VIDEO: 1984 की वो काली रात, यहां कैद है गैस पीड़ितों का दर्द, सुनिए...

Bhopal Gas Tragedy: 2-3 दिसंबर 1984 की रात को जो घटा उसे बयां करना बेहद मुश्किल है. इस साल उस काली रात को गुजरे 34 बरस हो गए. बहुत से लोग हैं जो उस रात का जिक्र कर अब उन लम्हों का दर्द बयां करते हैं.

News18 Madhya Pradesh
Updated: December 3, 2018, 10:47 AM IST
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Updated: December 3, 2018, 10:47 AM IST
भोपाल गैस त्रासदी, ये शब्द जेहन में आते ही वो मंजर आंखों के सामने खुद ब खुद आ जाता है, जब हर कहीं दर्द से चीख पुकार मची थी. हजारों लोग मौत की नींद सो चुके थे तो हजारों दर्द में कराह रहे थे. लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि चंद मिनटों में ये क्या हुआ. उस रात भोपाल के करीब 15,000 हजार लोग रात में सोए लेकिन सुबह का सूरज नहीं देख पाए.

2-3 दिसंबर 1984 की रात को जो घटा उसे बयां करना बेहद मुश्किल है. इस साल उस काली रात को गुजरे 34 बरस हो गए. बहुत से लोग हैं जो उस रात का जिक्र कर अब उन लम्हों का दर्द बयां करते हैं. लेकिन एक जगह भोपाल में ऐसी है जहां आज भी उन लम्हों का दर्द कैद है.

1984 की वो रात रात की 11.30 बज रहा था उस वक्त हमारे मकानदार निकले, क्या हुआ, तो दरवाजा खोला तो सब लोग भाग रहे थे. सब चिल्ला रहे थे गैस निकला गैस निकला. भागो.. भागो.. हम भी अपने बच्चों को लेकर भागे बैरसिया रोड पर. हम लोगों की आंखे भी नहीं खुल रही थी. आंखो में जलन हो रही थी


ये आवाज शहजादी बी है कि जो साक्षी हैं भोपाल की उस काली रात की, जिसका दर्द आज भी बच्चों में अपंगता के रुप दिख रहा है. शहजादी बी बताती हैं कि उस रात एक दम से हंसते खेलते परिवार लाशों में तब्दील हो गए. हालात ऐसे थे कि लाशों को ढोने के लिए ठेलों का इस्तेमाल हो रहा था. लाशें इतनी थी कि कब्रस्तान में एक गड्ढा खोद सबको उसी में डाला गया. जाने कितने हिन्दू उस दिन दफ्न हुए तो कितने ही मुस्लिमों का शवदाह हुआ.

शबिस्ता बी की तरह यहां आवाजों में कई परिवारों के दर्द कैद हैं. अपने 3 साल के बेटे साजिद को उस काली रात खोने वाली बिस्मिल्ला बी ने यहां अपने बेटे की आखिरी निशानी उसके कपड़ों को संजोया है. वो बताती हैं उस उस रात उन्होंने अपने बेटे को आखिरी बार आवाज देकर पुकारा था, उसके बाद वो कहां गया कहां दफ्नाया गया उन्हें मालूम नहीं.

उस रात का दर्द झेलने वाले हजारों लोग हैं. अपने बेटे विनोद के ज्योमेट्री बॉक्स को म्यूजियम में रखवाने वाली सावित्री बाई बताती हैं कि उनके बेटे को ड्राइंग का बहुत शॉक था. उसके कहने पर ही उसके पिता ये ज्योमेट्री बॉक्स उसके लिए लाए थे. पढ़ने में विनोद बहुत सीधा था


कहीं आंगन की चहचहाहट खो गई तो कहीं बच्चे अनाथ हो गए. 'रिमेम्बर भोपाल म्युजियम' अपनों की यादों को हमेशा जिंदा रखने किसी ने अपनी मां की साड़ी दी है, तो कहीं माता पिता अपने बच्चों के कपड़े वहां संजोए हैं. यादों को संभाल कर रखे इस म्यूजियम में जाकर लगता है मानों आज भी वक्त ठहर सा गया है. 1984 में यूनियन कार्बाईड फैक्टरी से निकला जहर हजारों लोगों की जिंदगियां लील गया. ऐसे में बची तो बस यादें....
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(भोपाल से सोनिया राणा की रिपोर्ट)

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