ANALYSIS: MP में 15 साल बाद लौट सकती है कांग्रेस

कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ (फ़ाइल फोटो)
कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ (फ़ाइल फोटो)

कांग्रेस को यह अच्छी तरह पता है कि इस बार भी अगर हार हुई तो फिर पार्टी कैडर पर गंभीर सवाल खड़े होंगे.

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  • Last Updated: November 13, 2018, 11:22 AM IST
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(विवेक त्रिवेदी)

मध्य प्रदेश में पिछले 15 साल से कांग्रेस सत्ता से बाहर है. ऐसे में पार्टी के लिए आगामी विधानसभा चुनाव किसी सेमीफाइनल मुकाबले की तरह है. लिहाजा कांग्रेस ने इस बार जीत के लिए पूरी ताकत झोंक दी है.

हाल के दिनों में कई ओपिनियन पोल ने इस बात के संकेत दिए हैं कि चुनाव में पलड़ा कांग्रेस का भारी रहेगा. लगातार पिछले तीन बार से शिवराज सिंह चौहान प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. ऐसे में कांग्रेस को पूरी उम्मीद है कि एंटी इनक्बेंसी फैक्टर से भी उन्हें फायदा मिलेगा.



मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पिछले प्रदर्शन पर नज़र डालें तो सत्ता में उनकी वापसी आसान नहीं होगी. साल 2003 के चुनाव में कांग्रेस को 37 सीटों पर जीत मिली थी. साल 2008 के चुनाव में ये आंकड़ा 71 का था. लेकिन पिछली बार यानी साल 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 58 सीटों पर जीत मिली थी.
मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं. पिछले तीन चुनाव में बीजेपी को धमाकेदार जीत मिली है. साल 2003 में बीजेपी को 173 सीटें मिली थी. साल 2008 के चुनाव में बीजेपी के खाते में 143 सीटें आई थी, जबकि पिछली बार यानी 2013 के चुनाव में बीजेपी ने 165 सीटों पर धमाकेदार जीत दर्ज की थी.

कांग्रेस को यह अच्छी तरह पता है कि इस बार भी अगर हार हुई तो फिर पार्टी कैडर पर गंभीर सवाल खड़े होंगे. कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में हर क्षेत्र में सुधार का वादा किया है. बाक़ी राज्यों के मुकाबले यहां कांग्रेस के लिए हालात थोड़े अलग हैं. यहां दूसरे राज्यों की तरह कांग्रेस के पास बड़े और अनुभवी नेताओं की कोई कमी नहीं है. राज्य के लगभग हर क्षेत्र से पार्टी के पास बड़ा नेता मौजूद है.

पार्टी के सबसे अनुभवी नेता दिग्विजय सिंह सबसे लोकप्रिय नेता हैं. कमलनाथ का महाकौशल क्षेत्र में दबदबा है, जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया को ग्वालियर और चंबल इलाके से भारी समर्थन मिलता है. इसके अलावा अजय सिंह, सुरेश पचौरी, अरुण यादव और कांतिलाल भूरिया का भी अपने-अपने क्षेत्रों में भारी दबदबा है.

सच कहा जाए तो कांग्रेस के लिए एक नेता चुनना आसान नहीं होगा. जाहिर है पार्टी में एक से बढ़ कर एक चेहरे होने के चलते बीच-बीच में नेताओं के बीच सीट बंटवारे को लेकर मनमुटाव की भी खबरें आती रहती हैं.

पार्टी के कई नेता एकजुटता की बातें तो करते हैं लेकिन फिर से बंद कमरे से बीच-बीच में मनमुटाव की खबरें बाहर आती रहती हैं. खास कर दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच अनबन की खबरें तो जगजाहिर हैं.

दूसरी तरफ बीजेपी के खेमे में भी इस बार सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. संभवत: इस बार पार्टी बेहद बुरे दौर से गुजर रही है. हाल के दिनों में पार्टी के कई बड़े नेता विवादों में रहे हैं. पेड न्यूज़ मामले में नरोत्तम मिश्रा का नाम उछला था. विधायक मलखान सिंह मर्डर केस में लाल सिंह आर्य का नाम आया था. सुरेन्द्र पटवा का नाम लोन केस में आया था. इसके अलावा रामपाल सिंह की बहु ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी.

इसके अलावा टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी के दूसरे बड़े नेता बाबूलाल गौड़, सरताज सिंह और कुसुम महदेले ने भी बीजेपी को शर्मिंदा किया है. दूसरी तरफ कांग्रेस ने सीट बंटवारे को लेकर क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण दोनों का ख्याल रखा है. हालांकि कांग्रेस पार्टी मायावती की बीएसपी से गठबंधन नहीं कर सकी है. पिछली बार मायावती की पार्टी को 6.5 फीसदी वोट मिले थे.

कई बार शिवराज सिंह चौहान का नाम विवादों में आया है, लेकिन इसके बावजूद भी वे लगातार गद्दी पर काबिज़ हैं. खास बात यह है कि एक बार फिर से वे हर राजनीतिक पार्टी और प्रतिद्वंद्वी को कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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