बाबूलाल गौर: शराब की दुकान से लेकर खेती तक की, लेकिन रास आयी राजनीति

Manoj Rathore | News18 Madhya Pradesh
Updated: August 21, 2019, 10:18 AM IST
बाबूलाल गौर: शराब की दुकान से लेकर खेती तक की, लेकिन रास आयी राजनीति
बाबूलाल गौर

मध्य प्रदेश में 1990 से 92 तक सुंदरलाल पटवा की सरकार रही. बाबूलाल गौर को नया नाम दे गई, बुलडोजर मंत्री. वो अतिक्रमण हटाने के मामले में सख्त थे. इससे जुड़े कई किस्से सुनाए जाते हैं.

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बीजेपी लीडर (BJP Leader ) बाबूलाल गौर (Babulal Gaur) जितनी अज़ीम शख्सियत थे. उतने ही दिलचस्प किस्से उनके जीवन से जुड़े हुए हैं. गौर ने एक बेहद लंबी और सफल राजनीतिक पारी खेली. वो राजनीति (Politics) में शुचिता के प्रतीक थे. सार्वजनिक मंच से कभी उन्होंने किसी के लिए हल्की बात नहीं की. हर मुद्दे पर पार्टी लाइन से ऊपर उठकर बेबाकी से अपनी बात कही.

उत्तर प्रदेश से ऐसे भोपाल आए बाबूलाल गौर 
जब बाबूलाल गौर पैदा हुए तो देश पर अंग्रेजों का राज था. गांवों में दंगल हुआ करते थे. ऐसे ही एक दंगल में बाबूलाल गौर के पिता राम प्रसाद की जीत हुई. वो जीते तो अंग्रेजों ने उन्हें एक पारसी शराब कंपनी में नौकरी दे दी. लेकिन नौकरी के पीछे गांव छूटा, राज्य छूटा. आंख खुली तो सामने नया शहर था भोपाल. जगह थी बरखेड़ी. कैलेंडर में साल लगा था 1938. कुछ दिन की नौकरी बीती तो कंपनी ने खुद की दुकान दे दी. उसी दुकान में काम करने लगे. शराब बेचने लगे.

शराब की दुकान 

बाबूलाल जब 16 बरस के हुए तो वो संघ की शाखा में जाने लगे. वहां कहा गया, शराब बेचना छोड़ दो. इसी बीच पिता की मौत हो गई. बात ये आई कि शराब की दुकान बाबूलाल गौर के नाम कर दी जाए. बाबूलाल ने शराब की दुकान चलाने से मना कर दिया. गांव लौट गए. खेती की कोशिश की लेकिन वो उनके बस की नहीं थी. वापस भोपाल लौट आए. कपड़ा मिल में मजदूरी करने लगे. कपड़ा मिल में मजदूरी करते बाबूलाल गौर को रोज एक रुपये दिहाड़ी मिलती. बाबूलाल बताते थे कि वो लाल झंडे वाली यूनियन में थे. मांगों को लेकर वो लोग अक्सर हड़ताल कर देते, मांगों का पता नहीं. ये जरूर होता कि हड़ताल वाले दिन की मजदूरी कट जाती. ये सब देख वो राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस में चले गए. वहां भी निराशा ही हाथ लगी.

16 साल में संघ की शरण
थोड़ा संघ की शाखा में जाने का जोर, थोड़ा गोवा मुक्ति आंदोलन के सत्याग्रह में शामिल रहने का अनुभव. नतीजा ये रहा कि मजदूरों की बात रखने के लिए भारतीय मजदूर संघ बना और बाबूलाल गौर का नाम संस्थापक सदस्यों में लिखा गया. इस समय उनकी पढ़ाई भी साथ-साथ चल रही थी. बीए-एलएलबी हो गए.
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इस दौरान ट्रेड यूनियन की गतिविधियों में बाबूलाल गौर शामिल रहे. 1956 में पार्षद का चुनाव लड़े लेकिन हार गए. साल 1972 में उन्हें जनसंघ की ओर से विधानसभा चुनाव का टिकट मिला. सीट वही, भोपाल की गोविंदपुरा. आम तौर पर पार्टियों के गढ़ होते हैं, ये सीट जल्द ही बाबूलाल गौर का गढ़ बनने वाली थी. लेकिन राह आसान नहीं थी. बाबूलाल गौर अपना पहला चुनाव हार गए. कोर्ट में पिटीशन डाली. पिटीशन जीते तो 1974 में उपचुनाव हुए जिसमें बाबूलाल विजयी हुए और पहली बार विधानसभा पहुंचे.

इमरजेंसी और जयप्रकाश का विजयी भव: का आशीर्वाद
वर्ष 1975 यानी इमरजेंसी वाला साल. उधर जयप्रकाश नारायण का आंदोलन, जिसमें बाबूलाल गौर भी खूब एक्टिव रहे. 27 जून, 1975 को विरोध में बैठे. मीसा के तहत गिरफ्तार कर लिए गए. जेल में रहे. वो जेपी की नज़रों में आ चुके थे. उनका फोन आया. कहा, चुनाव लड़ो. गौर ने कहा, लेकिन मैं तो जनसंघ का आदमी हूं. वही तय करेंगे मेरे बारे में. इसके बाद गौर ने कुशाभाऊ ठाकरे से पूछा. ठाकरे ने गेंद लाल कृष्ण आडवाणी के पाले में डाली. आडवाणी ने जयप्रकाश से बात की और नतीजा ये रहा कि अगले चुनाव में बाबूलाल जनता पार्टी से चुनाव लड़े और जीते. जेपी भोपाल आये तो गौर के सिर पर हाथ रखा. आशीर्वाद दिया. जिंदगी भर जनप्रतिनिधि बने रहने का. उस बात को 43 साल हो गए, गौर फिर कभी नहीं हारे.

बुलडोज़र मंत्री के रूप में पहचान
मध्य प्रदेश में 1990 से 92 तक सुंदरलाल पटवा की सरकार रही. बाबूलाल गौर को नया नाम दे गई, बुलडोज़र मंत्री. वो अतिक्रमण हटाने के मामले में सख्त थे. कई किस्से सुनाए जाते हैं. कैसे गौतम नगर में अतिक्रमणकारियों को हटाने के लिए गौर ने सिर्फ बुलडोज़र खड़ा कर के इंजन चालू करा दिया और अतिक्रमण अपने-आप गायब हो गया. वीआईपी रोड पर झुग्गियां आड़े आईं तो भी बुलडोज़र चलवाया. बुलडोज़र चलाने में अधिकारी पीछे हट जाते थे, लेकिन बाबूलाल गौर नहीं. गौर बताते हैं, बुलडोज़र रोकने को नोटों से भरे सूटकेस आते थे, लेकिन बुलडोज़र फिर भी रुकते नहीं थे.

सूझबूझ से लिया काम
गौर साहब एक किस्सा खुद सुनाते थे. बड़े ताल के किनारे झुग्गियां बसी थीं, गटर बन जाने का खतरा था. उसी बीच (अब के) तेलंगाना में हिंसा हो गई. उपद्रव संभालने CRPF के 5000 जवान लखनऊ से विजयवाड़ा जा रहे थे. बीच में ट्रेन बदली और 2 दिन उन्हें भोपाल में रुकना पड़ा. उनके रहने की व्यवस्था भोपाल में ही होनी थी. बाबूलाल गौर ने उन्हें इकबाल मैदान में रोका और बड़े ताल के पास की बस्तियों में फुल ड्रेस में मार्च करा दिया. डर बन गया. अगले दिन से अतिक्रमणकारियों ने हटना शुरू कर दिया. ये बुलडोजर सिर्फ गरीबों की बस्ती पर नहीं चलते थे. 2005 में खुद की पार्टी के नेता ने राजभवन की जमीन कब्जाने के लिए बाउंड्री खड़ी कराई, तो उस पर भी बुलडोजर चल गया.

एक वारंट और एक महत्वाकांक्षा
एक वारंट और एक राजनीतिक महात्वाकांक्षा ने बाबूलाल को 74 साल की उम्र में मुख्यमंत्री बना दिया. दरअसल वर्ष 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में उमा भारती के नेतृत्व में बीजेपी सत्ता में लौटी. उमा मुख्यमंत्री बनीं. फिर एक साल के अंदर ही हुबली की अदालत से उनके नाम दस साल पुराने एक राजनीतिक मामले में एक वारंट जारी हो गया. बीजेपी ने नैतिकता के आधार पर उनसे इस्तीफा देने को कहा. उमा को भी लगा कि इससे उनका राजनीतिक कद बड़ा हो जाएगा. उन्होंने खड़ाऊं की तरह सत्ता बाबूलाल को सौंप दी.

...कुछ ग़म ऐसे थे कि...
पर्सनल ग्राउंड पर बाबूलाल गौर के लिए सब कुछ अच्छा नहीं था. उनकी दो बेटियां और एक बेटा था. मुख्यमंत्री बने तीन महीने ही हुए थे कि बेटे पुरुषोत्तम गौर की हर्ट अटैक से मौत हो गई. बेटे की अंत्येष्टि के बाद बाबूलाल घर नहीं लौटे. एक ट्रेन हादसे में मारे गए लोगों के घर ढांढस बंधाने चले गए. कुछ दिनों बाद उन्होंने बेटे की पत्नी कृष्णा गौर को पर्यटन निगम का अध्यक्ष बना दिया गया. पार्टी में ही एक तबके ने इसका विरोध किया. नतीजतन कृष्णा को तेरह दिन में पद छोड़ना पड़ा.

एक दिलचस्प वाकया
एक वाकया उनकी नाराजगी से ही जुड़ा है. जून 2016 में पार्टी ने उन्हें उम्र का हवाला देकर मंत्री पद छोड़ने को कहा. गौर उस वक्त 86 वर्ष के थे. लेकिन उसके बाद भी 2018 के विधानसभा चुनाव में 88 के हो चुके बाबूलाल गौर ने विधायकी के लिए दावेदारी ठोकी. आखिरी वक्त तक वो मैदान में डटे रहे. टिकट ना मिलने पर उनके पार्टी छोड़ने और कांग्रेस में जाने की अटकलें और चर्चा रहीं. वो कहते रहे टिकट का क्या है. वो तो पार्टी घर आकर देगी. मगर घर में कोई और था जो टिकट मांग रहा था. गौर की ही सीट से उनकी बहू कृष्णा गौर. जिन्हें विधानसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से टिकट मिला और वो विधायक भी चुनी गयीं. इस तरह बाबूलाल गौर के सफल और लंबे पॉलिटिकल करियर को विराम मिल गया.

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बाबूलाल गौर: एक अज़ीम शख़्सियत जो हर दिल अज़ीज़ थे

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First published: August 21, 2019, 7:20 AM IST
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