माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली भावना की कहानी- 'सामने मंज़िल थी और मेरा ऑक्सीजन सिलेंडर ख़त्म होने लगा...'
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माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली भावना की कहानी- 'सामने मंज़िल थी और मेरा ऑक्सीजन सिलेंडर ख़त्म होने लगा...'
भावना डेहरिया

मेरा संदेश देश की लड़कियों को है कि किसी भी क्षेत्र में अगर वो दृढ़ निश्चय करें तो जीतना संभव है. हार न मानने की इच्छा और मेरी पसंद ही मुझे इस मुकाम पर ले कर आई

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मध्य प्रदेश की भावना डेहरिया ने हाल ही में दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट फतह की. उनका ये सफर रोमांचक तो था लेकिन इसमें हर पल ज़िंदगी के लिए ख़तरा था. हर कदम पर मौसम, कठिन चढ़ाई एक चुनौती थे. भावना ने हर चैलेंज को स्वीकार किया और अपने परिवार की फोटो हाथ में लिए मज़बूत विल पावर के साथ हिमालय की पर्वत श्रृंखला पर चढ़ती चली गयीं. उनके मज़बूत इरादों के आगे एवरेस्ट भी नतमस्तक हो गया. आगे पढ़िए भावना के रोमांचक सफर का पल-पल का हाल उन्हीं के शब्दों में. भावना छिंदवाड़ा के एक छोटे से तस्बे तामिया की रहने वाली हैं.

काठमांडू (नेपाल): मेरा माउंट एवरेस्ट का सफर 2 अप्रैल 2019 को भोपाल से शुरू हुआ. मेरा दिल्ली तक का सफर ट्रेन से था. मेरे परिवार और मेरे कॉलेज के कई सारे लोग मुझे स्टेशन छोड़ने आए और मेरे मिशन के लिए बधाई दी. 3 अप्रैल को मेरी दिल्ली से काठमांडू की फ्लाइट थी. जाते ही मैंने नेपाल का एक लोकल नंबर लिया जिससे मैं अपने लोगों से बात कर सकूं. एवरेस्ट पर उपयोग में आने वाले इंस्ट्रूमेंट मैंने एक महीने पहले ही काठमांडू आ कर परचेस कर लिए थे ताकि आखिरी समय में कुछ कमी या साइज का इशू न हो. 

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6 अप्रैल को हमें लूकला (2840 मी) के लिए निकलना था पर वेदर खराब होने के कारण उस दिन की सारी फ्लाइट कैंसिल हो गयी थीं. इसलिए हमें हेलिकॉप्टर से जाना पड़ा. लूकला पहुंचते ही हमने फाकडिंग की 2610 मी की ऊंचाई ट्रैक की. 7 अप्रैल को हम नामचे बाजार पहुंचे जो 3440 मी की ऊंचाई पर हैं. 8 अप्रैल तक हम जलवायु-अनुकूलन के लिए यहीं रुके. 9 अप्रैल को हमने खुमजंग जो कि ग्रीन वैली के नाम से भी जाना जाता है उसकी 3780 मी की चढ़ाई पूरी की. 10 अप्रैल को 3860 मीटर पर टेंगबोचे मोनेस्ट्री पहुंचे और यहां पहली बार हमे एवेरेस्ट दिखाई दिया. इससे हमारा जोश दुगना कर दिया. सबसे अच्छी बात यह भी रही कि मेरे शुद्ध शाकाहारी होने के बाद भी मुझे मेरी पसंद का खाना मिलता रहा.
11 अप्रैल को डिंगबोचे 4410 मीटर फिर 12 अप्रैल को लोबुचे 4910 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच कर फिर जलवायु-अनुकूलन के लिए एक दिन यहां रुके. 14 अप्रैल को हम एवेरेस्ट बेस कैम्प के लिए रवाना हुए जो 5364 मी की ऊंचाई पर है. 15 अप्रैल से 16 मई तक हमने कैम्प 1, कैम्प 2 और कैम्प 3 के प्रैक्टिस राउंड किए. 18 मई की सुबह फाइनल समिट के लिए मैने एवेरेस्ट बेस कैम्प से कैम्प 2 की 6500 मी की चढ़ाई शुरू की. एक दिन कैम्प 2 में रेस्ट करने के बाद 20 मई को हमने कैम्प 3 की 7400 मीटर की चढ़ाई ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ की. 

कैम्प 3 पहुंचते ही हमें वेदर अच्छा मिला और हम 21 मई की रात समिट के लिए निकल गए. 22 मई 2019 की सुबह मैं 8848 मीटर ऊंचाई पर दुनिया के सबसे ऊंचे शिखर माउंट एवेरेस्ट पर पहुंच गयी. एवेरेट के शिखर पर पहुंचना और फिर उसे व्यक्त करना शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.

यह धरती के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंचने की सोच से कहीं ज्यादा परे है. यह सिर्फ प्रदेश की पहली महिला एवरेस्ट विजेता बनने से कई ज्यादा महिला सशक्तिकरण और हिम्मत को बढ़ावा देना है. अगर मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव की मध्यम वर्ग परिवार की लड़की माउंट एवेरेस्ट फतेह कर सकती हूं तो मेरा संदेश देश की लड़कियों को है कि किसी भी क्षेत्र में अगर वो दृढ़ निश्चय करें तो जीतना संभव है. हार न मानने की इच्छा और मेरी पसंद ही मुझे इस मुकाम पर ले कर आई.

मैं तामिया जिला छिंदवाड़ा की रहने वाली हूं. मेरे पिताजी सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं. मेरी मां सोशल वर्कर हैं. जिस तरह मेरे माता पिता ने मुझ पर विश्वास किया और डॉक्टर इंजीनियर से हट कर फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई और इससे रिलेटेड टूर और ट्रैकिंग के लिए हमेशा साथ दिया.उसी तरह बाकी पेरेंट्स भी अगर अपने बच्चों की इच्छा को समझेंगे और उनका साथ देंगे तो देश में आने वाले समय में अलग-अलग क्षेत्र में काफी बच्चे अपने पेरेंट्स और देश का नाम रोशन करेंगे.

शिखर की चढ़ाई के वक्त मेरा ऑक्सीजन सिलेंडर का रेगुलेटर लीक करने लगा था. मैं लीकेज वाली जगह को पकड़ कर डेढ़ घंटे बैठी रही. हमारे पास एक्स्ट्रा रेगुलेटर नहीं था. शेरपा के अनुसार रेगुलेटर लेने के लिए हमें वापस कैम्प 4 लौटना पड़ता. यह कठिन समय था और मैं वापस नहीं लौटना चाहती थी. शेरपा के काफी कहने पर भी में नहीं मानी और मेरी जिद्द के आगे शेरपा मान गया. उसने मुझे अपना रेगुलेटर दिया और मुझे दूसरे ग्रुप के साथ आगे जाने को कहा.

सिलेंडर भी इतने समय में खाली होने लगा था. मैंने इस सिचुएशन में अपने ऑक्सीजन सिलेंडर का वाल्व आधा ही ओपन रखा ताकि ज़रूरत के मुताबिक थोड़ी-थोड़ी ऑक्सीजन मुझे मिलती रहे. इस वजह से में शिखर तक पहुंच पाई. इसी बीच मेरा शेरपा भी आ गया. उन्होंने रेगुलेटर ठीक कर लिया था. शिखर पर फोटो लेते वक्त अचानक में गिर पड़ी तब मेरा ऑक्सीजन सिलेंडर खाली हो चुका था. मेरे शेरपा ने उसे रिप्लेस किया. तब मैं वापस संभली शिखर पर मैंने खुद को बधाई दी. साथ में मेरे परिवार की फोटो थी जो मैं साथ ले कर गयी थी. फिर मैंने तिरंगे के साथ फोटो ली.दस मिनट शिखर पर रुकने के बाद वापस लौटने के लिए तैयार हुई.

मैंने हमारे प्रदेश के चीफ मिनिस्टर कमलनाथ जी को धन्यवाद दिया. जिनके सहयोग से में यहां तक आ सकी. इस पूरे सफर में मेरा स्वास्थ्य पूरी तरह ठीक रहा और आगे भविष्य में मौका लगा तो फिर में सागर माथा जाना पसंद करूंगी. मगर उससे पहले दुनिया के कुछ और शिखर भी मेरे टू डू लिस्ट में हैं. मुझे पहाड़ों ने इतना नाम दिया है. मुझे इनसे बहुत लगाव है. (भावना की फेसबुक वॉल से साभार)
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