Opinion : मध्य प्रदेश में सियासी संकट : ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ हैं पिता माधवराव के वफादार
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Opinion : मध्य प्रदेश में सियासी संकट : ज्योतिरादित्य  सिंधिया के साथ हैं पिता माधवराव के वफादार
MP में सियासी संकट-पिता माधवराव के समर्थकों ने दिया ज्योतिरादित्य का साथ

मध्यप्रदेश कांग्रेस में मची उठापटक में पार्टी छोड़ने वाले कुछ विधायक पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समर्थक भी हैं. आदिवासी चेहरा बिसाहूलाल सिंह का नाम दिग्विजय सिंह ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाया था.

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दिनेश गुप्ता
भोपाल.कांग्रेस (congress) के अधिकांश बड़े नेता यह मानकर चल रहे थे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया (jyotiraditya scindia) कभी पार्टी नहीं छोड़ सकते हैं. इसका बड़ा कारण राहुल-प्रियंका गांधी (rahul-priyanka gandhi) से उनकी नजदीकी थी. प्रदेश में सिंधिया की सबसे बड़ी ताकत उनके समर्थक माने जाते हैं. सिंधिया को अपने कई समर्थक विरासत में मिले हैं. माधवराव सिंधिया के साथी रहे सैकड़ों नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भी पूरी निष्ठा के साथ जुड़े हुए हैं. सिंधिया के कुछ पुराने निष्ठावान साथी और मौजूदा विधायकों के कारण ही राज्य की कमलनाथ सरकार संकट में पड़ गई है. सिंधिया समर्थक जो विधायक बेंगलूरू के रिसोर्ट में हैं,उनमें आठ अनुसूचित जाति वर्ग के हैं.

सिलावट,चौधरी और राजपूत की तिकड़ी
माधवराव सिंधिया जब तक जीवित रहे उनके साथ तीन चेहरे हमेशा ही राज्य की राजनीति में सक्रिय दिखाई दिए. ये चेहरे तुलसी सिलावट,प्रभुराम चौधरी और गोविंद राजपूत के हैं. माधवराव सिंधिया के कारण ही गोविंद राजपूत मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. वो सागर जिले की सुरखी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं. राजपूत पहली बार विधानसभा के लिए वर्ष 2003 में उस वक्त चुने गए जब दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गई थी. राजपूत को टिकट दिलाने में एक मात्र भूमिका ज्योतिरादित्य सिंधिया की ही थी. उस वक्त सिंधिया को राजनीति में आए हुए सिर्फ एक साल का हुआ था. सिंधिया सक्रिय राजनीति में वर्ष 2002 में आए थे. कमलनाथ मंत्रिमंडल में राजपूत परिवहन एवं राजस्व मंत्री हैं. सिंधिया ने राजपूत का नाम उप मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया था. राजपूत अपने विभाग में मुख्यमंत्री कार्यालय के दखल के कारण नाराज चल रहे थे. उन्होंने इसकी शिकायत सिंधिया से की थी.
तुलसी सिलावट और माधवराव सिंधिया
वर्ष 1985 से 1990 का दौर मध्यप्रदेश की राजनीति में उथल-पुथल भरा था. इन पांच साल में पांच वार कांग्रेस ने अपने मुख्यमंत्री बदले थे. राजनीति अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया के बीच बंटी हुई थी. मोतीलाल वोरा दो बार समझौते के चेहरे के तौर पर राज्य के मुख्यमंत्री इसी दौर में बने. तुलसी सिलावट इसी दौर में विधायक चुने गए थे.वो इंदौर जिले के सांवेर से विधायक हैं. ये अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित सीट है. तुलसी सिलावट छात्र राजनीति से ही माधवराव सिंधिया से जुड़े हुए थे. अर्जुन सिंह के स्थान पर जब मोतीलाल वोरा राज्य के मुख्यमंत्री बने तब तुलसी सिलावट को संसदीय सचिव बनाया गया. चौथी बार के विधायक हैं. पीव्ही नरसिंहाराव की सरकार में माधवराव सिंधिया जब मानव संसाधन मंत्री थे तब उन्होंने सिलावट को नेहरू युवा केन्द्र का उपाध्यक्ष नियुक्त किया था.। कमलनाथ मंत्रिमंडल में सिलावट स्वास्थ्य मंत्री हैं. वे अपने विभाग में शुद्ध के लिए युद्ध कार्यक्रम चला रहे हैं.



प्रभुराम चौधरी ने कभी आस्था नहीं बदली
प्रभुराम चौधरी कमलनाथ मंत्रिमंडल में स्कूल शिक्षा मंत्री हैं. उन्होंने मेडिकल की पढ़ाई की है. 1985 में माधवराव सिंधिया ने ही उन्हें सांची विधानसभा सीट से टिकट दिलाई थी. वे चुनाव जीते. 1989 में संसदीय सचिव बनाए गए. चौधरी तीसरी बार विधानसभा में चुनकर आए हैं. चार दशक में चौधरी ने कभा अपनी निष्ठा नहीं बदली.

प्रद्युम्न सिंह तोमर
प्रद्युम्न सिंह तोमर,कमलनाथ मंत्रिमंडल में खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री हैं. पिछले छह माह से तोमर की चर्चा ग्वालियर और शिवपुरी में नाले में उतरकर सफाई करने को लेकर हो रही है. तोमर दूसरी बार विधायक बने हैं. इससे पहले वे 2008 में चुनाव जीते थे. मंत्री होने के बाद भी सरकारी अमला उनके क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण नहीं कर रहा था. यही कारण है कि उन्हें गांधीवादी तरीका अपनाकर विरोध करना पड़ा. अफसरों के सुनवाई न करने पर तोमर सार्वजनिक रूप से उनके पैर छूने से भी नहीं चूकते थे. तोमर लगातार यह संदेश देते रहे हैं कि कमलनाथ सरकार की नौकरशाही बेलगाम है. तोमर,ग्वालियर से चुनकर आते हैं.ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति उनकी आस्था का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वे सार्वजनिक स्थानों पर भी उनके पैरों के पास बैठने में नहीं झिझकते.

महेन्द्र सिंह सिसोदिया ने दी थी चेतावनी
सिंधिया के संसदीय क्षेत्र गुना-शिवपुरी के अंर्तगत आने वाले बमोरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक महेन्द्र सिंह सिसोदिया वो मंत्री हैं, जिन्होंने यह बयान देकर कांग्रेस और मुख्यमंत्री कमलनाथ को सार्वजनिक रूप से चेताया था कि यदि सिंधिया की उपेक्षा हुई तो सरकार संकट में आ जाएगी. सरकार पर काले बादल छा जाएंगे. सिसोदिया,कमलनाथ मंत्रिमंडल में श्रम मंत्री हैं. सरकार में उन्हें काम करने में काफी दिक्कत हो रही थी.

महाराज के आदेश पर झाडू भा लगा सकतीं हैं इमरती देवी
ग्वालियर जिले की डबरा विधान सभा सीट से विधायक इमरती देवी ने जब सार्वजनिक रूप से यह बयान दिया कि वे महाराज के कहने पर झाडू लगा सकती हैं तो उनकी काफी आलोचना हुई थी. अनुसूचित जाति वर्ग की इमरती देवी पिछले एक साल से लगातार सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाने की मांग करती रहीं हैं. इमरती देवी महिला एवं बाल विकास मंत्री हैं. यह विभाग कुपोषित बच्चों को पोषण आहार देता है. पोषण आहार की सप्लाई मुख्यमंत्री कमलनाथ निजी कंपनियों से लेना चाहते थे. इस विवाद में राज्य की वरिष्ठ आईएएस अधिकारी गौरी सिंह को वीआरएस लेना पड़ा था. इमरती देवी अनुसूचित जाति वर्ग से हैं.

सिंधिया समर्थक मंत्रियों को बर्खास्त कर चुके हैं कमलनाथ
कमलनाथ मंत्रिमंडल में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कोटे से कुल छह मंत्री थे. मुख्यमंत्री कमलनाथ इन सभी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने का पत्र राज्यपाल को भेज चुके हैं. राज्यपाल के आज गुरूवार को भोपाल पहुंचने के बाद इस पत्र पर अपना फैसला लेंगे. मंत्रिमंडल के सदस्यों के अलावा जो विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर कर रहे हैं उनमें अधिकांश ग्वालियर-चंबल संभाग अंचल के हैं. विधानसभा चुनाव में इस अंचल की चौंतीस में से 27 सीटों पर कांग्रेस चुनाव जीती थी. सिंधिया के साथ मुरैना जिले के रघुराज कंसाना और गिरिराज दंडोतिया भी हैं. कंसाना पहली बार विधायक बने हैं. इससे पहले वे जिला पंचायत मुरैना के अध्यक्ष रहे. कंसाना वो विधायक हैं, जिन पर पहले दिन से ही बेंगलुरू में होने का आरोप दिग्विजय सिंह लगाते रहे हैं. दंडोतिया मुरैना जिले की दिमनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं. ये भी पहली बार विधायक बने हैं. वेटर लिफ्टर हैं. 100 किलो के वेट में कई गोल्ड मैडल मिल चुके हैं. उन्होंने माधवराव सिंधिया के नेतृत्व में राजनीति शुरू की थी. जहां भी सिंधिया की प्रतिष्ठा का सवाल होता है दंडोतिया का चेहरा वहां जरूर नजर आता है. शिवपुरी,अटेर और मुंगावली विधानसभा के प्रतिष्ठापूर्ण उप चुनाव के समन्वयक दंडोतिया ही थे.

भदौरिया की निष्ठा
भिंड जिले की मेहगांव विधानसभा सीट के विधायक ओपीएस भदौरिया पहली बार विधायक बने हैं. सिंधिया ने इन्हें पार्टी में हर तरह से स्थापित किया है. अशोक नगर के विधायक जजपाल सिंह जज्जी भी पहली बार विधायक बने हैं. वो दो बार अशोकनगर के अध्यक्ष रह चुके हैं. अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित भांडेर विधानसभा क्षेत्र से रक्षा संतराम सरौनिया भी पहली बार विधायक बनीं हैं. रक्षा सरौनिया को पार्षद से विधायक बनाने में सिंधिया की भूमिका काफी अहम रही है. उनके पति डॉक्टर हैं.भिंड जिले की गोहद सुरक्षित विधानसभा सीट से विधायक रणवीर जाटव के पिता माखनलाल जाटव भी कांग्रेस विधायक थे. 2008 में विधायक बने थे. चुनाव के बाद उनकी हत्या कर दी गई थी. आरोप बीजेपी के पराजित उम्मीदवर लाल सिंह आर्य पर लगा था. मामले की सीबीआई जांच भी हुई और हाल ही में अदालत ने आर्य को बरी कर दिया है. रणवीर जाटव का परिवार सिंधिया समर्थक है. पिता के बाद पुत्र को राजनीति में लाकर विधायक बनाने में सिंधिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. करैरा के विधायक जयवंत जाटव पहली बार विधायक बने हैं. सिंधिया से अलग राजनीति कभी नहीं की. वो अनुसूचित जाति वर्ग के हैं. शिवपुरी जिले के पोहरी से विधायक सुरेश राजखेड़ा पिछले कुछ माह से कमलनाथ सरकार से नाराज चल रहे थे. क्षेत्र में छोटे-छोटे काम भी नहीं हो रहे थे. ब्रजेंद्र यादव को मुंगावली से विधानसभा का उप चुनाव जीतने में सिंधिया ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी. मुंगावली उप चुनाव के बाद ही प्रदेश में •भाजपा की सरकार बदलने के संकेत मिलने लगे थे. यादव के लिए सिंधिया ही राजनीतिक दल हैं. ग्वालियर-चंबल अंचल से बाहर धार जिले में सिंधिया समर्थक राजवर्द्धन सिंह दत्तीगांव हैं. उनके पिता प्रेम सिंह माधवराव सिंधिया के मित्र थे. वो कांग्रेस के विधायक रहे हैं और राज परिवार से हैं.

दिग्विजय सिंह समर्थकों का पाला बदल
मध्यप्रदेश कांग्रेस में मची उठापटक में पार्टी छोड़ने वाले कुछ विधायक पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के समर्थक भी हैं. आदिवासी चेहरा बिसाहूलाल सिंह का नाम दिग्विजय सिंह ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद के लिए आगे बढ़ाया था. बिसाहूलाल सिंह तीन दिन पहले ही बेंगलुरू से भोपाल आ गए थे. उन्हें लेने के लिए कमलनाथ ने पर्यटन मंत्री हनी बघेल को भेजा था. बिसाहूलाल सिंह ने तमाम दबाव के बाद भी दिग्विजय सिंह को साफ कह दिया था कि वे मीडिया के सामने यह बयान नहीं देंगे कि उन्हें भाजपा ने बंधक बनाया था. दिग्विजय सिंह के प्रयासों से ही बिसाहूलाल के परिजनों ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. कांग्रेस छोड़कर •भाजपा में जाने वाले एक अन्य विधायक ऐंदल सिंह कंसाना भी दिग्विजय सिंह के समर्थक हैं और सिंधिया के विरोधी माने जाते हैं. वे सिंधिया के प्रभाव वाले क्षेत्र मुरैना जिले से चुनकर आते हैं. दिग्विजय सिंह सरकार में मंत्री भी रहे हैं. कमलनाथ सरकार के गठन में बिसाहूलाल सिंह और कंसाना को वरिष्ठता के बाद भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिल पाई थी. मंदसौर जिले के विधायक हरदीप डंग भी सिंधिया समर्थक नहीं हैं.

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