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मध्य प्रदेश में प्राइम लोकेशन वाले सरकारी दफ्तरों को तोड़कर बनेंगे अपार्टमेंट्स और मॉल्स

प्रोजेक्ट पर मध्यप्रदेश सरकार को कोई पैसा नहीं खर्च करना पड़ेगा, निजी डेवलपर को एक हिस्सा देकर पूरा होगा प्रोजेक्ट

प्रोजेक्ट पर मध्यप्रदेश सरकार को कोई पैसा नहीं खर्च करना पड़ेगा, निजी डेवलपर को एक हिस्सा देकर पूरा होगा प्रोजेक्ट

मध्य प्रदेश सरकार ने नई रीडेंसिफिकेशन पॉलिसी-2022 लागू की. पहली बार यूनिवर्सिटी, निगम-मंडल, प्राधिकरण और अकादमियों आदि को भी शामिल किया गया.

भोपाल. मध्य प्रदेश में अब सरकारी दफ्तर भी चमचमाते नजर आएंगे. जर्जर हो चुके दफ्तरों को तोड़कर उनके स्थान पर मॉल्स व अपार्टमेंट बनेंगे. यह प्रावधान रीडेंशिफिकेशन(पुनर्घनत्वीकरण) पॉलिसी-2022 (New Redensification Policy-2022) में किया गया है.
राज्य सरकार ने प्रदेश की सरकारी इमारतों और परिसरों के विकास के लिए रीडेंशिफिकेशन पॉलिसी-2022 में कई अहम प्रावधान किए गए हैं. इससे पहले स्मार्ट सिटीज के लिए 2016 में नीति लाई गई थी. अब नई नीति में सभी तरह की सरकारी जमीनों को शामिल किया गया है. यानी किसी भी प्राधिकरण, निगम-मंडल, यूनिवर्सिटी, कॉलेज, स्कूल, अकादमी, नगरीय निकाय आदि की जमीन को रीडेंसिफिकेशन के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. वहीं, रीडेंसिफकेशन के लिए नोडल एजेंसी के रूप में हाउसिंग बोर्ड और विकास प्राधिकरण के साथ ही पुलिस हाउसिंग कॉर्पोरेशन को शामिल किया गया है. नई नीति के तहत किसी भी प्रोजेक्ट के लिए राज्य सरकार को कोई पैसा खर्च नहीं करना पड़ेगा, बल्कि सरकारी दफ्तर आदि के बनाने की लागत के रूप में जमीन(संपत्ति) के एक हिस्से को निजी हाथों(बिल्डर-डेवलपर) में सौंप दिया जाएगा.
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पुरानी नीति की खामियां दूर की
रीडेंसिफिकेशन में नगरीय विकास एवं आवास विभाग नोडल है. विभाग ने सभी संभागायुक्त, कलेक्टर औऱ सीईओ को 18 अप्रैल को पुरानी पॉलिसी की जगह नई पॉलिसी भेज दी है. भोपाल में वर्ष 2009 व 2016 में चुनिंदा प्रोजेक्ट पर रीडेंशिफिकेशन पॉलिसी आई थी, जिसमें काफी खामियां थी. नई पॉलिसी में बड़े अहम बदलाव किए गए है. इससे सरकार बड़े फायदे में होगी.

रीडेंशिफिकेशन पॉलिसी क्या होती है
रिडेंसिफिकेशन योजना का मतलब पुरानी बिल्डिंग को तोड़कर नया निर्माण करना है. इसमें ऐसी जमीन या भवन लिया जाता है, जिसका एफएआर (फ्लोर एरिया रेशियो) का पूरा उपयोग न हुआ है. या बहुत सारी खाली जमीन हो. यहां एफएआर का मतलब कि संबंधित एरिया में निर्माण की कुल अनुमति से है. साथ ही जमीन की लोकेशन भी देखी जाती है. यदि मौजूदा भवन को तोड़कर उसी जमीन पर बड़ी इमारत बनाई जाती है. इसमें पुराने आफिस के लिए स्पेस मिल जाता है और जो अतिरिक्त निर्माण हुआ है, उसे बेचकर निर्माण लागत की वसूली हो जाती है. कई प्रोजेक्ट्स में सरकार को अपने आफिस के साथ अतिरिक्त धनराशि भी मिल जाती है. यदि जमीन ज्यादा है तो नई नीति में सरकारी संपत्ति का करीब 30 प्रतिशत हिस्सा बिल्डर या डेवलपर को दिया जाएगा. इसके एवज में सरकार संबंधित डेवलपर से तय रकम लेगी. इससे बाकी 70 फीसदी हिस्से पर निर्माण कार्य कराएगी. अपने हिस्से वाली जमीन पर बिल्डर एफएआर के मुताबिक निर्माण कराएंगे. इस प्रापर्टी को बेचकर अपना प्रॉफिट निकालेंगे.
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भोपाल-इंदौर के लिए सबसे फायदेमंद
नई पॉलिसी के बाद सरकार के लिए भोपाल की होशंगाबाद रोड सबसे प्राइम हो सकती है. बीयू यूनिवर्सिटी की जमीन नारायण नगर और विद्या नगर के सामने कई एकड़ में है. यूनिवर्सिटी कुछ हिस्से में कमर्शियल प्रोजेक्ट्स ला सकती है. निगम मंडल और कई अकादमी के भवन जर्जर हो चुके हैं. इन हिस्से की खाली जमीन पर कमर्शियल या रेसीडेंसियल प्रोजेक्ट आ सकते हैं. इंदौर में कई प्राइम लोकेशन पर प्रमुख विभागों की जर्जर इमारतें है. इनमें एबी रोड, महू नाका, पलासिया जैसे इलाकों में अनुपयोगी जमीन पर प्रोजेक्ट आएंगे. वहीं, सरकार प्रदेश के सभी जिलों में रिडेंसिफिकेशन के लिए सर्वे शुरू करवा रही है. इसमें देखा जा रही है कि सरकारी जमीन पर नए प्रोजेक्ट में दुकानें और कॉम्पलेक्स बनाकर आय कैसे बढ़ाई जा सकती है. इन प्रोजेक्ट्स से होने वाली आय से उसी जिले में दूसरे विकास के काम हो सकेंगे.

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