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कमाई से ज्यादा खर्च, ढाई लाख करोड़ का कर्ज, कैसे बनेगा आत्मनिर्भर मप्र?

शिवराज के आगे सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मप्र को आत्मनिर्भर बनाएंगे कैसे. (File)

शिवराज के आगे सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर मप्र को आत्मनिर्भर बनाएंगे कैसे. (File)

Debt Over Budget: मध्यप्रदेश का राजकोष खाली है. कमाई से ज्यादा खर्च है, राज्य का इस साल का जितना बजट है, उससे ज्यादा कर्ज है और कर्ज पर ब्याज का बोझ है. ऐसे में सबके जेहन में एक ही सवाल है कि कर्ज पर निर्भर मप्र कैसे आत्मनिर्भर मप्र बनेगा?

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जिस तरह घर को चलाने के लिए बजट(Budget) की जरूरत होती है, उसी तरह सूबे या मुल्क की गाड़ी बेफिक्री से चलाने के लिए सरकार के खजाने में दौलत होनी चाहिए. लेकिन मध्यप्रदेश का राजकोष खाली है. कमाई से ज्यादा खर्च है, राज्य का इस साल का जितना बजट है, उससे ज्यादा कर्ज है, आय से ज्यादा कर्ज पर ब्याज का बोझ है. ऐसे में सबके जेहन में एक ही सवाल है कि ‘कर्ज पर निर्भर मप्र’ (Dependence on debt) कैसे ‘आत्मनिर्भर मप्र’ बनेगा, यही इन दिनों चिंता का सबसे बड़ा सबब है.

बता दें कि मप्र पर कर्ज का बोझ बढ़कर इस वित्तीय वर्ष में 2.52 लाख करोड़ से भी ऊपर जा पहुंचेगा, अभी यह कर्ज 2.31 लाख करोड़ है, जबकि साल 2021-22 का कुल बजट ही 2.41 करोड़ 375 करोड़ है, जबकि उसमें करीब 50, 938 करोड़ का राजकोषीय घाटा दिखाया गया है. पेट्रोल-डीजल-रसोई गैस की महंगाई की मार से कराह रही जनता को राहत तो दूर की कौड़ी रही, क्योंकि इसकी झलक तो बीते मंगलवार को बजट के पेश होने के एक दिन पहले पेश आर्थिक सर्वेक्षण(Economic survey) में दिख गई थी, जिसने राज्य  की कंगाली की तस्वीर को सामने लाकर रख दिया था.

क्या कहा गया था आर्थिक सर्वे में



बजट से एक दिन पहले पेश राज्य के आर्थिक सर्वे में बताया गया था कि कोरोना काल में प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय 1 लाख 3 हजार 288 रुपए से घटकर सालाना 98 हजार 418 रूपए रह गई है यानी प्रति व्यक्ति की औसत आमदनी 4 हजार 870 रूपए घटी है. 2020 की स्थिति में रजिस्टर्ड बेरोजगारों की संख्या 30 लाख के करीब हो गई है. 10 लाख से ज्यादा छोटे, मझोले उद्योग-धंधे बंद हो गए. यह आंकड़ा तो एक साल पुराना है, जबकि कोरोना काल ने कितने लाख  उद्योग-धंधों पर ताला डलवाया है, ये इस गिनती में शामिल नहीं है. राज्य की जीडीपी में 3.37 फीसदी और विकास दर में 3.9 फीसदी गिरावट की बात क्या करें, क्योंकि यह तकनीकी भाषा और गुणा-भाग आमआदमी नहीं समझता. सरकार की माली हालत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है, कि वह किसानों की फसल बीमा के करीब 180 करोड़ का भुगतान नहीं कर सकी है. हर महीने वेतन, पेंशन, ब्याज चुकाने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ रहा है.
कैसे चलेंगी योजनाएं, कैसे होगा विकास

जब हम गले-गले कर्ज में डूबे हों, तो विकास योजनाएं कैसे चलेंगी, कैसे मप्र आत्मनिर्भर बनेगा, यह एक बड़ा सवाल है. यह सवाल इसलिए हैं कि राज्य की आमदनी 76,656 करोड़ है, लेकिन वेतन, पेंशन और ब्याज चुकाने के लिए सरकार को 85,499 करोड़ की जरूरत है. यानी इन कामों के लिए ही सरकार को कुल आय से 8 हजार करोड़ से ज्यादा की रकम जुटानी होगी. खनिज हो या आबकारी, अधिकांश विभागों से मिलने वाले राजस्व में कमी आई है, सरकार को अकेले बिजली कंपनियों का 34 हजार करोड़ का कर्ज चुकाना है, जो वह नहीं दे रही है और बिजली कंपनियां अपनी कंगाली, खस्ताहाली को दूर करने के लिए आमआदमी के लिए बिजली के दाम बढ़ाने की तैयारी कर रहीं है. मतलब साफ है कि महंगाई की आग में आमजनता को झुलसना है, अगर सरकार को गांव, गरीब, किसान, शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगार, उद्योग सहित कोई भी योजना संचालित करना या कोई काम करना है, तो उसके लिए उसे केन्द्र सरकार पर निर्भर रहना होगा, या बाजार से कर्ज लेना पड़ेगा.

विधानसभा में भी छाया है यही मुद्दा

मप्र राज्य विधानसभा में बजट पर पिछले दो दिन से चर्चा हो रही है, सरकार तो अपनी सक्षमता को लेकर तमाम दलीलें पेश कर रही है, लेकिन विपक्ष के सवालों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. सब एक ही सवाल कर रहे हैं कि कर्ज पर निर्भर मध्यप्रदेश आत्मनिर्भर मप्र में कैसे तब्दील होगा. मसलन कांग्रेस के युवा नेता जयवर्धन सिंह ने बजट पर चर्चा में कहा कि सरकार को बजट घोषणाओं पर काम करने के लिए नए वित्तीय वर्ष  में 50 हजार करोड़ का और कर्ज लेना पड़ेगा. इससे तो बजट से ज्यादा सरकार पर कुल कर्ज हो जाएगा.साफ है कि सरकार आत्मनिर्भर मध्यप्रदेश नहीं, बल्कि कर्ज निर्भर मप्र बना रही है. किसान कर्जमाफी की रकम भी पिछले बजट में रखी गई 8 हजार करोड़ से घटाकर मात्र 3 हजार करोड़ कर दी गई है. पूर्व वित्तमंत्री तरूण भानोट ने कहा कि केन्द्र ने राज्यांश में 12 हजार करोड़ घटा दिए, लेकिन शिवराज सरकार कर्ज लिमिट बढ़ाए जाने से खुश है. इस साल 21 हजार करोड़ सिर्फ कर्ज पर ब्याज के चुकाए गए हैं, यानी 60 करोड़ रूपए रोज यानी ढाई करोड़ रुपए प्रति घंटे हम ब्याज दे रहे हैं, हर साल 30 से 40 हजार करोड़ का कर्ज सरकार पर बढ़ता जा रहा है, इसी अनुपात में ब्याज की रकम(Interest Amount) भी सालाना करीब 3 से 4 हजार करोड़ बढ़ती जा रही है.

कितना कर्ज लिया है सरकार ने

कोरोना काल के 11 महीनों में मप्र सरकार 23 हजार करोड़ कर्ज ले चुकी है, साल 2018 के अंत में राज्य पर कुल कर्ज 1 लाख 80 हजार करोड़ था, जो अब बढ़कर 2 लाख 31 हजार करोड़ तक जा पहुंचा है और इस वित्त वर्ष की समाप्ति तक 2 लाख 52 हजार करोड़ हो जाएगा. पिछले कुछ महीनों में हमने देखा है कि सरकार के पास केवल वेतन देने लायक पैसा ही बच पाता है, हर महीने ओव्हर ड्राफ्ट की स्थिति से बचने के लिए सरकार को बाजार अथवा केन्द्र सरकार से कर्ज लेना पड़ता है. जितने बुरे हाल अभी है, ऐसी स्थिति 2003 में दिग्विजय सिंह के कार्यकाल के अंतिम दिनों में पैदा हुई थी.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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