Analysis : बीजेपी में CM पद के इतने दावेदार कि अपनी कुर्सी के लिए निश्चिंत हैं कमलनाथ

राज्य भाजपा में ही मुख्यमंत्री पद के अनेक दावेदार होने के कारण कमलनाथ सरकार गिराने को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है

Dinesh Gupta | News18 Madhya Pradesh
Updated: July 24, 2019, 7:01 PM IST
Analysis :  बीजेपी में CM पद के इतने दावेदार कि अपनी कुर्सी के लिए निश्चिंत हैं कमलनाथ
अपने मंत्रियों के साथ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ
Dinesh Gupta
Dinesh Gupta | News18 Madhya Pradesh
Updated: July 24, 2019, 7:01 PM IST
मध्यप्रदेश में अन्य पिछ़ड़ा वर्ग (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का बिल विधानसभा में पास होने के बाद भी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है कि राज्यपाल इसे आसानी से मंजूर कर लेंगे. ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित किए जाने के बाद राज्य में आरक्षण, अधिकतम पचास प्रतिशत की सीमा को पार कर गया है. आक्षण 73 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर है. इसमें दस प्रतिशत आरक्षण सवर्ण निर्धनों का भी है.
ओबीसी के आरक्षण में वृद्धि को मुख्यमंत्री कमलनाथ के बड़े राजनीतिक दांव के तौर पर देखा जा रहा है. लोकसभा चुनाव के ठीक पहले कमलनाथ सरकार ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी का आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 फीसद करने का अध्यादेश जारी किया था. हालांकि उसके अमल पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी.

ओबीसी की आबादी पर विवाद की स्थिति

अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को चौदह प्रतिशत के स्थान पर 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने वाला विधेयक मंगलवार को राज्य विधानसभा में बगैर किसी विरोध के पारित हो गया. भारतीय जनता पार्टी ने भी इस विधेयक का पूरा समर्थन किया. यद्यपि प्रतिपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने यह टिप्पणी जरूर की कि अदालत में रोक का सवाल तो तब आएगा जब राज्यपाल इस कानून को मंजूर कर लेंगे? भार्गव को भरोसा है कि राज्यपाल इस विधेयक को कानून के तौर पर मंजूर नहीं करेंगे. इस विधेयक का भविष्य लालजी टंडन के राज्यपाल के तौर पर शपथ लेने के बाद ही तय होगा. टंडन को आनंदी बेन पटेल के स्थान पर राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया गया है. वे 29 जुलाई को कार्यभार ग्रहण करेंगे.

कानूनी पहलू भी देखने हैं

राज्य के संसदीय कार्य एवं सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री डॉ. गोविंद सिंह ने स्वीकार किया कि हाईकोर्ट ने ओबीसी का आरक्षण 27 प्रतिशत किए जाने संबंधी अध्यादेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा रखी है. डॉ. सिंह ने दावा किया कि सरकार, सभी कानूनी पहलुओं पर विचार किए जाने के बाद ही आरक्षण बढ़ाए जाने का विधेयक लाई है. राज्य में अभी ओबीसी को चौदह प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है. आरक्षण की सीमा में वृद्धि आबादी को आधार मानकर की गई है. कांगे्रस के विधायक कुणाल चौधरी कहते हैं कि राज्य में ओबीसी की आाबदी 54 प्रतिशत के आसपास है. विधायक प्रदीप पटेल कहते हैं कि ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की सीमा मंडल कमीशन से निर्धारित हुई. जबकि मध्यप्रदेश में पैंतीस प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए था.

भाजपा विधायक डॉ.मोहन यादव कहते हैं कि ओबीसी का आरक्षण इस वर्ग पर कोई अहसान नहीं है,यह एक सामाजिक क्रंाति है. राज्य में ओबीसी को आरक्षण दिए जाने के लिए सितंबर 1980 में रामजी महाजन की अध्यक्षता में एक आयोग गठित किया गया था. इस आयोग की अनुशंसाओं के आधार पर 89 जातियों और उनकी उपजातियों को परंपरागत व्यवसाय के आधार ओबीसी की सूची में रखा गया है. महाजन आयोग, राज्य में ओबीसी की आबादी के बारे में कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं कर सका था. इसके बावजूद यह माना जाता है कि राज्य में 52 से लेकर 54 प्रतिशत आबादी ओबीसी की है. राज्य में अनुसूचित जाति की आबादी 16 और जनजाति की आबादी बीस प्रतिशत है. इन दोनों वर्गों को कुल 36 प्रतिशत आरक्षण लंबे समय से दिया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की अधिकतम सीमा पचास प्रतिशत रखे जाने के कारण ही राज्य में चौदह प्रतिशत आरक्षण ओबीसी को दिया जा रहा था. राज्य के सामान्य प्रशासन मंत्री डॉ.गोविंद सिंह कहते हैं कि आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में अनुसरण कर ही मध्यप्रदेश में आरक्षण की सीमा बढ़ाई गई है. कर्नाटक में कुल आरक्षण 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है.
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कमलनाथ फिलहाल निश्चिंत CM Kamalnath is not worried
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने मध्य प्रदेश सरकार के गिरने पर बयान दिया, लेकिन मुख्यमंत्री कमलनाथ फिलहाल निश्चिंत हैं


कर्नाटक मॉडल की राजनीति से बच पाएगी सत्ता?

ओबीसी का आरक्षण बढ़ाए जाने के पीछे एक बड़ी वजह सरकार के भविष्य पर लग रहे सवालिया निशान को भी माना जा रहा है. यह माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ सरकार अपना बहुमत साबित करने के लिए ही आरक्षण की सीमा बढ़ाए जाने संबंधी विधेयक को विधानसभा में लाई थी. कमलनाथ की रणनीति सफल भी रही. वोटों की राजनीति के चलते भारतीय जनता पार्टी को भी इस विधेयक का समर्थन करना पड़ा. भाजपा ने इस विधेयक में कोई संशोधन प्रस्ताव भी नहीं दिया था. जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अति पिछड़ा वर्ग को विशेष आरक्षण दिए जाने के पक्ष में हैं. कर्नाटक के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद यह माना जा रहा है कि अगली बारी मध्यप्रदेश की कमलनाथ सरकार की है. राज्य में कमलनाथ की सरकार बसपा और सपा के समर्थन से चल रही है. सरकार के पास साधारण बहुमत है. विधानसभा के चुनाव में कांगे्रस को सिर्फ 114 सीटें मिलीं थीं. जबकि उसे साधारण बहुमत से सरकार बनाने के लिए 116 सीटों की जरूरत थी. कमलनाथ ने कांगे्रस से बगाबत कर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीते प्रदीप जायसवाल को मंत्री बनाकर अपनी सरकार को बचाकर रखा हुआ है. बसपा विधायक राम बाई सरकार पर लगातार दबाव बनाए रहतीं हैं. निर्दलीय विधायक सुरेन्द्र सिंह शेरा भी मंत्री बनने के लिए कमलनाथ पर दबाव बनाए हुए हैं. कांगे्रस के विधायक भी कमलनाथ सरकार की कार्यशैली से नाराज बताए जा रहे हैं. भाजपा,राज्य की कांगे्रस सरकार को गिराने के लिए कर्नाटक मॉडल पर ही काम कर रही है. राज्य में भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की संख्या 108 है. खुद को सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर उभारने के लिए यह जरूरी होगा कि कांगे्रस के कम से कम सात विधायक इस्तीफा दें.

कमलनाथ को मिल रहा है भाजपा की गुटबाजी का लाभ

प्रतिपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने राज्य विधानसभा में स्पष्ट तौर पर कहा कि सरकार गिराने के लिए नंबर एक और नंबर दो के आदेश का इंतजार किया जा रहा है. उनका आदेश मिलते ही चौबीस घंटे के भीतर सरकार गिर जाएगी. नंबर एक और नंबर दो से उनका आशय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह है. भार्गव के इस बयान के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि भाजपा में हिम्मत है तो अविश्वास प्रस्ताव ले आए. दरअसल राज्य भाजपा में ही मुख्यमंत्री पद के अनेक दावेदार होने के कारण सरकार के गिराने को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री की कुर्सी का स्वभाविक दावेदार माना जा रहा है. शिवराज सिंह चौहान के बयान भी इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि उन्हें सरकार गिराने की जल्दी है. शिवराज सिंह चौहान को घेरने के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ उनसे जुड़े व्यापमं घोटाले की नए सिरे से जांच की बात कर रही है. शिवराज सिंह चौहान के पक्ष में अमित शाह भी नहीं बताए जा रहे. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और पूर्व मंत्री नरोत्त्म मिश्रा भी मुख्यमंत्री पद की लाइन में हैं. प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह का समर्थन भी शिवराज सिंह चौहान के साथ नहीं है. यही कारण है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी सरकार के भविष्य को लेकर फिलहाल आश्वस्त हैं.

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First published: July 24, 2019, 3:28 PM IST
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