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मंदसौर के किसानों से क्यों डरे हुए हैं मध्य प्रदेश के नेता?

मंदसौर में बीजेपी की रैली में शामिल हुए किसान.

मंदसौर में बीजेपी की रैली में शामिल हुए किसान.

प्रदेश की राजनीति के लिए मंदसौर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 6 किसानों की मौत के बाद से ही यह क्षेत्र किसानों के असंतोष का प्रतीक बनकर उभरा है.

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    सुहास मुंशी

    मध्य प्रदेश की राजनीति में मालवा-निमाड़ क्षेत्र को सत्ता का गेटवे माना जाता है. यहां की 66 विधानसभा सीटों में जिस पार्टी का दबदबा होता है वही पार्टी 230 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत हासिल करने में सफल हो पाती है. मालवा की राजनीति का केंद्र मंदसौर है जहां से अब तक तीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा, वीके सकलेचा और कैलाशनाथ काटजू निकले हैं.  (संबित पात्रा बोले- दिग्विजय सिंह को निष्कासित करे कांग्रेस)

    ऐसे में यह देखकर आश्चर्य नहीं होता है कि कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही पार्टियों ने इस क्षेत्र में अपनी पूरी स्टार पावर झोंक दी है. 2017 में प्रदर्शन के दौरान यहां पुलिस की गोली से छह किसानों की मौत हो गई थी. इस घटना के तुरंत बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस क्षेत्र का दौरा किया था. इसके ठीक एक साल बाद वह दोबारा यहां लौटे, इस बार कई सीनियर नेता उनके साथ यहां पहुंचे थे. इसके बाद से ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां कई बार आ चुके हैं.

    बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पीएम मोदी ने भी मंदसौर में रैली की थी.

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    प्रदेश की राजनीति के लिए मंदसौर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 6 किसानों की मौत के बाद से ही यह क्षेत्र किसानों के असंतोष का प्रतीक बनकर उभरा है. एक साल में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों से संबंध रखने वाले कई किसान यूनियन मंदसौर का दौरा कर चुके हैं. यह माना जा रहा है कि मंदसौर के किसानों को दिया जाने वाला आश्वासन असल में पूरे प्रदेश के किसानों के लिए एक मैसेज है.

    मंदसौर जिले में 8 विधानसभा सीटें हैं जहां मुकाबला सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस के बीच नहीं है. यहां एक साल से किसान सरकार के खिलाफ खड़े हैं, पाटीदारों का एक समूह बीजेपी के खिलाफ खड़ा है, अगड़ी जातियों के लोग अन्य सभी के खिलाफ खड़े हैं और राजपूत समुदाय को देखें तो लगता है कि यहां नोटा और कांग्रेस के बीच मुकाबला होने वाला है.

    डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश की करीब 71 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के हर जिले में किसानों की संख्या घटी है और कृषि आधारित मजदूरों की संख्या बढ़ी है. NSSO के मुताबिक प्रदेश में करीब 64 लाख किसान हैं और उनमें से करीब आधे कर्ज में हैं.

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    मंदसौर में किसानों की हालात प्रदेश के किसी अन्य जिले से अधिक खराब है. पिछले साल मारे गए युवाओं के परिजन कहते हैं कि उन लोगों ने एक गांव से दूसरे गांव जाकर लोगों से अपील की कि बीजेपी के लिए वोट न करें.

    टकरावाड़ गांव में रहने वाले बालाराम के भतीजे बबलू की पिछले साल 6 जून को पुलिस फायरिंग में मौत हो गई थी. वह कहते हैं, “हमारे लड़कों को मारने के बाद मंत्रियों ने हमें डाकू-तस्कर बताया था. उन्होंने हमारी तुलना आतंकियों से की थी. बीजेपी का कोई नेता, न वर्तमान विधायक और न ही मुख्यमंत्री कोई भी हमें देखने तक नहीं आया. अब वे हमसे वोट मांग रहे हैं. हम यह सुनिश्चित करेंगे कि यह सरकार वापस न आए.”

    पिछले साल हुई हिंसा में जगदीश पाटीदार के छोटे भाई कन्हैयालाल की भी मौत हो गई थी. वह पूछते हैं, “आंदोलन सबने किया लेकिन गोलियां सिर्फ पाटीदारों पर क्यों चलाई?”

    पिछले साल कथित तौर पर पुलिस की गोलियों से जिन पांच किसानों की मौत हुई थी वे सभी पाटीदार थे. मुख्यरूप से गुजरात और मध्य प्रदेश में रहने वाले पाटीदार ओबीसी समुदाय में आते हैं और एमपी में इन्हें कृषि अर्थव्यवस्था का बैकबोन भी कहा जाता है. यह वर्ग पिछले तीन सालों से बीजेपी के खिलाफ लामबंद हो रहा है.

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    जगदीश कहते हैं, “हमने 2013 में बीजेपी के लिए वोट किया लेकिन बीजेपी ने बदले में हमें क्या दिया? तीन साल में हमें इन्श्योरेंस का पैसा नहीं मिला. मैं अलग-अलग गांवों में 50 बैठकें कर चुका हूं और हर जगह लोग कह रहे हैं कि बीजेपी सत्ता में नहीं लौटेगी.”

    हालांकि पिपलिया मंडी में एक किसान कहते हैं कि किसानों ने बहुत ज्यादा झेला है और वे लोग कांग्रेस को सत्ता में वापस लाना चाहते हैं. लेकिन जब वोट डालने की बारी आएगी तो वे लोग बीजेपी के लिए ही वोट करेंगे. वहीं इस क्षेत्र में लोगों का यह भी मानना है कि शिवराज सिंह चौहान एक अच्छी नीयत वाले नेता हैं जिनके हाथ बंधे हुए हैं.

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