Opinion : MP में नहीं चल पाया सोनिया गांधी का ट्रंप कार्ड, कहां चूक रहे हैं मुकुल वासनिक!
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Opinion : MP में नहीं चल पाया सोनिया गांधी का ट्रंप कार्ड, कहां चूक रहे हैं मुकुल वासनिक!
संगठन को मजबूती और नेताओं के बीच समन्वय में भी वासनिक फेल साबित हुए हैं

संगठन स्तर पर लंबा अनुभव रखने वाले मुकुल वासनिक (mukul vasnik) की तैनाती प्रदेश में इसलिए की गई थी ताकि कमजोर होती पार्टी को मजबूती दी जा सके. लेकिन वासनिक के प्रदेश प्रभारी बनाए जाने के बाद भी कांग्रेस (congress) में बिखराव तेजी के साथ हुआ

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  • Last Updated: July 29, 2020, 10:49 AM IST
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भोपाल. 2018 के चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतकर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनी कांग्रेस (Congress) अब विधायकों की कम होती संख्या के कारण सिमटती जा रही है. प्रदेश में सत्ता गंवाने के बाद उप चुनाव (by election) की तैयारी को लेकर पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी (sonia gandhi) के करीबी मुकुल वासनिक भी कोई कमाल नहीं दिखा पाए. प्रदेश में विधायकों को साधने से लेकर संगठन को मजबूती देने में सोनिया गांधी का ट्रंप कार्ड प्रदेश में फेल होता दिख रहा है.

संगठन स्तर पर लंबा अनुभव रखने वाले मुकुल वासनिक की तैनाती प्रदेश में इसलिए की गई थी ताकि कमजोर होती पार्टी को मजबूती दी जा सके. लेकिन वासनिक के प्रदेश प्रभारी बनाए जाने के बाद भी कांग्रेस में बिखराव तेजी के साथ हुआ. प्रदेश में कांग्रेस विधायक दल की बैठक में शामिल होने के बाद भी वासनिक का असर विधायकों पर नहीं हुआ. वासनिक की नियुक्ति के बाद भी 3 विधायकों ने दल बदल कर पूरी पार्टी को चौंका दिया.

कहां पर फेल हुए मुकुल वासनिक
कमलनाथ सरकार के खिलाफ सिंधिया समर्थक 18 विधायकों के साथ कुल 22 विधायकों की बगावत पर डैमेज कंट्रोल की जिम्मेदारी उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक को दी गई थी. लेकिन यह दोनों नेता विधायकों को मनाने में नाकाम रहे. आलम यह रहा कि कांग्रेस के हाथ से सत्ता चली गयी.
रणनीति पर मंथन


इसके बाद प्रदेश दौरे पर आए प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक ने विधायकों के साथ बैठक कर उपचुनाव की रणनीति पर मंथन किया. लेकिन उसके बाद भी विधायकों ने दल बदल कर बीजेपी का दामन थाम लिया.वासनिक के प्रदेश प्रभारी बनने के बाद बड़ी संख्या में कांग्रेसियों ने दल बदल कर बीजेपी का झंडा थाम लिया.

दोनों मोर्चों पर नाकाम
संगठन को मजबूती और नेताओं के बीच समन्वय में भी वासनिक फेल साबित हुए हैं.पार्टी में बुजुर्ग और युवा नेताओं के बीच तालमेल बैठाने में भी वासनिक कोई कमाल नहीं दिखा पाए.उनके प्रदेश प्रभारी बनने के बाद पार्टी की अंतर्कलह भी उभर कर सामने आने लगी है. पूर्व मंत्री उमंग सिंघार, डॉक्टर गोविंद सिंह से लेकर पार्टी के कई नेता खुलकर बयान बाजी के जरिए पार्टी की नीति नीति पर सवाल उठा चुके हैं.

सोनिया गांधी के करीबी मुकुल वासनिक को संगठन का अनुभवी माना जाता है. यही कारण है कि केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के साथ ही वासनिक को मध्य प्रदेश का प्रभारी बनाकर अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है. लेकिन 3 महीने बाद भी प्रदेश प्रभारी वासनिक प्रदेश में अपनी पकड़ नहीं बना पाए हैं. कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के प्रभाव के आगे वासनिक, संगठन को मजबूती देने के लिए अब तक कोई बड़ा फैसला नहीं कर पाए हैं. इससे पहले प्रदेश प्रभारी रहे दीपक बाबरिया भी राहुल गांधी के करीबी थे. पार्टी में नए प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक की क्षमताओं को लेकर सवाल उठना शुरू हो गया है जो उपचुनाव से पहले कांग्रेस के लिए नयी मुश्किल खड़ी करने वाला है.
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