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करोड़ो हो रहे खर्च फिर भी पलायन का दर्द क्यों झेल रहे हैं आदिवासी

Vikas Dixit | ETV MP/Chhattisgarh
Updated: October 10, 2017, 1:09 PM IST
करोड़ो हो रहे खर्च फिर भी पलायन का दर्द क्यों झेल रहे हैं आदिवासी
आदिवासी, बंजारा समेत ऐसे कई समाज हैं जिन्हें मजबूरन मप्र की सीमा लांघ कर कोसों दूर अन्य राज्यों में रोज़गार ढूंढने के लिए जाना पड़ता है

आदिवासी, बंजारा समेत ऐसे कई समाज हैं जिन्हें मजबूरन मप्र की सीमा लांघ कर कोसों दूर अन्य राज्यों में रोज़गार ढूंढने के लिए जाना पड़ता है

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मध्य प्रदेश में गुना जिले के चाचौड़ा तहसील के दर्जन भर गांव के आदिवासी पलायन कर रहे हैं. यह पलायन पेट की आग बुझाने एवं दो जून की रोटी की जुगाड़ में पिछले कुछ दिनों से बदस्तूर जारी है. सूने खेत और घर पलायन की इस कड़ी में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा रहे हैं.

दरअसल प्रदेश सरकार द्वारा समय समय पर रोज़गार गारंटी के दावे तो किए जाते हैं, लाखों-करोड़ों खर्च किए जाते हैं, फिर भी परिणाम कोई नहीं निकलता.
आदिवासी, बंजारा समेत ऐसे कई समाज हैं जिन्हें मजबूरन मप्र की सीमा लांघ कर कोसों दूर अन्य राज्यों में रोज़गार ढूंढने के लिए जाना पड़ता है. मजदूर वर्ग को 100 दिन के रोज़गार की गारंटी देने वाली मप्र सरकार के अधीनस्थ बेरोज़गारी का आलम ये है कि ग्रामीणों को केवल कागज़ों में मजदूरी और भुगतान कर दिया जाता है.

News18 की टीम ने जब ग्रामीणों के पलायन का जायज़ा लिया तो पता चला कि प्रदेश सरकार द्वारा संचालित सैंकड़ों योजनाओं में से शायद ही कोई योजना ऐसी हो जिसका लाभ ग्रामीणों को मिला हो.

सूबे के मुखिया शिवराज सिंह चौहान भले ही सिस्टम में बैठे प्रशासनिक अमले को उलटा टांगने के दावे करें, लेकिन जब ऐसे मामले सामने आते हैं तो ना ही किसी को उलटा टांगा जाता है और न ही किसी अधिकारी को सज़ा सुनाई जाती है.

बहरहाल चाचौड़ा क्षेत्र के पिपल्यामोति समेत दर्जन भर गाँव से राजस्थान की ओर रुख करने वाले ऐसे एक दो नहीं बल्कि सैंकड़ों ग्रामीण हैं जिन्हे रोज़गार की चिंता सता रही है.

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First published: October 10, 2017, 1:04 PM IST
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