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Kargil Vijay Diwas: 22 साल बाद भी अधूरी है मूर्ति की आस, पिता को लगता है पास ही है बेटा

शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता आरएन प्रसाद और मां आज भी बेटे को याद करते हैं.

शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता आरएन प्रसाद और मां आज भी बेटे को याद करते हैं.

Madhya Pradesh News: पिता आरएन प्रसाद और मां आज भी शहीद बेटे को याद करते हैं. उनकी यादें आज भी ताजा हैं. हर पल बस यही लगता है कि वो अभी भी यहीं है, हमारे साथ. अजय लाखों में एक थे.

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भोपाल. शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता आरएन प्रसाद और मां अब भोपाल में एकाकी जीवन जी रहे हैं. कारगिल युद्ध को 22 साल बीतने के बाद भी अपने शहीद बेटे की हर बात उन्हें कल की घटना की तरह याद है. मेजर अजय प्रसाद के पिता का कहना है कि अजय ने हर मिशन में भारत का झंडा बुलंद किया. काश अगर आज अजय जिंदा होता तो हम कभी अकेले नहीं होते.

मेजर अजय प्रसाद के पिता का कहना है कि अजय को शहीद हुए 22 साल बीत गए. लेकिन, उनकी यादें आज भी ताजा हैं. हर पल बस यही लगता है कि वो अभी भी यहीं है, हमारे साथ. अजय लाखों में एक थे. अजय जैसा बेटा होना मुश्किल है. वो अलग ही व्यक्ति थे.बचपन से ही कुशाग्र, मिलनसार और खुशमिजाज. वो कभी किसी को दुखी नहीं देख सकते थे. अजय जब भी घर आते थे तो पूरा घर खुशियों और हंसी-ठिठौली से भर उठता था.अजय होते तो हम कभी उदास ही नहीं होते. पिता ने कहा- बेटा मुझे हर छोटी से छोटी बात की जानकारी देता था.उस समय टेलीफोन नहीं हुआ करते थे, उस वक्त भी किसी भी मिशन से पहले  या पोस्टिंग से पहले टेलिफोन बूथ पर जाकर फोन जरूर करता था. अजय अगर आज जिंदा होता तो हम कभी अकेले नहीं होते.

अजय ने हर चुनौती का सामना किया

शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता आरएन प्रसाद का कहना है कि अजय 1986 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पास आउट होने के बाद मैकेनाइज्ड इंफेंट्री बटालियन में शामिल हुए. कमीशन के साथ ही कई जगह पोस्टिंग हुई. अजय को हमेशा चुनौतीपूर्ण मिशन पर भेजा गया और हर मिशन में उन्हें सफलता मिली. अजय को उल्फा उग्रवादियों से निपटने असम राइफल्स भेजा गया. उग्रवादियों को ढेर करने के बाद  ही अजय शांति सेना के साथ श्रीलंका चले गए.शांति सेना के साथ उन्होंने 1988 में LTTE का डटकर मुकाबला किया. अजय ने तीन बार कमाण्डो ट्रेनिंग भी ली थी. अजय को हर मिशन में सफलता मिली.

जब अजय का हुआ था विरोध

शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता ने असम राइफल्स में पोस्टिंग के दौरान चुनौतीपूर्ण किस्सा सुनाया. उन्होंन बताया- अजय को असम रायफल्स में शामिल कर म्यामांर बॉर्डर पर भेजा गया था. वहां उन दिनों उल्फा उग्रवादियों का आंतक हुआ करता था. एक रात आर्मी ने गांव वालों से लाइट ऑफ करने को कहा. लगातार तीन अलग-अलग भाषाओं में इसकी घोषणा की गई. लेकिन, एक घर की लाइट लगातार जलती रही. उसके बाद आर्मी ने उस घर पर हमला बोला और एक लड़की को शूट कर दिया गया. इसके बाद स्थानीय लोगों ने अजय का काफी विरोध किया. अजय जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में पहुंचे तब लोगों ने काफी शोर मचाया. उस वक्त अजय ने कहा- जब आप सभी विरोध करना बंद करेंगे तभी मैं बोलूंगा. जब एक छुट्टी पर जाने वाले मेजर की हत्या कर दी गई तब आप गांववालों ने विरोध क्यों नहीं किया. आज जब आतंकवादी लड़की को शूट किया गया तो आप सभी इतना विरोध क्यों कर रहे हैं. अगर आप सभी उस आतंकवादी लड़की का विरोध कर रहे हैं तो आप भी आतंकवादी हैं. इतना बोलने के बाद लोगों ने अजय का विरोध करना बंद कर दिया.

सरकार की बेरुखी से दुखी पिता

शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता सरकार की बेरुखी से बेहद नाराज हैं. पिता का कहना है कि बेटा देश के लिए शहीद हो गया. शहीद बेटे के नाम पर सड़क का नाम रखा गया, पार्क का नाम रखा गया लेकिन आज दोनों जगह से नोटिस बोर्ड गायब हैं. देखने वाला कोई नहीं. अब तक सरकार ने शहीद के नाम की मूर्ति तक नहीं लगाई. हर बार सिर्फ बजट का रोना रोया जाता है. शहीद के परिवारों की भी सरकार सुध नहीं लेती, न ही कभी याद करती है.

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