ANALYSIS: मध्य प्रदेश उपचुनाव में कांग्रेस को क्यों मिली करारी हार?

 (फाइल फोटो)
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मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद सवाल उठता है कि आखिर पार्टी से कहां पर चूक हुई. क्या कांग्रेस ने कमलनाथ के भरोसे उपचुनाव की सारी जिम्मेदारी सौंपकर गलती की?

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 7:57 AM IST
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भोपाल. मध्य प्रदेश विधानसभा (Madhya Pradesh assembly) की 28 सीटों पर हुए उपचुनाव (by-election) में बीजेपी को उम्मीद से बड़ी जीत मिली. इन 28 में से 21 सीटों पर बीजेपी को बहुमत मिला जबकि कांग्रेस के हिस्से 7 सीटें आईं. इन 21 सीटों के साथ ही 230 सीटों वाले मध्य प्रदेश विधानसभा में बीजेपी के पास 128, कांग्रेस के पास 94, बीएसपी के पास 2 और अन्य के खाते में 6 सीटें रह गई. ऐसे में मध्य प्रदेश में पार्टी की हार स्वीकार करते हुए कमलनाथ ने ट्विटर हैंडल पर लिखा 'हम जनादेश को शिरोधार्य करते हैं. हमने जनता तक अपनी बात पहुंचाने का पूरा प्रयास किया. मैं उपचुनाव वाले क्षेत्रों के सभी मतदाताओं का भी आभार मानता हूं. उम्मीद करता हूं कि भाजपा की सरकार किसानों के हितों का ध्यान रखेगी, युवाओं को रोजगार देगी, महिलाओं का सम्मान व सुरक्षा कायम रखेगी, हम जनादेश को स्वीकार कर विपक्ष का दायित्व निभाएंगे, प्रदेश हित और जनता के हित के लिए सदैव खड़े रहेंगे, संघर्षरत रहेंगे. इन परिणामों की हम समीक्षा करेंगे.

कांग्रेस ने कमलनाथ के भरोसे उपचुनाव की सारी जिम्मेदारी सौंपकर गलती की?

मध्य प्रदेश में कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद सवाल उठता है कि आखिर पार्टी से कहां पर चूक हुई. क्या कांग्रेस ने कमलनाथ के भरोसे उपचुनाव की सारी जिम्मेदारी सौंपकर गलती की? ऐसे में इस सवाल के जवाब में यही सामने आ रहा है कि वास्तविकता में कमलनाथ के सामने यह स्थिति खड़ी रही कि - आपने बिगाड़ा है, आप ही संभालिये. वहीं कमलनाथ के लिए सिंधिया और उनके समर्थकों को ना संभाल पाना भी इस चुनाव में मिली हार की वजह माना जा रहा है.
 प्रत्याशियों के चुनाव में गलती?



सवाल यह भी उठता है कि क्या कांग्रेस ने उपचुनाव में अपने प्रत्याशियों के चुनाव में गलती कर दी? हालांकि यहां प्रत्याशियों के चुनाव की बात की जाए तो यहां कई सीटों पर कांग्रेस को प्रत्याशी ही नहीं मिले, बताया जा रहा है कि ऐसे में प्रत्याशी ही बहुत मुश्किल से मिले.

'आइटम' कहना पड़ा भारी?

वहीं चुनावी माहौल के बीच कमलनाथ का इमरती देवी को आइटम कहना भी उनके खिलाफ़ हुए मतदान की वजह माना जा रहा है. लेकिन मतगणना पर नज़र करते हुए अगर देखा जाए तो वाकई में इमरती देवी को आइटम कहने से कमलनाथ पर कोई फर्क पड़ता तो यह इमरती देवी की सीट डबरा में ज़रूर दिखाई देता. लेकिन इमरती देवी खुद इस सीट को नहीं बचा सकीं. डबरा से कांग्रेस प्रत्याशी और इमरती देवी के रिश्तेदार सुरेश राजे से चुनाव हार गईं.

कमलनाथ के 15 महीने vs शिवराज के 15 साल?

तमाम सवालों के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि इस चुनाव में कमलनाथ के 15 महीने vs शिवराज के 15 साल के रूप में देखा गया. यहां कमलनाथ का जनता से संवाद नहीं कर पाना हार की एक वजह बना. ऐसे में अगर शिवराज के ग्राउंड कनेक्ट की बात की जाए तो कहीं ना कहीं कमलनाथ इस मामले में उनसे कोसों दूर नजर आते हैं.

'बिकाऊ नहीं-टिकाऊ चाहिए' vs 'माफिया के ख़िलाफ़ अभियान'?

कमलनाथ के 'बिकाऊ नहीं-टिकाऊ चाहिए' के सामने शिवराज का माफिया के ख़िलाफ़ अभियान और बिजली बिल माफ़ी ज्यादा कारगर रहा. कमलनाथ का 'बिकाऊ-टिकाऊ' पैंतरा काम नहीं आया. जोकि इस चुनाव के नतीजों में साफ़ देखा जा सकता है.
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