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ज़मीन पर नहीं, अपने कलेजे पर हल चलाकर किसान नष्ट कर रहे फसल
Burhanpur News in Hindi

News18
Updated: August 23, 2015, 5:26 PM IST
ज़मीन पर नहीं, अपने कलेजे पर हल चलाकर किसान नष्ट कर रहे फसल
नीलेश तपकाले अपने खेत में बोई गई ज्वार की फसल के पौधों पर हल चला रहे हैं. उनके आसपास के खेतों में भी कुछ किसान खड़ी फसल पर हल चलाकर नष्ट कर रहे हैं. यह चौंकाने वाला वाकया मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले का है, जहां बारिश की कमी के चलते दोबारा बोवनी की गई फसल कीड़ों की चपेट में आ गई और कीटनाशक के छिड़काव से फसल नहीं बच सकी.

नीलेश तपकाले अपने खेत में बोई गई ज्वार की फसल के पौधों पर हल चला रहे हैं. उनके आसपास के खेतों में भी कुछ किसान खड़ी फसल पर हल चलाकर नष्ट कर रहे हैं. यह चौंकाने वाला वाकया मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले का है, जहां बारिश की कमी के चलते दोबारा बोवनी की गई फसल कीड़ों की चपेट में आ गई और कीटनाशक के छिड़काव से फसल नहीं बच सकी.

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  • Last Updated: August 23, 2015, 5:26 PM IST
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नीलेश तपकाले अपने खेत में बोई गई ज्वार की फसल के पौधों पर हल चला रहे हैं. उनके आसपास के खेतों में भी कुछ किसान खड़ी फसल पर हल चलाकर नष्ट कर रहे हैं. यह चौंकाने वाला वाकया मध्यप्रदेश के बुरहानपुर जिले का है, जहां बारिश की कमी के चलते दोबारा बोवनी की गई फसल कीड़ों की चपेट में आ गई और कीटनाशक के छिड़काव से फसल नहीं बच सकी.

जिन हाथों से बीज बोए थे, उन्हीं हाथों से फसल नष्ट कर रहे किसान नारायण दुखी स्वर में कहते हैं कि, 'हम ज़मीन पर नहीं, अपने कलेजे पर हल चलाकर फसल नष्ट कर रहे हैं.'

उनका कहना है कि जिले के शाहपुर इलाके में क़रीब 150 एकड़ फस्ल अब तक हल से जोतकर नष्ट की जा चुकी है. किसानों ने बताया कि जून में बोवनी करने के बाद बारिश नहीं हुई. इससे बोए बीज ज़मीन में ही दफन हो गए और अंकुरित ही न हो सके.



जब दोबारा मक्के और ज्वार की फसल बोई तो वह भी बढ़ नहीं सकी, फलस्वरूप मज़बूरी में हल चलाना पड़ रहा है. ताकि थोड़ी-बहुत बची फसल को नुकसान न पहुंचाएं क्योंकि कीटनाशक से भी फसल नहीं बच पा रही है.



नुकसान की भरपाई मुश्किल
बुरहानपुर जिल के वारोली और भोटा के एक किसान बताते हैं कि इस नुकसान की भरपाई अब मुश्किल है. इलाके के किसानों को अब साल भर मुफलिसी की हालत में जीना पड़ेगा.
उन्होंने बताया कि एक बार फसल की बोवनी पर प्रति एकड़ बीज डालने में ही पांच हज़ार से दस हज़ार रुपए तक का खर्च आता है.

इसके बाद फसल केयर की देख्ररेख करने में पैसा खत्म होता है, लेकिन अब बुवाई के पैसे तो गए ही, फसल के पैसे भी नहीं आएंगे. अब किसान सरकार की तरफ आशा भरी नज़रों से देख रहे हैं.

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First published: August 23, 2015, 5:26 PM IST
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