पाठक
2-शहडोल- हेमाद्रि सिंह
3-जबलपुर -राकेश सिंह
4-मंडला - फग्गन सिंह कुलस्ते
5-बालाघाट- ढाल सिंह बिसेन
6-छिंदवाड़ा- नकुल नाथ- कांग्रेस
7-टीकमगढ़- डॉ वीरेन्द्र सिंह
8-दमोह - प्रह्लाद पटेल
9-खजुराहो - वी डी शर्मा
10-सतना -गणेश सिंह
11-रीवा - जनार्दन मिश्रा
12-होशंगाबाद - राव उदय प्रताप सिंह
13-बैतूल- दुर्गादास उइके
14-मुरैना - नरेन्द्र सिंह तोमर
15- भिंड- संध्या राय
16-ग्वालियर - विवेक शेजवलकर
17-गुना - के पी यादव
18-सागर - राज बहादुर सिंह
19-विदिशा - रमाकांत भार्गव
20-भोपाल - प्रज्ञा सिंह ठाकुर
21-राजगढ़ - रो़डमल नागर
22- देवास- महेन्द्र सिंह सोलंकी
23- उज्जैन - अनिल फिरोजिया
24- मंदसौर - सुधीर गुप्ता
25- रतलाम- गुमान सिंह डामोर
26-धार - छतर सिंह
27-इंदौर - शंकल लालवानी
28-खरगोन - गजेन्द्र उमराव सिंह पटेल
29-खंडवा - नंद कुमार सिंह चौहान

मध्य प्रदेश में बीजेपी की इस प्रचंड जीत की अब तक यही वजह समझ आती है कि जनता ने लोकल मुद्दों से ऊपर उठकर मोदी के नाम पर वोट दिया. जात-पात या हिंदुत्व के बजाए राष्ट्रवाद और सर्जिकल स्ट्राइक उसके जेहन में रही.  रफेल और चौकीदार के मुद्दे उसके लिए गौण थे. कांग्रेस न्याय योजना का संदेश जनता तक नहीं पहुंचा पायी. विधान सभा चुनाव में पड़े वोट वो 3 महीने भी अपने पक्ष में नहीं रख पायी.

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