बाबूलाल गौर : राजनीति की एक ऐसी अज़ीम शख़्सियत जो हर दिल अज़ीज़ थे

बाबूलाल गौर 11वीं बार भी टिकट के दावेदार थे, लेकिन पार्टी की 75 पार के नेताओं को टिकट न देने की नीति के कारण उनकी जगह उनकी बहू कृष्णा गौर को गोविंदपुरा सीट से टिकट दिया गया था. वह चुनाव जीत गईं.

News18 Madhya Pradesh
Updated: August 21, 2019, 8:48 AM IST
बाबूलाल गौर : राजनीति की एक ऐसी अज़ीम शख़्सियत जो हर दिल अज़ीज़ थे
बाबूलाल गौर का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया है. (फाइल फोटो)
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Updated: August 21, 2019, 8:48 AM IST
बीजेपी के वेटरन लीडर  बाबूलाल गौर एक ऐसी अज़ीम शख़्सियत थे जो हर दिल अज़ीज़ थे.  उनकी राजनीतिक यात्रा बहुत सफल और लंबी रही है. गौर अपनी खुशमिजाज़ी और बेबाकी के लिए जाने जाते थे, वो ऐसे नेता थे जो पार्टी लाइन से ऊपर उठकर हर मुद्दे पर अपनी राय बेबाकी से रखते थे. बाबूलाल गौर के नाम भोपाल की गोविंदपुरा सीट से लगातार  10 बार विधायक बनने का रिकॉर्ड है.

उत्तर प्रदेश थी जन्मभूमि
2 जून 1930 को उत्तर प्रदेश में जन्मे बाबूलाल गौर ने भोपाल की पुट्ठा मिल में मजदूरी करते हुए पढ़ाई की. बाद में उन्हें भेल में नौकरी मिल गई. इस दौरान उन्होंने कई श्रमिक आंदोलनों में भाग लिया था. वे भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक सदस्य हैं.

श्रमिक आंदोलन से राजनीतिक करियर की शुरुआत

वे स्कूली दिनों में संघ की शाखा भी जाया करते थे, लेकिन ट्रेड यूनियनों में उनकी सक्रियता ज्यादा रही. इसी बीच दोस्तों की मदद से गौर 1972 में गोविंदपुरा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर जीत गए.

गौर ने 1977 में गोविन्दपुरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और वहां से लगातार विधानसभा चुनाव जीतते रहे हैं. इस बार भी वे यहीं से मैदान में हैं. इस बीच 1993 के विधानसभा चुनाव में 59 हजार 666 मतों के अंतर से विजय प्राप्त कर बाबूलाल गौर ने रिकार्ड बनाया. इसके बाद 2003 में 64 हजार 212 मतों के अंतर से विजय पाकर अपने ही रिकार्ड को तोड़ा.

बाबूलाल गौर सात मार्च 1990 से 15 दिसंबर 1992 तक मप्र के स्थानीय शासन, विधि एवं विधायी कार्य, संसदीय कार्य, जनसंपर्क, नगरीय कल्याण, शहरी आवास तथा पुनर्वास एवं भोपाल गैस त्रासदी राहत मंत्री रहे.
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इमरजेंसी के बाद 1977 के विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी ने उन्हें भोपाल दक्षिण से टिकट दिया था. इस सीट पर वे 19 हजार के करीब वोटों से जीते थे. 1980 के विधानसभा चुनाव में गौर की वापसी गोविंदपुरा सीट पर हुई. बीजेपी ने उन्हें टिकट दिया गौर ने इस सीट से चुनाव जीतकर हैट्रिक बना दी.

1980 के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद गोविंदपुरा विधानसभा सीट और बाबूलाल गौर एक-दूसरे के पर्याय बन गए. गौर ने 2003 में कांग्रेस के शिवकुमार उरमलिया को रिकार्ड मतों से हराया था. इस चुनाव में गौर की लीड 64 हजार 212 की रही थी. विधानसभा में मध्य प्रदेश के चुनावी इतिहास में यह जीत सबसे बड़ी जीत के तौर पर दर्ज हुई.

गौर पहली बार 1974 में भोपाल दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में निर्दलीय विधायक चुने गए थे. उन्होंने 1977 में गोविन्दपुरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा और वर्ष 2013 तक वहां से लगातार विधानसभा चुनाव जीतते रहे.

-बीए और एलएलबी डिग्रीधारी गौर पहली बार 1974 में भोपाल दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के उपचुनाव में निर्दलीय विधायक चुने गए थे। उन्होंने 1977 में गोविन्दपुरा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा.

-1993 के विधानसभा चुनाव में 59 हजार 666 मतों के अंतर से विजय प्राप्त कर बाबूलाल गौर ने कीर्तिमान रचा था और 2003 के विधानसभा चुनाव में 64 हजार 212 मतों के अंतर से विजय पाकर अपने ही कीर्तिमान को तोड़ा. वे 7 मार्च 1990 से 15 दिसंबर 1992 तक मप्र के स्थानीय शासन, विधि एवं विधायी कार्य, संसदीय कार्य, जनसंपर्क, नगरीय कल्याण, शहरी आवास तथा पुनर्वास एवं भोपाल गैस त्रासदी राहत मंत्री रहे.

-वे 4 सितंबर 2002 से 7 दिसंबर 2003 तक मध्य प्रदेश विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे. बाबूलाल गौर सन 1946 से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। उन्होंने दिल्ली तथा पंजाब आदि राज्यों में आयोजित सत्याग्रहों में भी भाग लिया था. गौर ने आपातकाल के दौरान 19 माह की जेल भी काटी.

-1974 में मध्य प्रदेश शासन द्वारा बाबूलाल गौर को 'गोआ मुक्ति आंदोलन' में शामिल होने के कारण 'स्वतंत्रता संग्राम सेनानी' का सम्मान प्रदान किया गया था. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में 'नगरीय प्रशासन एवं विकास', गृह विभाग, 'भोपाल गैस त्रासदी, राहत एवं पुनर्वास' विभाग का मंत्री बनाया गया.

-सक्रिय राजनीति में आने से पहले बाबूलाल गौर ने भोपाल की कपड़ा मिल में नौकरी की थी और श्रमिकों के हित में अनेक आंदोलनों में भाग लिया था। वे भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक सदस्य हैं।

एक बड़ा दिलचस्प वाकया बाबूलाल गौर के साथ 2003 के चुनाव में जुड़ा हुआ था, बताया जाता है कि उनका टिकट करीब-करीब कट गया था. केंद्रीय चुनाव समिति के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने जब उनके पिछले रिकार्ड को देखा तो उनके हस्तक्षेप से बाबूलाल गौर को फिर से टिकट मिल गया. इतना ही नहीं इस दौरान बाबूलाल गौर ही मुख्यमंत्री बने. वे 23 अगस्त 2004 से 29 नवंबर 2005 तक वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे.

ये भी पढ़ें-मध्‍य प्रदेश के पूर्व मुख्‍यमंत्री बाबूलाल गौर का निधन

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First published: August 21, 2019, 8:17 AM IST
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