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Damoh By-Polls: दमोह उपचुनाव में प्रचार से दूर क्यों हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया, किससे है नाराजगी!

दमोह में 17 अप्रैल को उपचुनाव के लिए मतदान से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के न पहुंचने को लेकर सियासत जारी.

दमोह में 17 अप्रैल को उपचुनाव के लिए मतदान से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के न पहुंचने को लेकर सियासत जारी.

Damoh Assembly By-Election: 17 अप्रैल को दमोह विधानसभा सीट पर उपचुनाव के लिए मतदान होना है. इस जंग में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर जातीय और सियासी समीकरण साधने वाले तमाम नेता कूदे हुए हैं, लेकिन भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कहीं दिखाई नहीं दे रहे.

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भोपाल. मध्य प्रदेश में आगामी 17 अप्रैल को दमोह विधानसभा सीट के लिए होने जा रहे उपचुनाव की जंग में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर जातीय और सियासी समीकरणों को साधने वाले पार्टी के सारे नेता अपनी-अपनी तरकीबों के तीर-तरकश के साथ मैदान में कूदे हुए हैं. लेकिन भाजपा के लिए जीने-मरने की कसमें खाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया कहीं भी दिखाई नहीं दे रहे. सिंधिया के नजदीकी सूत्र बताते हैं कि वे पार्टी के बड़े नेताओं के रवैये से 'खासे नाराज' हैं और इसी वजह से उन्होंने दमोह के अपने चुनावी दौरे रद्द कर दिए हैं. मतलब साफ है कि सिंधिया अब दमोह उपचुनाव के मैदान में नहीं दिखेंगे और अगर दिखेंगे भी, तो यह केवल उपस्थिति मुंह दिखाई जैसी होगी. खबर है कि बंगाल चुनाव के चौथे चरण में भी वह प्रचार करने नहीं जा रहे.

राजनीतिक विश्लेषकों का मत है कि वास्तव में दमोह सीट भाजपा के लिए उतनी आसान नहीं है, जितनी उसके नेता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. पार्टी यह भली-भांति जानती है कि दमोह सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी अजय टंडन और भाजपा के राहुल सिंह लोधी के बीच कड़ी टक्कर होने वाली है. इसीलिए केन्द्रीय मंत्री प्रह्लाद पटेल, गोपाल भार्गव, भूपेन्द्र सिंह से लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक ने पूरी ताकत झोंक रखी है. पार्टी चाहती तो प्रखर वक्ता और आकर्षक व्यक्तित्व वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया का इस्तेमाल युवा वोटरों को साधने के लिए कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा करने की बजाय दमोह के जातीय समीकरणों को साधने वाले नेताओं को मैदान में उतारना ज्यादा बेहतर समझा.

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ब्राह्मण, लोधी, दलित, आदिवासी, यादव, जैन, सिंधी सहित हर समाज के वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए संबंधित नेताओं की सभाएं और बैठकें करवाई जा रही हैं. प्रदेश अध्यक्ष स्वयं इन बैठकों में मौजूद रहते हैं और ज्यादा से ज्यादा समय दे रहे हैं. हाल ही वह दमोह के प्रबुद्ध सिंधी समुदाय के लोगों से भी मिले. इसी तरह से कांग्रेस ने भी अपने नेताओं को जातीय समीकरण साधने के लिए मैदान में पूरी दम-खम के साथ उतारा है. पूर्व सीएम कमलनाथ 7 अप्रैल को और उसके बाद कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी मुकुल वासनिक दमोह में तूफानी सभाएं करने वाले हैं.

सिंधिया की नाराजगी पर अलग-अलग सुर


सिंधिया घराने से जुड़े ग्वालियर के सूत्र बताते हैं कि यह बात सही है कि सिंधिया भाजपा में अपेक्षित महत्व नहीं मिलने से नाराज हैं और अब तो दमोह में चुनाव प्रचार खत्म होने में 9 दिन बचे हैं, जब अब तक नहीं पूछा गया, तो क्यों अंतिम समय में जाकर दखल दें. लेकिन इस बारे में सिंधिया के पुराने समर्थक और प्रवक्ता रहे पंकज चतुर्वेदी का कहना है, 'सिंधियाजी को भाजपा में तरजीह मिलने, न मिलने जैसी कोई बात नहीं है. यह बात सबको समझ लेनी चाहिए कि भाजपा का कल्चर, उसकी रीति-नीति बिल्कुल अलग है. उसमें जो शामिल होता है, उसे पार्टी के रंग-ढंग को अपनाना होता है. वही सिंधिया भी कर रहे हैं.' चतुर्वेदी ने कहा जब कभी सिंधिया के बारे में बात होती है तो कांग्रेस में रूतबे से तुलना की जाती है, जबकि भाजपा का कार्य, व्यवहार संस्कृति सब कुछ अलग है. यहां पहले से तय हिसाब-किताब से हर काम होता है. सिंधिया और उनके समर्थकों को कांग्रेस से ज्यादा भाजपा में मिला है, जाहिर है महत्व तो दिया गया है.

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दमोह उपचुनाव से दूरी क्यों


दमोह उपचुनाव प्रचार में अब तक सिंधिया के नहीं जाने के सवाल पर पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि सिंधिया का कार्यक्रम बन रहा है. संभवतः वह 11, 12 और 13 मार्च को दमोह में प्रचार करेंगे. बता दें कि ज्योतिरादित्य सिंधिया बंगाल विधानसभा चुनाव में भी चौथे चरण के चुनाव प्रचार के लिए स्टार प्रचारकों की सूची में हैं, लेकिन अभी तक उनका कोई प्रचार कार्यक्रम तय नहीं हुआ है, जबकि तीन दिन बाद बंगाल में चौथे चरण का प्रचार खत्म होने वाला है. इस बारे में पंकज चतुर्वेदी बताते हैं कि चौथे चरण के प्रचार की तो जानकारी नहीं है, लेकिन अभी बंगाल में 10 अप्रैल के बाद भी चुनाव के चार चरण बाकी है, जिसमें सिंधिया निश्चित रूप से जाएंगे. लेकिन यह सब केन्द्रीय स्तर पर तय होगा. (डिस्क्लेमरः ये लेखक के निजी विचार हैं)
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