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पानी की कहानी: 70 साल के 'नौजवान' अकेले खोद रहे हैं गांव के लिए कुआं

News18Hindi
Updated: May 25, 2018, 8:58 AM IST

8 महीने की कड़ी मशक्कत के बाद सीताराम की मेहनत रंग लाई और इन्होंने धरती का सीना चीर कर पानी निकाल लिया. 70 साल की उम्र में इन्होंने वो कारनामा कर दिखाया है जो शायद आज के नौजवान भी न कर सकें

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न्यूज18 हिंदी पर हम आपको देश में पानी के मौजूदा हालात के बारे में बता रहे हैं. 'पानी की कहानी' सीरीज की इस रिपोर्ट में हम आपको मध्य प्रदेश के छतरपुर के एक 70 साल के एक बुजुर्ग की कहानी बता रहे हैं जिसने गांव को पानी मुहैया कराने के लिए अकेले एक कुआं खोदा. बारिश आई तो यह कुंआ ढह गया, लेकिन धुन के पक्के इस बुजुर्ग ने हौसला नहीं हारा और दोबारा से कुआं खोदने में जुट गया. 

70 साल का जर्जर शरीर और लड़खड़ाते कदमों के बावजूद बुजुर्ग सीताराम का जोश जवानों से कहीं ज्यादा है. गांव में पड़ रहे भीषण सूखे को देखकर सीताराम राजपूत ने फैसला किया कि वह मरने से पहले गांव को कुछ ऐसा देकर दुनिया छोड़ेंगे कि जाने के बाद आने वाली पीढ़ियां भी उनका नाम याद करेंगी.

ये मामला है मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के प्रतापपुरा पंचायत के हड़ुआ गांव का. हड़ुआ गांव की आबादी लगभग 300 है और पूरे गांव को पीने के पानी मात्र एक हैंडपंप से मिलता है. इस हैंडपंप से भी इतना पानी नहीं आता कि गांव की आधी अधूरी प्यास बुझा सके. इंसान तो क्या जानवर भी जगह-जगह प्यासे घूम रहे हैं.

इन्हीं सब परेशानियों को देखते हुए सीताराम ने कुआं खोदने का फैसला किया, लेकिन इस बूढ़े आदमी का किसी ने साथ नहीं दिया. उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके सीताराम ने फिर भी हार नहीं मानी और जुट गए अकेले कुआं खोदने में.

8 महीने की कड़ी मशक्कत के बाद इस बुजुर्ग की मेहनत रंग लाई और इन्होंने धरती का सीना चीर कर पानी निकाल लिया. मगर दुर्भाग्य से ऐसी बरसात हुई कि कच्चा कुआं ढह गया. सीताराम के पास इतना पैसा नहीं था कि वह कुएं को पक्का बनवा सकें. वहीं गांव, समाज और सरकार ने भी सीताराम की कोई मदद नहीं की.

इन सब दुखों को सहते हुए इस बुजुर्ग के मन में आशा की एक नई किरण जागी है और ये दोबारा जुट गए कुएं को खोदने में. सीताराम कुएं से मिट्टी हटा रहे हैं. सीताराम ये इसलिए कर रहे हैं ताकि पूरे गांव की प्यास बुझ सके.

सीताराम अकेले ही कुआं खोद रहे हैं. कुएं में जाकर खुद ही मिट्टी खोदते हैं और मिट्टी फेंकने के लिए नंगे पैर रस्सी के सहारे कटीली झाड़ियों से होकर बाहर आते हैं. यही है 70 साल के बूढ़े नौजवान सीताराम की दिनचर्या.बुन्देलखंड के सीताराम ने 70 साल की उम्र में वो कर दिखाया जो शायद नौजवान भी न कर सकें लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है कि जिस सरकार ने इन तीन सालों में उनकी कोई मदद नहीं की, अब वो सीताराम क्या मदद करती है.

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First published: May 25, 2018, 8:58 AM IST
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