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ANALYSIS: MP में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं 'दिग्गी राजा' ने भी की है धमाकेदार वापसी

ANALYSIS: MP में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं 'दिग्गी राजा' ने भी की है धमाकेदार वापसी

(File photo)

(File photo)

दिग्विजय सिंह की 'नर्मदा परिक्रमा' ने भी कांग्रेस को जनता से जोड़ने में मदद की.

मध्य प्रदेश में 2018 में केवल कांग्रेस की सत्ता में वापसी नहीं हुई है, बल्कि दिग्विजय सिंह की भी धमाकेदार वापसी हुई है, जिन्हें एक समय पर एमपी कांग्रेस के पर्याय या फिर एक बड़े नाम के रूप देखा जाता था.

एमपी इकाई में कई बार गुटबाजी का आरोप भी दिग्विजय पर लगा, लेकिन दो बार सीएम रहे दिग्विजय ने इसे पूरी तरह से बदलते हुए सभी गुटों को एक साथ लाकर कमलनाथ के पीछे मजबूती से खड़ा कर दिया. उनकी 'नर्मदा परिक्रमा' ने भी कांग्रेस को जनता से जोड़ने में मदद की, जो कि पिछले दस सालों में नहीं हुआ था. एक पुरानी कहावत यहां साबित होती है कि- आप उसे प्यार करें या नफरत लेकिन नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं.

टिकट बंटवारे के बाद फैले असंतोष से लेकर पार्टी के बागियों को वापस लाने तक दिग्विजय की मध्‍य प्रदेश के चुनावी संग्राम में भूमिका महत्वपूर्ण रही. सरकार के गठन के बाद 'दिग्गी राजा' वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति में सक्रिय हैं और अब ऐसा अनुमान है कि कैबिनेट गठन में भी उनकी बात मानी जाएगी.

2003 में उमा भारती की अगुवाई वाली बीजेपी से मिली करारी हार के बाद दिग्विजय एमपी की राजनीति से अज्ञातवास में चले गए थे. चुनावों से ठीक पहले उन्होंने संकल्प लिया था कि अगर 2003 का चुनाव कांग्रेस हार गई तो वह दस साल तक राज्‍य में कोई पद नहीं लेंगे.

इसके बाद वे दिल्ली चले गए और उन्हें पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया, लेकिन 2017 में राघोगढ़ के महाराजा के लिए चीजें बदल गईं और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दिग्विजय को गोवा और कर्नाटक के चुनाव प्रभारी के रूप में दी गई जिम्मेदारियों से हटा दिया और उस साल अगस्त में ही उन्हें तेलंगाना प्रभारी का पद भी गंवाना पड़ा था. इस फैसले ने पार्टी में कई लोगों को चौंका दिया क्योंकि उन्हें नेहरू-गांधी परिवार के सबसे भरोसेमंद व्यक्तियों में से एक माना जाता था.

इन सबके बीच उन्होंने अपने गृह प्रदेश में वापसी की और जैसा कि उनके भाई लक्ष्मण सिंह उनके लिए कहते हैं, 'आप दिग्विजय को राजनीति से अलग नहीं कर सकते क्योंकि वह उसी में सांस लेते हैं, उसे ही पीते हैं और उसी में सोते हैं.'

लेकिन एमपी अब उनके लिए इतना आसान नहीं था. शिवराज सिंह चौहान एक लोकप्रिय सीएम थे और दिग्विजय बीजेपी के एक पसंदीदा पंचिंग बैग बन गए थे और हर बार उन्हें राज्य की दुर्दशा के लिए दोषी ठहराते थे और उन्हें 'श्रीमान बंटाधार' कहते थे.

बीजेपी ने उन्हें 'अल्पसंख्यक तुष्टिकरण' के लिए भी निशाना बनाया. इन सब के बीच दिग्विजय ने सावधानी रखते हुए नर्मदा परिक्रमा की शुरुआत की और इसे 'गैर राजनीतिक और आध्यात्मिक यात्रा' बताया. उन्होंने कहा कि वह न तो राजनीति के बारे में बात करेंगे और न ही ट्वीट करेंगे. वह सोशल मीडिया पर लोगों के लोकप्रिय बनें और ट्विटर पर उनके करीब 8 लाख फॉलोअर्स हैं.

उनकी इस यात्रा में भारी भीड़ जुटाई और कई कांग्रेसी उनकी वापसी को लेकर चिंतित हो गए. शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के आशीर्वाद के साथ यह यात्रा नौ अप्रैल को नरसिंहपुर में खत्म हुई.

हालांकि, उनकी यात्रा ने उन्हें एमपी की राजनीति में प्रमुखता से वापस ला दिया और अटकलें लगाईं जाने लगीं कि वे सीएम के दावेदार हो सकते हैं. लेकिन दिग्विजय सिंह ने खुद घोषणा कर दी कि वे किसी भी पद की लालसा नहीं रखते और पार्टी के भीतर एकता के लिए काम करना चाहते हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम जब सीएम पद के लिए सबसे आगे था और ऐसी खबरें थीं कि कमलनाथ भी इसके लिए तैयार थे. लेकिन दिग्विजय ने कमलनाथ को समर्थन देते हुए इस परिदृश्य को बदल दिया और सिंधिया की योजनाओं पर पानी फेर दिया.

दिग्विजय को 13 सदस्यीय समन्वय समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया और उन्होंने सभी गुटों को एक साथ लाने के लिए 'एकता यात्रा' शुरू कर दी. वह चुनाव समिति का हिस्सा नहीं थे, लेकिन टिकट वितरण की बैठकों में वह विशेष रूप आमंत्रित थे और प्रचार समिति के अध्यक्ष सिंधिया के साथ उनके विवाद ने सुर्खियां बटोरीं.

इस बीच, दिग्विजय का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें वो कह रहे थे, 'कोई सार्वजनिक बैठक नहीं, कोई भाषण नहीं मेरे भाषण देने से तो कांग्रेस के वोट कटते हैं.' हालांकि, उन्होंने इस प्रतिज्ञा को तोड़ दिया और अपने बेटे जयवर्धन, भाई लक्ष्मण सिंह और पार्टी के कुछ अन्य उम्मीदवारों के लिए सार्वजनिक बैठक की.

जब चुनाव के बाद पार्टी ने 114 सीटों पर जीत हासिल की, जो कि 'जादुई आंकड़े' 116 से दो कम थे, तब कांग्रेस नेतृत्व ने दिग्विजय से पार्टी के बागियों और बसपा से बात करने के लिए कहा. कमलनाथ ने बताया कि इस टास्क को दिग्विजय ने काफी कम समय में पूरा कर लिया.

कमलनाथ के साथ ही दिग्विजय प्रमुख नियुक्तियां करने में शामिल रहे और उम्मीद है कि उनके कई वफादार और बेटे जयवर्धन को 25 दिसंबर के मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान मंत्री पद मिलेगा.

कई लोगों का यह भी मानना है कि कमलनाथ के किसानों की कर्ज माफी के फैसले और व्यापम मामले की जांच के आदेश में भी दिग्विजय ने अहम भूमिका निभाई है. दिग्विजय का कहना है कि एसपी से थानेदार नहीं बनना चाहते. इसका मतलब है कि वह पार्टी में किसी पद को स्वीकार नहीं करेंगे लेकिन अहम भूमिका निभाएंगे.

दिग्विजय की 'नर्मदा परिक्रमा' ने कांग्रेस को लोगों से जोड़ने में मदद की है. इस यात्रा में शामिल 54 निर्वाचन क्षेत्रों में से कांग्रेस ने 33 पर जीत हासिल की है. 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस जीत के लिए इनकी रणनीति पर भरोसा करेगी.

Tags: Congress, Digvijay singh, Jyotiraditya Madhavrao Scindia, Kamal nath, Madhya Pradesh Assembly, Madhya pradesh news

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