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पाकिस्तानियों की पहली पसंद था यहां का पान, अब गिन रहा आखिरी सांसें

पाकिस्तानियों की पहली पसंद था यहां का पान, अब गिन रहा आखिरी सांसें

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर

काल का चक्र है कब कैसा घूम जाए कौन राजा बन जाए और कौन रंक कहा नहीं जा सकता. कल तक जिनके पान की पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लेकर कई मुस्लिमों देशों में धूम रहती थी, आज वह मालिक से मजदूर बनते जा रहे हैं.

    काल का चक्र है कब कैसा घूम जाए कौन राजा बन जाए और कौन रंक कहा नहीं जा सकता. कल तक जिनके पान की पाकिस्तान, अफगानिस्तान से लेकर कई मुस्लिमों देशों में धूम रहती थी, आज वह मालिक से मजदूर बनते जा रहे हैं.

    देसी पान के लिए पूरी दुनिया में मशहूर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में पानी की खेती अंतिम सांसे गिन रही है. बुंदेलखंड का यह इलाका और उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में एक वक्त इस पान की फसल और व्यवसाय से हजारों लोगों को रोजगार मिलता था, वहीं इस क्षेत्र की खुशहाली का बड़ा साधन बना हुआ था.

    500 करोड़ का कारोबार चंद करोड़ में सिमटा

    पान किसान संघ के अध्यक्ष चितरंजन चौरसिया बताते हैं कि कभी यहां पान का 500 करोड़ का कारोबार हुआ करता था. पाकिस्तान सहित दूसरे मुस्लिम देशों में पान को भेजने के लिए खासतौर पर एजेंट हुआ करते थे. लेकिन वक्त और मौसम की मार से कोई बच नहीं सका. अब हालत यह है कि पान का कारोबार सालाना दो से तीन करोड़ तक सिमट गया है.

    चौरसिया के मुताबिक बुंदेलखण्ड में लगभग 50 हजार हेक्टेयर में पान की खेती होती थी, लेकिन पिछले कई सालों में हुए लगातार नुकसान के कारण पान की खेती का क्षेत्र घटकर आधा रह गया है. इसकी वजह लगातार नुकसान होना और सरकार की ओर से पर्याप्त राहत न मिलना है.

    फायदे का धंधा अब कर्ज की वजह बना

    वहीं पान कृषक महेश चौरसिया कहते हैं कि पान की खेती कभी फायदे का धंधा हुआ करता था, लेकिन अब घाटे का सौदा होता जा रहा है. इस बार फिर मौसम ने तबाही मचाई है और किसान को संकट में डाल दिया है. पान किसान लगातार मुसीबतों से घिरता जा रहा है और यही कारण है कि लगातार हो रहे नुकसान के चलते बहुत किसानों ने तो इस खेती तक से तौबा कर ली है.

    किसान छत्रपाल और राहुल की चिंता भी वाजिब है. दोनों कहते हैं, ओलावृष्टि और बे-मौसम बारिश से पान की फसल खराब हो जाती है, जिससे साहूकारों का कर्जा किसानों पर भारी पड़ रहा है. कई किसानों ने तो पान की खेती का पुश्तैनी धंधा छोड़ दिया, अब वह दूसरे राज्यों में मजदूरी करने चले जाते हैं.

    300 साल पुराना इतिहास

    बताते हैं कि करीब 300 साल पहले महाराजा छत्रसाल ने जब महराजपुर नगर बसाया उस समय यहां के लोगों को रोजगार के साधन के लिए पान की खेती शुरू कराई गई. तभी से यह खेती छतरपुर जिले में ही होती है.

    बुंदेलखंड का यह इलाका समशीतोष्ण जलवायु लिए जाना जाता था , जो पान की फसल के लिए सर्वाधिक अनुकूल होता है. लेकिन पिछले पांच साल से जलवायु में परिवर्तन की वजह से पान की फसल के एवज में किसानों कर्ज और बर्बादी के अलावा कुछ नहीं मिला.

    बांध निर्माण और जंगलों की कटाई से मौसम ने हर बार किसानों से बेवफाई की. पिछले पांच वर्षों में मौसम ने किसानों को बर्बाद करने का कोई मौका नहीं छोड़ा. सूखे से लेकर बाढ़ और ओलावृष्टि ने पान की फसल को खराब कर दिया, जो इस बरस भी जारी है.

    इन जिलों हजारों एकड़ में पान की खेती होती हैं. करीब 15 हजार परिवार पूरी तरह से पान की खेती पर आश्रित हैं.

     

    सरकार से मिला सिर्फ आश्वासन

    यहां का पान कभी पाकिस्तान के लोगों के मुंह की मिठास बनता था. लेकिन अब इतना कम पान उत्पादन होता है कि यहां के लोगो की भी डिमांड पूरी नहीं होती है. पान किसानों ने कई बार पान की खेती को फसल का दर्जा देने की मांग उठाई, लेकिन सरकार ने सिर्फ उन्हें कोरा आश्वासन ही दिया. किसानों के पान की खेती से मोह भंग होने की एक बड़ी वजह यह भी है.

    रिपोर्ट: छतरपुर से सुनील उपाध्याय

    Tags: Chhatarpur news

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