Opinion: भाजपा में क्यों असहज हो रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया?

मध्य प्रदेश भाजपा में क्यों असहज महसूस कर रहे हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया.

मध्य प्रदेश भाजपा में क्यों असहज महसूस कर रहे हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया.

Jyotiraditya Scindia in BJP: ज्योतिरादित्य सिंधिया के भारतीय जनता पार्टी में असहज महसूस करने के पीछे सियासी जानकार बीते 4-6 महीनों के घटनाक्रम का जिक्र करते हैं, जो यह बताते हैं कि भाजपा के बड़े नेताओं और सिंधिया के बीच टकराहट और खाई बढ़ती जा रही है.

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भोपाल. पार्टी बदलने वाले चेहरों को राजनीतिक कुनबे में सहज स्वीकारना मुश्किल होता है. चेहरे जितने व्‍यापक जनाधार वाले होते हैं, मुश्किल उतनी ज्‍यादा होती है. ऐसा ही हाल ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, जो कमलनाथ की सरकार गिराकर भाजपा में शामिल हो गए थे और अपना खानदानी रिश्ता पार्टी के साथ गिनाने, जीने-मरने की कसमें खाने लगे थे. लेकिन अब खबरें हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा में असहज महसूस कर रहे हैं. उन्हें पार्टी में वह महत्व और स्थान नहीं मिल रहा है, जिसकी अपेक्षा वह कर रहे थे.

सियासी पंडितों के इन कयासों के पीछे बीते 4-6 महीनों के वो घटनाक्रम हैं, जो बताते हैं कि भाजपा के बड़े नेताओं और सिंधिया के बीच टकराहट और खाई बढ़ती जा रही है. सत्ता और संगठन में उन्हें कदम-कदम पर उन्हें हैसियत दिखा दी जाती है और तरजीह नहीं दी जाती है.

दमोह चुनाव और कोरोना काल में भी दूरी

अप्रैल में हुए दमोह उपचुनाव और पं.बंगाल, असम समेत 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया कहीं नजर नहीं आए. खबर आई कि देश-प्रदेश की सियासत में उन्हें हाशिए पर डाल दिए और कोई पूछ-परख न करने से वह नाराज हैं और अपने घर यानी ग्वालियर महल में खुद को कैद कर लिया है.

कोरोनाकाल में भी जबकि ग्वालियर, भिंड, मुरैना सहित पूरे राज्य में लोग अस्पताल में बिस्तर, ऑक्सीजन, दवाओं, वेंटिलेटर के अभाव में दम तोड़ते रहे, चीत्कार करते रहे. जब जनता को उनकी सबसे ज्यादा दरकार है, तब वह जंग के मैदान से गायब हैं. इक्का-दुक्का पत्रों के जरिए या ग्वालियर-चंबल में होने वाली समीक्षा बैठकों में कभी-कभार दिखाई देते हैं. ऐसे समय में सत्ता-संगठन राहत से जुड़े जो काम कर रहा है, उसमें भी उनकी भूमिका नहीं दिख रही.

ट्वीट हटाने पर कांग्रेस ने साधा था निशाना

हाल में ज्योतिरादित्य सिंधिया फिर निशाने पर आ गए थे, जब पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर उन्होंने एक ट्वीट किया. ट्वीट में उन्होंने राजीव गांधी को ‘आधुनिक भारत का निर्माता और भारत रत्न’ कहते हुए नमन किया, लेकिन उसके तुरंत बाद उन्होंने ट्वीट को डिलीट कर नया ट्वीट किया, जिसमें राजीव गांधी को संबोधित किए गए वाक्य हटा दिए. इस पर सियासी बवाल मचा. कांग्रेसियों ने हमला बोलते हुए कहा कि राजीव गांधी पर इस ट्वीट से भाजपा नेताओं की नाराजगी देखकर सिंधिया डर गए और ट्वीट बदल दिया. कुछ लोगों ने कहा ‘डरपोक महाराज’. कुछ लोग कहने लगे अगर सिंधिया ट्वीट न हटाते तो उनका केन्द्रीय मंत्री की वो कुर्सी पहले ही खतरे में पड़ जाती, जो उन्हें अभी तक मिली नहीं है और जिसकी वो आस लगाए बैठे हैं.



ग्वालियर-चंबल में गहरी हो रही तोमर-सिंधिया के बीच खाई

वैसे तो सिंधिया और तोमर के बीच सियासी दूरियां बढ़ने की शुरुआत तो दो दर्जन से ज्यादा सीटों पर उपचुनाव के दौरान शुरू हो चुकी थीं, लेकिन नतीजे आने के बाद यह दूरी साफ नजर आने लगी. जनवरी में मुरैना में जहरीली शराब से 28 मौतों की घटना के बाद ये दूरियां खाई में बदलती दिखीं. दरअसल सिंधिया उन दोनों गांवों में जा पहुंचे थे, जहां शराब से सबसे ज्यादा लोग मरे थे और ये दोनों गांवों तोमर के संसदीय क्षेत्र में आते थे. तोमर को अपने इलाके में सिंधिया का दखल और मृतकों के परिजनों को 50-50 हजार रुपए की मदद करना रास नहीं आया. इसके बाद सिंधिया-तोमर के रिश्ते भी पहले जैसे नहीं रह गए.

ये दूरियां 16 मई को तब और ज्यादा साफ और तल्खियों में बदलती दिखीं, जब ग्वालियर में कोरोना को लेकर सीएम शिवराज सिंह की मौजूदगी में समीक्षा बैठक हुई थी. बैठक के बाद सिंधिया और तोमर दोनों ने अफसरों को अलग-अलग निर्देश दिए और सोशल मीडिया पर पोस्ट की, लेकिन दोनों ने एक दूसरे का नाम लेने से परहेज करते हुए टैग भी नहीं किया.

सिंधिया को प्रभावहीन होने का भय सता रहा

दरअसल, भाजपा में आने के बाद अभी सिंधिया समझते हैं कि ग्वालियर-चंबल संभाग और सिंधिया घराने के प्रभाव वाले इलाकों में वह अभी भी 'महाराज' हैं. लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सभी स्थानों पर भाजपा के अपने नेता और नेतृत्व हैं, भला कोई क्यों सिंधिया या सिंधिया समर्थकों को ताकत देकर अभी राजनीति की जड़ें और भविष्य की उम्मीदों को नष्ट करेगा! ग्वालियर-चंबल में सिंधिया की सक्रियता भाजपा नेताओं को कतई रास नहीं आ रही है. सिंधिया भले ही भाजपा में हों, लेकिन क्षेत्र में उनके भ्रमण के दौरान उनके पुराने समर्थकों के अलावा भाजपा का कोई भी नेता साथ नहीं होता. न ही भाजपा नेताओं के स्वागत-सत्कार में सिंधिया समर्थक कोई नेता पहुंचता है.

भाजपा में जाने के बाद क्या मिला

जरा याद कीजिए, जब सिंधिया कांग्रेस में थे तो मध्यप्रदेश का पूरा विधानसभा चुनाव उनके चेहरे को सामने रखकर लड़ा गया था, सूबे में महाराज बनाम शिवराज की लड़ाई का बिगुल बज रहा था. सिंधिया, पूरे प्रदेश का युवा और चमकदार, उम्मीदों से लबरेज चेहरा थे, वे तब भले ही मुख्यमंत्री न बन पाए, लेकिन भविष्य में उनके लिए काफी उम्मीदें थीं. अब सवाल यह है कि क्या उन्हें ये सब भाजपा में मिलेगा, जो एक कैडर बेस पार्टी है, जहां सब कुछ तय गाइडलाइंस पर होता है. उसने सियासी स्वार्थवश सिंधिया को अपनी गोद में बैठा तो लिया, लेकिन समय-समय पर अपनी कार्यशैली से उनको उनकी असली हैसियत का अहसास कराती रहती है.

भाजपा में जाने और काफी जद्दोजहद के बाद कुछेक सिंधिया समर्थकों को मंत्री पद तो जरूर मिल गए, सिंधिया को राज्यसभा भी भेज दिया गया, लेकिन ग्वालियर-चंबल तक उनकी राजनीति सिमट कर रह गई है. वहां भी भाजपा के तुर्रम नेता पहले से मौजूद हैं.

...क्योंकि यह सिंधिया के वजूद का भी सवाल है

सूत्र बताते हैं कि सिंधिया खुले तौर पर भले ही अपना असंतोष प्रदर्शित न करें, लेकिन वह पार्टी के भीतर अपनी स्थिति को लेकर काफी असहज महसूस कर रहे है. भविष्य में सियासत का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहना संभव नहीं, लेकिन इतना तय है कि मप्र की राजनीति से रोमांचक खबरों का सिलसिला इतनी जल्‍दी बंद नहीं होगा.

(डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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