MP उपचुनाव के नतीजे CM चौहान, सिंधिया और कमलनाथ के भविष्य पर डालेंगे असर, ये है वजह

 मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में मंगलवार को 69.93 प्रतिशत मतदान हुआ और इन मतों की गणना 10 नवंबर को होगी. (फाइल फोटो)
मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में मंगलवार को 69.93 प्रतिशत मतदान हुआ और इन मतों की गणना 10 नवंबर को होगी. (फाइल फोटो)

राजनीति विश्लेषकों का अनुमान है कि सीएम शिवराज सिंह चौहान (CM Shivraj Singh Chauhan) के लिए बहुमत के 115 के जादुई आंकड़े पर पहुंचना आसान है. लेकिन किसी कारण से अगर वह इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाते, तो पार्टी में चल रहा विरोध का सुर और तेज हो सकता है

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भोपाल. मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) में 28 विधानसभा सीटों पर मंगलवार को हुए उपचुनाव (Bye election) के 10 नवंबर को आने वाले परिणाम न केवल प्रदेश की भाजपा नीत सरकार के भाग्य का फैसला करेंगे, बल्कि प्रदेश के तीन क्षत्रपों- मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan), पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ एवं भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतक भविष्य पर भी असर डालेंगे. इस साल मार्च में राज्य में सत्ता के लिए जो राजनीतिक उठापटक हुई थी, उसमें ये तीनों प्रभावशाली नेता शामिल थे. इस उठापटक में कमलनाथ के नेतृत्व वाली 15 महीने पुरानी कांग्रेस (Congress) नीत सरकार गिराने में सिंधिया की अहम भूमिका रही है, क्योंकि सिंधिया के मार्च में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आने के बाद उनके समर्थित कांग्रेस के 22 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया था और भाजपा में शामिल हो गये थे.

इससे कमलनाथ की तत्कालीन सरकार अल्पमत में आ गई थी, जिसके कारण कमलनाथ ने 20 मार्च को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और इसके बाद चौहान के नेतृत्व में 23 मार्च को फिर से भाजपा की सरकार बनी. भाजपा में आने के बाद सिंधिया इस साल जून में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सदस्य बने हैं. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा में आने के बाद से ही पूर्व में केन्द्रीय मंत्री रह चुके सिंधिया की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार में भी मंत्री बनने की महत्वाकांक्षा है. जब सिंधिया कांग्रेस में थे, तब 2018 में प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव के बाद वह कमलनाथ से मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पिछड़ गये थे. इसके अलावा, उन्हें कमलनाथ के स्थान पर प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बनाया गया.

सिंधिया का राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ने लगा
कांग्रेस द्वारा दरकिनार किए जाने से सिंधिया का राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ने लगा. इससे सिंधिया पार्टी से निराश थे और उनकी इस हताशा को भांपकर भाजपा ने इस अवसर को मौके में बदलकर फायदा उठाया तथा सिंधिया एवं उनके बागी समर्थकों के सहयोग से करीब सात महीने पहले सत्ता में फिर से वापसी की. राजनीतक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि चौहान के नेतृत्व में भाजपा उपचुनाव वाली इन 28 सीटों में से 15 से अधिक पर जीत दर्ज कर लेती है तो पार्टी में उनका कद और भी बढ़ जाएगा. चौहान अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आते हैं और प्रदेश में इस वर्ग की जनसंख्या 50 प्रतिशत से अधिक है.
विश्लेषकों ने कहा कि मार्च में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने चौहान को चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का दायित्व दिया था, क्योंकि जनता में उनकी छवि अच्छी है. माना जाता है कि जनता के चहेते नेता होने के कारण वह उपचुनाव में पार्टी को अधिक से अधिक सीटें जितवाकर 230 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के जादुई आंकड़े 116 को पार करवा सकते हैं. विशेषज्ञों ने बताया कि जब चौहान ने अपने मंत्रिमंडल का गठन किया, तो इसके लिए उन्हें पूरी तरह से छूट नहीं दी गई थी और इसके लिए उन्हें पार्टी के आला नेताओं से सलाह मशविरा करने के लिए कई दफा भोपाल से नई दिल्ली आना-जाना पड़ा.



इनमें से वर्तमान में भाजपा के 107 विधायक हैं
मध्य प्रदेश विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं. इनमें से वर्तमान में भाजपा के 107 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के घटकर 87 हो गये हैं. इनके अलावा, चार निर्दलीय, दो बसपा एवं एक सपा विधायक हैं. बाकी 29 सीटें रिक्त हैं, जिनमें से दमोह विधानसभा को छोड़कर 28 सीटों पर तीन नवंबर को उपचुनाव हो गये हैं और इनका परिणाम 10 नवंबर को आएगा. दमोह सीट पर उपचुनाव की तिथि घोषित होने के बाद कांग्रेस विधायक राहुल सिंह लोधी ने विधानसभा की सदस्यता एवं कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए. इन 28 सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम आने के बाद सदन में विधायकों की संख्या वर्तमान 202 से बढ़कर 229 हो जाएगी. इसलिए भाजपा को बहुमत के 115 के जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए इस उपचुनाव में मात्र आठ सीटों को जीतने की जरूरत है, जबकि कांग्रेस को पूरी 28 सीटें जीतनी होंगी.

राजनीति विश्लेषकों का अनुमान है कि चौहान के लिए बहुमत के 115 के जादुई आंकड़े पर पहुंचना आसान है. लेकिन किसी कारण से अगर वह इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाते, तो पार्टी में चल रहा विरोध का सुर और तेज हो सकता है तथा इससे केन्द्रीय नेतृत्व को उनके कद को कम करने का मौका मिल सकता है. ठीक इसी तरह से मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ भी यदि इस उपचुनाव में अच्छा प्रदर्शन करवाने में सफल रहते हैं तो पार्टी में उनकी जगह कायम रहेगी. लेकिन यदि वह ऐसा करने में असफल रहते हैं तो उन्हें भी आने वाले समय में पार्टी नेताओं से अनेकों मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. राहुल गांधी एवं प्रियंका गांधी जैसे अन्य राष्ट्रीय स्टार प्रचारकों के इस उपचुनाव में प्रचार न करने की वजह से उन्होंने स्वयं अपनी पार्टी की प्रचार की कमान संभाली और मतदाताओं को रिझाने के लिए अपने प्रत्याशियों के पक्ष में ताबड़तोड़ प्रचार किया.

विधायक ने पार्टी संगठन को चलाने के उनके तरीके पर सवाल उठाया था
‘सोनिया - ए बायोग्राफी’ पुस्तक के लेखक रशीद किदवई ने कहा, ‘‘यदि कांग्रेस इस उपचुनाव में खराब प्रदर्शन करती है तो पार्टी के नेता ‘एक व्यक्ति एक पद’ के सिद्धांत की आवाज उठा सकते हैं. इससे कमलनाथ जो वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ-साथ मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं, उन्हें इनमें से एक पद छोड़ना पड़ सकता है.’’ कांग्रेस के एक विधायक के अनुसार दो महीने पहले जब कमलनाथ ने अपने पार्टी के विधायकों को एकजुट रखने के लिए अपने निवास पर बैठक की थी, तो उनके एक करीबी विधायक ने पार्टी संगठन को चलाने के उनके तरीके पर सवाल उठाया था.

कमलनाथ को सदन में बहुमत के जादुई आंकड़े पर पहुंचने के लिए सभी 28 सीटों को जीतने की जरूरत है. किदवई ने कहा कि यदि वह 20 सीटों से अधिक पर भाजपा को मात दे देते हैं, तो वह न केवल चौहान की सरकार को बेदखल करने के लिए कड़ी चुनौती दे सकते हैं, बल्कि उनका पार्टी में कद और अधिक बढ़ जाएगा. हालांकि, वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए लगता है कि कांग्रेस के लिए 20 से अधिक सीटें जीतने का काम हासिल करना आसान नहीं है. उन्होंने कहा, ‘‘कमलनाथ कुशल राजनीतिज्ञ हैं. जिस तरह से भाजपा के वरिष्ठ विधायकों को दरकिनार कर चौहान के मंत्रिमंडल में 14 सिंधिया समर्थित नेताओं को मंत्री बनाया गया, इससे भाजपा के कुछ विधायक नाराज हैं और इसका फायदा उठाकर कमलनाथ कभी भी चौहान की सरकार को गिराने की कोशिश कर सकते हैं.’’ किदवई ने बताया कि 2018 में हुए चुनाव के बाद से कांग्रेस की तत्कालीन सरकार को समर्थन दे रहे बसपा के दो विधायक, एक सपा विधायक एवं दो निर्दलीय विधायक अपना समर्थन अब चौहान की भाजपा नीत सरकार को दे रहे हैं, जबकि दो निर्दलीय अभी भी कांग्रेस के साथ हैं.

केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलने के साथ-साथ उनका पार्टी में वर्चस्व बढ़ सकता है
वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक राकेश दीक्षित ने बताया कि यदि इस उपचुनाव में सिंधिया ग्वालियर-चंबल इलाके की 16 सीटों में 10 से अधिक सीटों पर भाजपा को जीत दिलाने में सक्षम रहे, तो उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिलने के साथ-साथ उनका पार्टी में वर्चस्व बढ़ सकता है. वहीं, खराब प्रदर्शन करने पर पार्टी में उनकी जो प्रतिष्ठा अभी है, वह धूमिल हो सकती है. उन्होंने कहा, ‘‘कांग्रेस के 22 विधायकों के मार्च में भाजपा में शामिल होकर कमलनाथ की सरकार गिराने के बाद से कांग्रेस के चार अन्य विधायक भी अब तक कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए हैं. इससे मध्य प्रदेश भाजपा ने सिंधिया के पार्टी में बोलबाले को पहले ही कम दिया गया है.’’ उन्होंने कहा कि उपचुनाव के लिए भाजपा की स्टार प्रचारकों की सूची में सिंधिया का नाम 10वें नंबर पर रखने से सिंधिया गुट के नेता पहले से ही नाराज हैं.

इन मतों की गणना 10 नवंबर को होगी
दीक्षित ने कहा कि पिछले महीने सिंधिया ने नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से मुलाकात की थी और कयास लगाए जा रहे थे कि वह भाजपा में अपना कद और मजबूत करने के लिए मिले हैं. मध्य प्रदेश में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में मंगलवार को 69.93 प्रतिशत मतदान हुआ और इन मतों की गणना 10 नवंबर को होगी.
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