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बहन के दहेज के लिए बैलगाड़ी खींच रहे सगे भाई!

बहन के दहेज के लिए बैलगाड़ी खींच रहे सगे भाई!

बुरहानपुर की सड़कों पर चिलचिलाती धूप में बैलों की जगह दो सगे भाई बैल की तरह बैलगाड़ी खींचते देखे जा सकते हैं. इस नजारे को देखकर समाज, शासन और प्रशासन देखकर हैरान जरूर है, लेकिन कोई भी इस गरीब परिवार की मजबूरी को दूर करने को तैयार नहीं है. परिवार के मुखिया ने अपनी बेटियों की शादी के लिए बैल बेच दिए और परिवार की रोजी रोटी चलाने के लिए अपने बेटों को बैल बना दिया.

बुरहानपुर की सड़कों पर चिलचिलाती धूप में बैलों की जगह दो सगे भाई बैल की तरह बैलगाड़ी खींचते देखे जा सकते हैं. इस नजारे को देखकर समाज, शासन और प्रशासन देखकर हैरान जरूर है, लेकिन कोई भी इस गरीब परिवार की मजबूरी को दूर करने को तैयार नहीं है. परिवार के मुखिया ने अपनी बेटियों की शादी के लिए बैल बेच दिए और परिवार की रोजी रोटी चलाने के लिए अपने बेटों को बैल बना दिया.

बुरहानपुर की सड़कों पर चिलचिलाती धूप में बैलों की जगह दो सगे भाई बैल की तरह बैलगाड़ी खींचते देखे जा सकते हैं. इस नजारे को देखकर समाज, शासन और प्रशासन देखकर हैरान जरूर है, लेकिन कोई भी इस गरीब परिवार की मजबूरी को दूर करने को तैयार नहीं है. परिवार के मुखिया ने अपनी बेटियों की शादी के लिए बैल बेच दिए और परिवार की रोजी रोटी चलाने के लिए अपने बेटों को बैल बना दिया.

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बुरहानपुर की सड़कों पर चिलचिलाती धूप में बैलों की जगह दो सगे भाई बैल की तरह बैलगाड़ी खींचते देखे जा सकते हैं. इस नजारे को देखकर समाज, शासन और प्रशासन देखकर हैरान जरूर है, लेकिन कोई भी इस गरीब परिवार की मजबूरी को दूर करने को तैयार नहीं है. परिवार के मुखिया ने अपनी बेटियों की शादी के लिए बैल बेच दिए और परिवार की रोजी रोटी चलाने के लिए अपने बेटों को बैल बना दिया.

बैलों की जगह खुद बैलगाड़ी खींचने का नजारा देखकर लोगों को बॉलीवुड की अपने जमाने की हिट फिल्म मदर इंडिया की याद दिला देती है. समाजसेवियों के अनुसार यह नजार सरकार और समाज दोनों का सिर शर्म से झुका रहा है. वहीं जिला प्रशासन इसे अमानवीय और दर्दनाक करार देते हुए परिवार को मदद करने की बात कह रहा है.

दरअसल 17 साल का रहीम और 13 साल का रज्जाक दो सगे भाई हैं, जो कि जिला मुख्यालय से आठ किलोमीटर दूर चिंचाला गांव में रहते हैं. अपने परिवार की रोजी रोटी चलाने में अपने पिता की मदद करने के लिए बैल बनकर पेड़ों के पत्ते इकट्ठा करके आठ किलोमीटर तक बैलगाड़ी खींचकर इसे मंडी में बेचने जाते है. दोनों सगे भाई यह काम कोई शौक से नहीं करते हैं.

बच्चों के पिता नसीरलाल का कहना है कि उन्हें सरकार की किसी योजना का लाभ नहीं मिला और ना ही किसी ने योजना के बारे में बताया.  बच्चों की बैल बनाने की वजह पूछने पर नसीरलाल ने कहा कि गरीबी क्या नहीं कराती है.

उन्होंने बताया कि आठ किलोमीटर बैलगाड़ी खींचना कोई आसान काम नहीं है. सप्ताह में दो या तीन बार ऐसा करने से उनके परिवार को महज 150 से 250 रुपए तक की आमदनी होती है, लेकिन उनके शरीर को काफी दर्द होता है. वहीं दोनों बेटे भी चाहते हैं कि सरकार उनके परिवार की मदद करें और कम से कम उन्हें बैल दिला दें.

वहीं बच्चों की मां ने अपने भाई सीएम शिवराज सिंह चौहान से उनके परिवार को दो बैल देने की मांग की है. समाजसेवी डॉ मनोज अग्रवाल ने अविलंब शासन-प्रशासन से इस परिवार को वह तमाम योजनाओं का लाभ देने की मांग की जिसके वो हकदार हैं.

वहीं जिला पंचायत सीईओ बसंत कुर्रे ने भी स्वीकारा कि इन बच्चों का बैलों की जगह बैलगाड़ी में आठ किलोमीटर चलना काफी दर्दनाक और अमानवीय है. उन्होंने कहा कि इस परिवार के हालत किन कारणों से हुए, उसकी जांच कराकर उन्हें योजनाओं का लाभ दिलाकर उनके बच्चों को बैल बनने की प्रवृत्ति खत्म करने की बात कह रहे हैं.

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