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NEWS18-IPSOS एग्जिट पोल: गुना में ज्योतिरादित्य सिंधिया की राह मुश्किल

मध्‍य प्रदेश के गुना लोकसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्‍याशी ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की सीट भी फंसती नजर आ रही है.
मध्‍य प्रदेश के गुना लोकसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्‍याशी ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की सीट भी फंसती नजर आ रही है.

एमपी की इस महत्वपूर्ण सीट पर NEWS18-IPSOS एग्जिट पोल के मुताबिक ज्योतिरादित्य सिंधिया फंसते नजर आ रहे हैं. हालांकि यह उनका गढ़ है लेकिन सर्वे के मुताबिक उनकी लड़ाई कठिन नजर आ रही है.

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2014 की मोदी लहर में भी एमपी की जिन दो सीटों पर बीजेपी अपना परचम नहीं फहरा पायी, उनमें से एक गुना सीट थी. सिंधिया का गढ़ कही जाने वाली गुना-शिवपुरी सीट पर इस बार एक तरफ मैदान में हैं कांग्रेस के मौजूदा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया तो उनके मुकाबले में हैं कांग्रेस से बीजेपी में आए किसी जमाने में सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि रहे केपी यादव. इस सीट पर मतदान 12 मई को छठवें चरण की वोटिंग में सम्पन्न हुए. एमपी की इस महत्वपूर्ण सीट पर NEWS18-IPSOS एग्जिट पोल के मुताबिक ज्योतिरादित्य सिंधिया फंसते नजर आ रहे हैं. हालांकि यह उनका गढ़ है लेकिन सर्वे के मुताबिक उनकी लड़ाई कठिन नजर आ रही है.

बीजेपी की ओर से गुना सीट को लेकर जोर आज़माइश भले कितनी भी की जाए लेकिन सियासी समीकरण बताते हैं कि गुना के किले पर इस बार भी परचम फहराना बीजेपी के लिए आसान नहीं है. दरअसल, आम तौर पर लोग गुना को सिंधिया घराने के जुड़ाव के साथ ही जानते हैं लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि आज का गुना एक ज़माने में राजघराने से लेकर अंग्रेजी सेना तक का कैंप रहा है. गुना का पूरा नाम ही ग्वालियर यूनियन नेशनल आर्मी है. गुना यानि ग्वालियर यूनियन नेशनल आर्मी.

इतिहास



19वीं सदी से पहले गुना आज का ईसागढ (अशोकनगर) जिले का एक छोटा सा गांव हुआ करता था. ईसागढ़ को सिंधिया राजाओं के सेनापति जॉन वेरेस्टर फिलोर्स ने खींचीं राजाओं से जीता था. ईसामसीह के सम्मान में इसका नाम तब ईसागढ़ रखा गया. 1844 में गुना में ग्वालियर राजघराने की फौज रहा करती थी. सेना के विद्रोह करने के कारण 1850 में इसे अंग्रेजी फौज की छावनी में तब्दील किया गया. 1922 में छावनी को गुना से ग्वालियर शिफ्ट कर दिया गया था. बाद में 1937 में जिले का नाम ईसागढ़ की जगह गुना कर दिया गया.
राजनीतिक इतिहास

गुना के अस्तित्व के साथ ही सिंधिया घराने का जुड़ाव इस संसदीय सीट से रहा है. यही वजह है कि सिंधिया परिवार के सदस्य फिर भले वो बीजेपी में हों या कांग्रेस में यहां से जीत दर्ज करते आए हैं. 1957 में हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट से राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस के टिकट पर जीत दर्ज की थी. 1971 में माधव राव सिंधिया ने भारतीय जनसंघ के टिकट पर चुनाव जीता था. हालांकि 1977 में माधव राव सिंधिया निर्दलीय चुनाव लड़े और जीते. 1980 तक कांग्रेस में शामिल हो चुके माधव राव सिंधिया फिर चुनाव लड़े और जीते. 1989 में राजमाता विजयाराजे सिंधिया बीजेपी के टिकट पर फिर चुनाव लड़ीं और जीत दर्ज की. इसके बाद राजमाता का चुनाव जीतने का ये सिलसिला 1998 तक जारी रहा. 2002 से इस सीट से कांग्रेस के टिकट पर ज्योतिरादित्य सिंधिया लगातार सांसद हैं.

2014 के नतीजे

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार ज्योतिरादित्य सिंधिया को 5,17,036 वोट मिले थे जबकि उनके मुकाबले में मैदान में खड़े बीजेपी के उम्मीदवार जयभान सिंह पवैया को 396244 वोट मिले थे. सिंधिया को कुल वोट का 52.89 फीसदी जबकि पवैया को 44.53 फीसदी मिला.

विधानसभा सीटें

गुना-शिवपुरी लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें से दो गुना और बमोरी गुना जिले की हैं जबकि 3 सीटें शिवपुरी जिले की शिवपुरी, कोलारस, पिछोर हैं और अशोनगर जिले की 3 सीटें अशोकनगर, चंदेरी और मुंगावली हैं. विधानसभा चुनाव में गुना की 2 सीटों में से 1-1 पर बीजेपी काबिज है. जबकि अशोकनगर की 3 सीटों में से सभी 3 कांग्रेस को मिलीं. यहां बीजेपी को एक सीट का नुकसान हुआ. शिवपुरी में 3 सीटों में से 2 बीजेपी और एक कांग्रेस के पास है. यहां कांग्रेस को एक सीट का नुकसान हुआ.

वर्तमान समीकरण

मौजूदा वक्त में गुना सीट कांग्रेस के कब्जे में है. बीजेपी कोशिश भले करे यहां अपना झंडा फहराने की लेकिन दबी जुबान से ये मानने में उसे भी गुरेज नहीं कि यहां सिंधिया घराने को शिकस्त देना मुश्किल है. गुना सीट सियासी तौर पर सिंधिया घराने के कब्जे में रही है. गुना संसदीय क्षेत्र में करीब 16.62 लाख मतदाता हैं. इनमें 8.82 पुरुष जबकि 7.80 महिला मतदाता हैं.जातिगत समीकरण के मुताबिक अनुसूचित जनजाति की तादाद सबसे ज्यादा 2 लाख 30 हजार से ज्यादा है.अनुसूचित जाति - 1 लाख से ज्यादा, कुशवाह - 60 हज़ार, रघुवंशी - 32 हजार, यादव - 73 हज़ार, ब्राह्मण - 80 हज़ार, मुस्लिम - 20 हज़ार, वैश्य जैन - 20 हजार सबसे ज्यादा असर अनुसूचित जाति का है लेकिन ब्राह्मण वोट बैंक भी बाज़ी पलटने में असरदार साबित होता है.

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