MP Government की ऑनलाइन क्लास: जब एंड्रॉयड फोन ही नहीं तो कैसे बनेंगे होनहार !
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MP Government की ऑनलाइन क्लास: जब एंड्रॉयड फोन ही नहीं तो कैसे बनेंगे होनहार !
सरकारी स्कूलों के बच्चे कैसे करें ऑनलाइन क्लास (प्रतीकात्मक फोटो)

सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में पहली कक्षा से लेकर आठवीं तक 50 फीसदी बच्चे मजदूर वर्ग से आते हैं. इन परिवारों के पास ना तो रेडियो है, न टीवी और ना ही मोबाइल फोन...

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भोपाल. वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (Pandemic Coronavirus) के संक्रमण से बचाव के मद्देनजर देशव्यापी लॉकडाउन (Lockdown) है. लॉकडाउन पीरियड में शैक्षणिक संस्थानों ने छात्र-छात्राओं की ऑनलाइन क्लासेज (Online classes) लीं और इनके जरिए कोर्स पूरा कराने को लेकर स्कूल व शिक्षा विभाग ने भले ही अपनी पीठ खुद थपथपाई हो. लेकिन सरकारी स्कूलों में शिक्षकों ने डीजी लैप एप से चल रही ऑनलाइन क्लासेज और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं. DIGI-LEP एप से स्टूडेंट्स की ऑनलाइन पढ़ाई और शिक्षकों के प्रशिक्षण को महज औपचारिकता बताया जा रहा है.

सरकारी स्कूलों के 50 फीसदी बच्चों के पास नहीं हैं एंड्रॉयड फोन
सरकारी स्कूलों में अधिकांश छात्र छात्राओं के पास एंड्रॉयड मोबाइल ना होने से कोर्स पूरा कराना मुसीबत साबित हो रहा है. सरकारी स्कूलों में मात्र 50 प्रतिशत परिवारों के पास ही एंड्रॉयड फोन हैं ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई को लेकर अब शिक्षकों ने ही व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं. सरकारी स्कूलों के शिक्षकों का कहना है कि सरकारी स्कूलों में कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक 50 फीसदी बच्चे मजदूर वर्ग से आते हैं. इन परिवारों के पास ना तो रेडियो है, न टीवी है और ना ही मोबाइल है. मात्र 50 प्रतिशत परिवारों के पास ही मोबाइल है. ग्रामीण इलाकों में महज 30प्रतिशत परिवारों के पास ही मोबाइल है. कोरोना महामारी के संकट काल के दौरान मजदूर 2 जून की रोटी के इंतजाम में ही लगे हुए हैं. परिवार बच्चों के साथ राशन पानी और भोजन वितरण जहां हो रहा है, वहां से भोजन प्राप्त करने में लगे हुए हैं. ऐसे में छात्र-छात्राओं की पढ़ाई ऑनलाइन कराना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है.

सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेज फिसड्डी साबित
सरकारी स्कूलों में लॉकडाउन के दौरान कोर्स पूरा कराने की जिम्मेदारी स्कूलों और शिक्षकों पर सौंपी गई है. स्कूल शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने यह आदेश जारी किया है कि स्कूल ना खुलने तक बच्चों का कोर्स ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से पूरा किया जाए. सरकारी फरमान के जारी होने के बाद शिक्षक भी औपचारिकता पूरी कर रहे हैं. हफ्ते में सात दिन की जगह मात्र दो या तीन दिन ऑनलाइन क्लासेज ले रहे हैं. तो शिक्षक भी ऑनलाइन क्लासेस अटेंड करने वाले 12 बच्चों की फोटो डालकर ऑनलाइन क्लासेस की औपचारिकता पूरी कर रहे हैं. सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेज का कार्यक्रम पूरी तरह से फिसड्डी साबित हो रहा है.



विरोध में ऑनलाइन ज्ञापन भेजा
मध्य प्रदेश शिक्षक कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और विभाग के प्रमुख सचिव को ऑनलाइन ज्ञापन भेजा है. लॉकडाउन के दौरान भले ही ऑनलाइन क्लासेज के जरिए आधे से ज्यादा सिलेबस पूरा कराने की बात कही जा रही है. लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है. अब तक सरकारी स्कूलों में मात्र 10 फ़ीसदी और निजी स्कूलों में 30 फीसदी ही कोर्स पूरा हो सका है. सरकारी स्कूलों में ऑनलाइन क्लासेज से पढ़ाई का सही विकल्प न होने को लेकर मध्य प्रदेश शिक्षक कांग्रेस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और स्कूल शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव रश्मि अरुण को ऑनलाइन ज्ञापन भी भेजा है. अब तक डाइट और जिला स्तर पर होने वाला शिक्षकों का प्रशिक्षण इस बार ऑनलाइन किया जा रहा है. ऑनलाइन प्रशिक्षण में भी ना तो शिक्षकों को कोई एक्सपर्ट क्लास दे रहा है.. महज विषयों के नोट्स और पाठ्य सामग्री ही व्हाट्सएप नंबर के जरिए शिक्षकों तक पहुंचाई जा रही है ऐसे में शिक्षक प्रशिक्षण को लेकर भी शिक्षक उदासीन नजर आ रहे हैं.

बता दें कि स्कूल शिक्षा विभाग ने ऑनलाइन क्लासेज के माध्यम से कोर्स पूरा कराने को लेकर आदेश जारी किया था. आदेश में एक और विकल्प दिया गया था कि जिन छात्र-छात्राओं के पास मोबाइल नहीं है या जो भी स्टूडेंट्स ऑनलाइन क्लासेस में बैठ नहीं रहे हैं उनका कोर्स पूरा कराने की जिम्मेदारी शिक्षकों पर होगी. स्कूल खोलने के बाद अतिरिक्त कक्षाएं लगाकर छात्र-छात्राओं का कोर्स पूरा कराया जाएगा. सरकारी स्कूलों के ज्यादातर प्रिंसिपल का कहना है कि ऑनलाइन क्लासेस में महज 10फीसदी बच्चों की उपस्थिति दर्ज की जा रही है. स्कूल खोलने के बाद 90 फ़ीसदी बच्चों का एक्स्ट्रा क्लासेस के जरिए ही कोर्स पूरा कराना होगा. लॉक डाउन के पहले चरण से ही स्कूल शिक्षा विभाग रेडियो स्कूल कार्यक्रम, DIGI-LEP एप से ऑनलाइन क्लासेस लगा रहा है तो व्हाट्सएप से ऑनलाइन सिलेबस और छात्र-छात्राओं को नोट्स भेज रहा है. पहली से बारहवीं तक के छात्र-छात्राओं के लिए शैक्षिक टीवी कार्यक्रम की शुरुआत की गई है. लेकिन इसका कितना लाभ स्टूडेंटस को मिलेगा ये गंभीर सवाल है.

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