मध्यप्रदेशः कोरोना के साथ ब्लैक फंगस का कहर, दो-दो मोर्चों पर एक साथ जंग

मध्य प्रदेश में कोरोना के बाद काली फफूंद से बचाव की तैयारियों में जुटी है सरकार.

Fight Against Black Fungus: कोरोना से लड़ने के साथ-साथ ब्लैक फंगस नामक जानलेवा बीमारी के कहर से निपटने के लिए जंग का एक दूसरा मोर्चा भी खोलना पड़ा है. कोविड से उबरे रोगियों में डायबिटीज के शिकार और कमजोर इम्युनिटी वालों पर यह बीमारी सबसे ज्यादा हमला बोल रही है.

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भोपाल. दिल्ली, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, हरियाणा जैसे करीब एक दर्जन राज्यों में मप्र भी शुमार है, जिसे कोरोना महामारी के लड़ने के साथ-साथकाली फफूंद याने ब्लैक फंगस (Black Fungus) नामक जानलेवा बीमारी के कहर से निपटने के लिए जंग का एक दूसरा मोर्चा भी खोलना पड़ा है. मध्यप्रदेश में अब तक इस बीमारी के 450 से ज्यादा मरीज मिल चुके हैं, करीब तीन दर्जन मरीजों की मौत हो चुकी हैं, दो दर्जन से ज्यादा मरीज अपनी आंखें गंवा चुके हैं. कोरोना से लड़ रही शिवराज सरकार के सामने अब इस नई बीमारी ब्लैक फंगस ने चुनौती बढ़ा दी है. सरकार ने ब्लैक फंगस के मरीजों के इलाज के लिए जिलों के अस्पतालों में अलग-अलग वार्ड बनाए जाने के साथ ही जरूरी इंजेक्शन मुहैया कराने, उसकी कालाबाजारी रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं.

मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग ने हर संभाग के लिए प्रोटोकाल जारी कर घर-घर सर्वे, इलाज, दवा, निगरानी से लेकर तमाम दिशा-निर्देश जारी किए हैं. जिलों के कलेक्टर भी अपने स्तर पर हिदायतें जारी कर रहे हैं. वहीं राज्य मानव अधिकार आयोग ने भी ब्लैक फंगस की बीमारी को लेकर सरकारी इंतजाम चाकचौबंद कराने राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा की मंगलवार को दाखिल याचिका पर एक्शन लेते हुए सरकार, संबंधितों को नोटिस जारी करते हुए 28 मई तक पूरी रिपोर्ट मांगी है.

नए संकट से घिरा प्रदेश
कोरोना से लड़ता प्रदेश नए संकट से घिरता जा रहा है. यह संकट है म्यूकर माइकोसिस (Muker Mycosis) यानी ब्लैक फंगस की बीमारी का. दरअसल यह बीमारी कोरोना से उबरे मरीजों में स्टेरायड या अन्य कारणों से लगातार बढ़ती जा रही है. कमजोर इम्युनिटी वाले, डायबिटीज के शिकार लोगों को यह बीमारी न सिर्फ जकड़ रही है, बल्कि जानलेवा साबित हो रही है. ब्लेक फंगस के प्रदेश में 450 से ज्यादा मरीज सामने आ चुके हैं. भोपाल सहित 16 शहरों में करीब 36 लोगों की मौतें हो चुकी हैं. यह तो वह आंकड़े हैं, जो सामने आए हैं, वरना हकीकत में ब्लैक फंगस के शिकार बने लोगों की संख्या कहीं ज्यादा है. कई मौतें तो रिपोर्ट ही नहीं की गई हैं. केवल भोपाल के ही सरकारी और निजी अस्पतालों में करीब सवा सौ मरीज भर्ती है, 50 मरीज तो भोपाल के गांधी मेडिकल कालेज में लिए दाखिल हैं. भोपाल में ही ब्लैक फंगस के 7 मरीजों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोगों को अपनी आंख की रोशनी गंवानी पड़ी हैं.

कहां-कितने मरीज
मंगलवार को सामने आए आंकड़ों के मुताबिक भोपाल में 125, इंदौर में 135, सिंगरौली में 02 रीवा में 09, छिंदवाड़ा में 4, सतना में 2, जबलपुर में 55, उज्जैन में 18, ग्वालियर में 26 के अलावा बाकी मरीज मरीज शाजापुर, रतलाम, नीमच, खरगौन बड़वानी और खंडवा के अस्पतालों में भर्ती हैं. राज्य के 16 जिले प्रभावित हैं. न सिर्फ अस्पताल में इलाज कराने वाले, बल्कि हो आइसोलेशन में इलाज ले चुके मरीज भी ब्लैक फंगस का शिकार हो रहे हैं. ब्लैक फंगस से संक्रमित लोगों को आंखों में लाली और दर्द की समस्या होती है. कुछ लोगों को डबल विजन और अंधापन होने का खतरा भी होता है. लंग्स को बुरी तरह प्रभावित करता है. यहां तक कि मरीज की जान तक चली जाती है.

एक्शन में सरकार
बीते तीन-चार दिनों में ब्लैक फंगस के इलाज के लिए जरूरी इंजेक्शन के अभाव में मरीजों की मौतों और इंजेक्शन की कालाबाजारी की खबरें सरकार तक पहुंचीं, वैसे ही सरकार एक्शन में आई और सोमवार को लाइफोसोलम एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन के 2000 डोज गुजरात से मंगवाए. इनमें से ग्वालियर 300, इंदौर, 500, भोपाल 300, जबलपुर 300 और रीवा 100 इंजेक्शन दे भी दिए गए. हालांकि यह डोज भर्ती मरीजों की संख्या के हिसाब से बुधवार तक ही चल पाएंगे. मध्य प्रदेश ने केन्द्र सरकार से भी 24000 इंजेक्शन और मांगें हैं. मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए कि प्रदेश में ब्लैक फंगस (म्यूकर माइकोसिस) के उपचार के लिए जगह-जगह कैंप लगाए जाएं. ब्लैक फंगस के इलाज के लिए इंदौर, रीवा, ग्वालियर, भोपाल, जबलपुर के 5 संभागीय मुख्यालयों पर इलाज की व्यवस्था करना तय किया है.

ब्लैक फंगस को रोकने प्रोटोकॉल जारी
स्वास्थ्य आयुक्त आकाश त्रिपाठी ने भी एक प्रोटोकॉल जारी कर ब्लैक फंगस को रोकने के लिए निर्देश जारी किए हैं. इसमें कहा गया है कि कोविड रोगी के साथ संदिग्ध और ठीक हो चुके व्यक्तियों में डायबिटीज की प्रतिदिन निगरानी रखी जाए. किसी भी स्थिति में स्टेरॉयड और ब्रॉड स्पेक्ट्रम एंटी बायोटिक्स का अनावश्यक अनुचित सेवन नहीं कराया जाए. ऑक्सीजन सपोर्टेड रोगियों के लिए ह्यूमिडिफायर बॉटल में स्टराइल अथवा डिस्टिल्ड वाटर का उपयोग किया जाए.

कैसे रुके कालाबाजारी
राज्य में ब्लैक फंगस के मरीज बढ़ने के साथ ही इसकी दवा एम्फोटेरिसिन-बी की मांग बढ़ गई है, रेमडेसिविर की तरह इसकी भी कालाबाजारी हो रही है. अस्पतालों की लूट और इंजेक्शन दवाओं की कालाबाजारी ने प्रदेश में अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है. ऐसे में सरकार ने यह तय किया है कि लोगों को फंगस के इलाज का इंजेक्शन अस्पतालों और नर्सिंग होम के जरिए ही मिल सकेगा. अस्पतालों और दवा कारोबारियों को रोज इसका हिसाब देना होगा. निजी अस्पतालों के लिए इंजेक्शन की डिलेवरी अस्पताल से ही होगी.

विवेक तन्खा ने लगाई याचिका
राज्यसभा सदस्य और वरिष्ठ कांग्रेस नेता, पूर्व महाधिवक्ता विवेक तन्खा ने राज्य मानव अधिकार आयोग में मंगलवार को याचिका दाखिल की. याचिका में तन्खा ने कहा कि कोविड-19 महामारी के साथ अब ब्लैक फंगस की बीमारी से बड़ी संख्या में मरीजों की मृत्यु हो रही है. बीमारी से मृत्युदर 55 फीसदी तक है. इंजेक्शन बाजारों में आसानी से उपलब्ध नहीं है. सिस्टम की नाकामी और नकली दवाओं की सप्लाई होने से मरीजों की मौते भी हो रही हैं और यह पता नहीं चल रहा है कि मौतें बीमारी से हुई हैं अथवा नकली दवाओं से। तन्खा ने याचिका पर तुरंत संज्ञान लेते हुए दवा और इलाज के लिए दिशा-निर्देश देने का आग्रह आयोग से किया गया है.

ब्लैक फंगस ने कोरोना की दूसरी लहर में कहर ढाया
कोरोना की पहली वेब में महाराष्ट्र में 20-25 मरीज मिले थे. पहला केस दिसंबर 2020 में मिला था. इससे पहले बेहद कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों में ब्लैक फंगस के इक्का-दुक्का केस ही देखने को मिलते थे. मुंबई के एक डॉक्टर अजित सिन्हा के मुताबिक कोरोना की कहर ढाने वाली दूसरी लहर में जब डाक्टर्स ने कई जगह स्टेरायड देना शुरू कर दिया. स्टेरॉयड शुगर लेवल बढ़ा देता है और इम्युनिटी को कमजोर कर देता है. इसमें सबसे ज्यादा शिकार हुए वो लोग, जिन्हें पहले से डायबिटीज थी. कई राज्यों में एक साथ यह बीमारी महामारी की तरह बड़ी समस्या बन गई. पहले यह बीमारी ज्यादा नहीं होती थी, इसलिए इंजेक्शन भी बड़ी संख्या में नहीं बनते थे. अब एकदम मरीज बढ़ने से इंजेक्शन चाहिए. यह इंजेक्शन सीरम और सिपला कंपनियां बनाती है. पूरा संकट डिमांड और सप्लाई और प्रबंधकीय समस्या के कारण पैदा हुआ है. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं.)