ANALYSIS: विपक्ष के ताकतवर नेता की छवि नहीं छोड़ेंगे शिवराज
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ANALYSIS: विपक्ष के ताकतवर नेता की छवि नहीं छोड़ेंगे शिवराज
शिवराज सिंह चौहान, पूर्व मुख्यमंत्री (फाइल फोटो)

कमलनाथ सरकार के विरोध में हर रैली में पहुंच रहे, कमलनाथ भी शिवराज के राजनीतिक पैंतरों का जवाब देने में पीछे नहीं.

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यह तय हो गया है कि मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान विपक्ष के नेता के बतौर अपनी ताकतवर भूमिका को छोड़ने वाले नहीं है. भले ही भाजपा हाइकमान ने उन्हें सदस्यता अभियान का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया हो. जिस तरह से शिवराज ने भोपाल में आदिवासियों के आंदोलन की आक्रामक अगुवाई की है, उसने कई राजनीतिक हालातों को साफ कर दिया है. शिवराज ने अपनी मौजूदगी दिखाते हुए न सिर्फ अफसरों को चेतावनी दी बल्कि खुद आदिवासियों के साथ ट्रैक्टर में बैठकर धरनास्थल पर पहुंच गए.

कमलनाथ का दांव

मामला आदिवासियों के वन अधिकार और उन पर लादे गए पुलिस प्रकरणों का था, लेकिन जिस तरीके से शिवराज सिंह की मौजूदगी ने इसे गरमा दिया वह सनसनी फैलाने वाला था. यह आदिवासी शिवराज के चुनावी क्षेत्र बुधनी के थे. हालांकि जितनी आक्रामकता से शिवराज ने माहौल बनाया उतनी ही तत्परता से मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी दांव चला. धरना प्रदर्शन से शिवराज को बुलाकर ज्ञापन लिया और सारी मांगे मानने का आश्वासन दे दिया.



राजनीतिक सौजन्यता
इस पूरे घटनाक्रम ने प्रदेश में सत्ता और विपक्ष की बेहतरीन राजनीतिक सौजन्यता का परिचय भी दिया. और यह भी दिखाया कि मुख्यमंत्री कमलनाथ प्रदेश में  उदार माहौल के हिमायती हैं. पूर्व मुख्यमंत्री की अगुवाई वाले आंदोलन को वे पूरी तत्परता और गंभीरता से लेते हैं. लेकिन मामला यहीं तक नहीं है.

फिर सुर्खियों में आए

दरअसल यह पूरा घटनाक्रम शिवराज के उस राजनीति का भी हिस्सा था. जिसके लिए वे पहचाने जाते हैं. सदस्यता अभियान का संयोजक बनने के बाद यह खबरें सुर्खियों में थीं कि उन्हें अब प्रदेश की राजनीति से  कुछ समय के लिए रूखसत कर दिया गया है. वे इस धारणा को बदलना चाहते थे वह भी अपनी जमीनी पहचान के साथ. जिसके दम पर उन्होंने 13 साल राज किया. कभी किसान नेता बनकर तो कभी आदिवासियों का हितैषी मामा बनकर. तो कभी भीड़ में खो जाने वाले किसी शख्स के बतौर वे अपनी छवि गढ़ते रहे.

ट्रैक्टर पर बैठना

अब उसी स्वरूप में उन्होंने भोपाल में आदिवासियों के साथ सात किमी. तक ट्रैक्टर की संवारी की. उन्हीं के बीच का कोई आम नेता बनकर वे मुख्यमंत्री और कांग्रेस सरकार पर दहाड़ते रहे. जिसकी गूंज मंत्रालय तक पहुंची. और मुख्यमंत्री अपने सारे काम छोड़कर सजग हो गए. एक साधारण सा शांतिपूर्ण धरना बड़े राजनीतिक घटनाक्रम में तब्दील हो गया. क्योंकि इसकी अगुवाई पूर्व मुख्यमंत्री जो कर रहे थे.

नुकसान शिवराज कार्यकाल में

राजनीतिक विश्लेषक एवं आदिवासी मामलों के जानकार राकेश दीवान कहते हैं कि मध्यप्रदेश में  13 साल तक शिवराज सरकार रही और वनाधिकार कानून के तहत सबसे ज्यादा नुकसान उनके कार्यकाल में हुआ. आधिवासियों के पट्‌टे खारिज हुए उनके अधिकारी इसे राक्षसी कानून बताकर खारिज करते रहे. मामले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे लेकिन सरकार की ओर से कोई वकील तक नहीं दिया गया. यह समझने की बात है कि यह आंदोलन आदिवासियों के लिए था या फिर शिवराज की राजनीतिक मौजूदगी साबित करने के लिए यह सोचने वाली बात है.

आदिवासी किसान नेता

भाजपा के प्रवक्ता डा. हितेष वाजपेई इसका विरोध करते हैं और कहते हैं कि शिवराज प्रदेश के सबसे बड़े जन नेता हैं. और आदिवासियों किसानों पर उन्होंने मजबूती से हर बार आवाज उठाई है. और मुख्यमंत्री रहते हुए उनके अधिकारों को संरक्षण दिया है. जब भी अधिकारों का हनन होगा पुलिस या वन विभाग उनके खिलाफ अनुचित कार्रवाई करेगा शिवराज नेतृत्व करने से पीछे नहीं हटेंगे.

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