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VIDEO : भोपाल के चौराहे की ये पब्लिक सब जानती है, फिल्म बनाना भी...
Bhopal News in Hindi

Kalpana Sharma | News18Hindi
Updated: August 25, 2017, 5:35 PM IST

अगर शतरंज का नाम लेते ही आपको विश्वनाथन आनंद की याद आती है तो कभी भोपाल के चक्की चौराहे पर पहुंच जाइए. इस इलाके में आपको शतरंज की बिसात सड़क के किनारे बिछी नजर आएगी. इस इलाके के लोगों ने इकतारा कलेक्टिव के साथ मिलकर एक फीचर फिल्म तैयार की है जिसका नाम है तुरुप.

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  • Last Updated: August 25, 2017, 5:35 PM IST
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अगर शतरंज का नाम लेते ही आपको विश्वनाथन आनंद की याद आती है तो कभी भोपाल के चक्की चौराहे पर पहुंच जाइए. इस इलाके में आपको शतरंज की बिसात सड़क के किनारे बिछी नजर आएगी.

यहां बच्चा-बच्चा शतरंज खेलने में माहिर है और अपनी चाल से एक दूसरे को खेल में मात देते यहां के लोग शहर से लेकर देश और अंतरराष्ट्रीय मामलों की चर्चा इस कभी न हटने वाली बिसात के इर्द-गिर्द ही करते हैं.

यह पूरा नज़ारा अपने आप में इतना दिलचस्प होता है कि अब इस पर एक फीचर फिल्म तैयार हो गई है जिसका नाम है - तुरुप. ख़ास बात यह है कि तुरुप को इसी इलाके के लोगों ने ‘इकतारा कलेक्टिव’ नाम के गैर सरकारी संगठन के साथ मिलकर तैयार किया है. बता दें कि इकतारा कलेक्टिव स्थानीय लोगों के साथ मिलकर फिल्में बनाने का नायाब प्रयोग करता आया है. फिल्म में अभिनय भी यहीं के लोगों ने किया है. तुरुप में आपसी रिश्तों पर जातिवाद और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों के असर को बखूबी दिखाया गया है. फिल्म की सहजता से आपको शायद महसूस भी न हो कि इसमें अभिनय करने वाले चेहरे पहले बार कैमरे का सामना कर रहे हैं.



खास बात यह भी है कि पर्दे के आगे और पीछे तुरुप की कमान महिलाओं ने ही संभाली है. पुणे एफटीआईआई की ग्रेजुएट महीन मिर्ज़ा और मध्यप्रदेश में सामाजिक मुद्दों पर काम करने वाली लेखक रिनचिन ने इस फिल्म को लिखा है. फिल्म तीन महिला किरदारों के आसपास घूमती है जो चौराहे पर शतरंज खेलती तो आपको नहीं दिखेंगी लेकिन उनके लिए गए फैसलों से उनकी आसपास की दुनिया पर पड़ने वाले असर को 'रूपक' के तौर पर खेल की चाल में भी देखा जा सकता है.



फिल्म की लेखक रिनचिन बताती हैं ‘आमतौर पर आपको सार्वजनिक जगहों पर, चौराहों पर महिलाएं शतरंज खेलती नहीं दिखेंगी, फिल्म में भी ऐसा ही है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि राजनीतिक, सामाजिक मामलों में उनका दख़ल नहीं है. दख़ल है औऱ वह अपने मुद्दों को समझती भी हैं और अपने फैसले खुद लेती भी हैं.’

एक और दिलचस्प बात – फिल्म में मोनिका का मुख्य किरदार मौलिना ने निभाया है जो असल जीवन में घरेलू कर्मचारी हैं. मौलिना कई सालों से भोपाल में यही काम कर रही है. उन्होंने शादी नहीं की है और वह एक आत्मनिर्भर महिला हैं. फिल्म में मोनिका के किरदार में भी उनके इस व्यक्तित्व का असर साफ तौर पर देखा जा सकता है. वहीं अस्पताल में गर्भनिरोधक गोलियों का आवंटन करने वाली पूर्णिमा का रोल शीला ने निभाया है जो 12 सालों से सफाई का ही काम करती आ रही हैं. न्यूज़ 18 से अपने अनुभव साझा करते हुए शीला बताती हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि फिल्म में काम करने का मौका उन्हें कभी मिल पाएगा. शीला कहती हैं कि फिल्म में काम करने के लिए उनके परिवार और बस्ती से उन्हें पूरा सहयोग मिला.

Turup
शीला ने फिल्म में अभिनय किया है जो असल जीवन में घरेलू कर्मचारी है.


सीमित संसाधनों के साथ बनी यह फिल्म 2 लाख रुपये के क्राउड फंड से तैयार की गई है. लेकिन इससे भी अहम बात यह है कि फिल्म के टाइटल्स में निर्देशक का नाम नहीं लिखा गया है क्योंकि तुरुप को पर्दे पर लाने में किसी एक का नहीं, कइयों का हाथ लगा है. फिल्म की कास्टिंग से जुड़े सुशील कुमार बताते हैं कि ‘इकतारा कलेक्टिव का मकसद ही है स्थानीय लोगों को साथ में लेकर फिल्म को तैयार करना. क्योंकि हम इलाके के लोगों की कहानियां उन्हीं के माध्यम से पर्दे पर लेकर आते हैं इसलिए किसी एक को डायरेक्टर का नाम देने के बजाय हम इसे एक सामूहिक प्रयास कहना ज्यादा पसंद करते हैं.’

इससे पहले इकतारा ने ‘जादुई मच्छी’ नाम की फिल्म भी बनाई थी जिसे नर्मदा नदी के किनारे बसे भीलपुरा इलाके के लोगों के साथ मिलकर बनाया गया था. सुशील ने बताया कि किस तरह शुरू में अभिनय करना स्थानीय लोगों के लिए थोड़ा बोरिंग होता है क्योंकि बार बार टेक देना बोझिल काम लगता है. लेकिन एक बार फिल्म में दिलचस्पी बढ़ने के बाद गैर पेशेवर कलाकार भी अपना सर्वोत्तम देने से पीछे नहीं हटते.

तुरुप का मजबूत पक्ष उसके संगीत को भी माना जा रहा है. कबीर के दोहों को संगीत में बेहद खूबसूरती से पिरोया गया है. कबीर गाने वाले देव नारायण सरोलिया और उनके साथियों ने फिल्म के संगीत में योगदान दिया है. फिल्म की साउंड रिकॉर्डिस्ट प्रियंका ने बताया कि किस तरह इसके संगीत को भी सामूहिक रूप से तैयार किया गया है.

रिकॉर्डिंग के वक्त के अनुभव साझा करते हुए प्रियंका कहती हैं कि 'अक्सर हम गानों की रिकॉर्डिंग के लिए स्टूडियो तलाशते हैं लेकिन इस फिल्म के संगीत की रिकॉर्डिंग देवास के एक गांव में ईंट के एक छोटे से घर के अंदर की गई है.'
प्रियंका कहती हैं कि कबीर के दोहे जितने तार्किक होते हैं, तुरुप जैसी तर्कसंगत फिल्म में उनसे बेहतर और किसे गाया जा सकता था.

तुरुप अपनी कहानी, उसे कहने के अंदाज़ और उसके पीछे शामिल लोगों की वजह से समीक्षकों का ध्यान बटोर रही है. बहुत जल्द ‘तुरुप’ की बिसात आम दर्शकों के बीच भी बिछाई जाएगी. पब्लिक के लिए, पब्लिक के सहयोग से ही बना इस तरह का सिनेमा पब्लिक के बीच कितना खरा उतरता है, यह जानने के लिए थोड़ा इंतजार कीजिए.

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First published: August 25, 2017, 10:39 AM IST
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