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स्वतंत्र देव सिंह को मध्य प्रदेश का प्रभारी बनाने के पीछे क्या है रणनीति?

स्वतंत्र देव सिंह (File Photo)

स्वतंत्र देव सिंह (File Photo)

कौन हैं स्वतंत्र देव सिंह जिन्हें बीजेपी ने बनाया है मध्य प्रदेश का प्रभारी. क्या 2019 के लोकसभा चुनाव में वे ओबीसी खासतौर पर पटेलों को रिझा पाएंगे?

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एमपी, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हार के बाद बीजेपी ने जातीय संतुलन साधने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. यूपी के परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को मध्य प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य का प्रभारी बना दिया गया है. सियासी जानकार कह रहे हैं कि उन्हें यह जिम्मेदारी देने के पीछे पार्टी ने सियासी गुणाभाग जरूर लगाया होगा. स्वतंत्र देव का नाम यूपी के सीएम पद की रेस में भी था. आईए समझते हैं कि आखिर उनको एमपी भेजने के पीछे क्या रणनीति है?

दरअसल, स्वतंत्र देव सिंह ओबीसी जाति के समीकरणों के हिसाब से बिलकुल फिट बैठते हैं. वह कुर्मी समाज से आते हैं. उरई (बुंदेलखंड) के रहने वाले हैं. हालांकि, वे मूलरूप से मिर्जापुर के रहने वाले हैं. एनएसएसओ के आंकड़ों की बात करें तो एमपी में 41.5 फीसदी ओबीसी हैं. दूसरी ओर गुजरात के बाद मध्य प्रदेश दूसरा राज्य है जहां पाटीदार (पटेल) समाज का बड़ा वोट बैंक है. 60 लाख के करीब पाटीदार वोट प्रदेश की 34 सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं. मध्यप्रदेश के मालवा इलाके में सबसे ज़्यादा, 35 लाख से ज़्यादा पाटीदार वोट हैं. (ये भी पढ़ें: क्या योगी-मोदी के गढ़ में बीजेपी को चुनौती दे पाएंगी प्रियंका गांधी? )

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मंदसौर किसान गोलीकांड के बाद यह वोट बैंक बीजेपी से नाराज बताया जाता है. हालांकि, शिवराज सिंह चौहान ने अपनी कैबिनेट में पाटीदार नेताओं को जगह दी. लेकिन भावांतर, कर्ज़माफी की घोषणा के बाद भी प्रदेश का किसान खुश नहीं दिख रहा है. इसकी वजह से यहां पर गुजरात के पाटीदार नेता हार्दिक पटेल ने पैर जमाना शुरू कर दिया है. जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिलने की संभावना है. ऐसे में बीजेपी स्वतंत्र देव सिंह के सहारे ओबीसी, खासतौर पर पाटीदार समाज को लुभाने की कोशिश कर सकती है. वरिष्ठ पत्रकार हिमांशु मिश्र के मुताबिक जातीय समीकरण को देखते हुए ही बीजेपी ने स्वतंत्र देव सिंह को एमपी का प्रभारी बनाया है.

दूसरी बात ये है कि स्वतंत्र देव सिंह पीएम नरेंद्र मोदी के करीबी हैं. उन्होंने बीजेपी में कार्यकर्ता से लेकर संगठनकर्ता तक का सफर तय किया है. लोकसभा चुनाव से लेकर यूपी विधानसभा चुनाव तक यूपी में मोदी की सभी रैलियों को सफल बनाने का जिम्मा उन्हीं के पास था और अपनी संगठन क्षमता को उन्होंने साबित भी किया. इसीलिए सीएम पद के दावेदारों में बुंदेलखंड के इस  बीजेपी नेता स्वतंत्र देव सिंह का नाम भी चर्चा में था. बुंदेलखंड से होने की वजह से उनका इस्तेमाल एमपी के बुंदेलखंड वाले इलाके में बखूबी किया जा सकता है.

पत्रकार से राजनेता तक

स्वतंत्र देव सिंह कभी पत्रकारिता किया करते थे. छात्र राजनीति के बीच वह 1989-90 में 'स्वतंत्र भारत' अखबार से जुड़े. उरई में वह इसके रिपोर्टर रह चुके हैं. स्वतंत्र देव सिंह बेहद गरीबी में पले-बढ़े हैं. छात्र जीवन में ही राजनीति से जुड़े, लेकिन कभी भी करिश्माई सफलता नहीं मिली. कॉलेज में छात्र संघ चुनाव हारे. 2012 में एमएलए इलेक्शन भी बुरी तरह से हारे. बताते हैं कि उनकी जमानत जब्त हो गई थी. वो मूल रूप से मिर्जापुर के रहने वाले हैं. लेकिन पुलिस में तैनात जब उनके भाई का तबादला हुआ तो उन्हीं के साथ 1984 में वे उरई (जालौन) आ गए. 1985 में ग्रेजुएशन में दाखिला लिया. 1986 में उरई के डीएवी डिग्री कॉलेज में छात्र संघ चुनाव लड़ा लेकिन सफल नहीं हुए. वो एबीवीपी से जुड़े रहे.

Swatantra Dev Singh       यूपी के परिवहन मंत्री हैं स्वतंत्र देव सिंह (photo-twitter)


'कांग्रेस सिंह' से कैसे बने 'स्वतंत्र देव'

पहले स्वतंत्र देव सिंह का नाम कांग्रेस सिंह था. संघ ने उनका नाम स्वतंत्र देव सिंह रख दिया. यह नाम स्वतंत्र भारत अखबार से ही प्रेरित था, जिसमें कांग्रेस सिंह काम किया करते थे. इस तरह लोग उन्हें स्वतंत्र देव सिंह के नाम से जानने लगे. 2014 में हुए आम चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने स्वतंत्र देव को उत्तर प्रदेश में होने वाली रैलियों के आयोजन का काम सौंप दिया. बताते हैं कि इसी वजह से वो नरेंद्र मोदी व अमित शाह के करीब आ गए.

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