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600 साल पुराना चमत्कारी पेड़, देश-विदेश से इसके पत्ते खाने आते हैं लोग, जानिए खासियत

600 साल पुराना चमत्कारी पेड़, देश-विदेश से इसके पत्ते खाने आते हैं लोग, जानिए खासियत

Gwalior OMG: ग्वालियर में लगे इमली के पेड़ के पत्ते खाने लोग दूर-दूर से आते हैं. इसका संगीत सम्राट तानसेन से सीधा संबंध है.

Gwalior OMG: ग्वालियर में लगे इमली के पेड़ के पत्ते खाने लोग दूर-दूर से आते हैं. इसका संगीत सम्राट तानसेन से सीधा संबंध है.

Magical-Imli-Tree-at-Tansen-Tomb-Gwalior: मध्य प्रदेश के ग्वालियर में 600 साल पुराना इमली का पेड़ हैं. देश-विदेश से लोग इस पेड़ को देखने और इसकी पत्तियां खाने आते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस पेड़ की पत्तियां खाने से आवाज सुरीली हो जाती है. दरअसल, इस चमत्कारिक कहे जाने वाले पेड़ का संबंध संगीत सम्राट तानसेन से है. कहा जाता है कि इसी इमली के पेड़ की पत्तियां खाकर तानसेन की आवाज में जादू आ गया. उनकी आवाज इतनी लोकप्रिय हो गई कि बादशाह अकबर ने उन्हें अपने नवरत्नों में शामिल कर लिया.

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ग्वालियर. संगीत सम्राट तानसेन को पूरी दुनिया जानती है. महान संगीतज्ञ तानसेन की आवाज में वो दम था कि जब वे राग दीपक गाते तो दीप जल उठते, मेघ मल्हार गाते तो बादल बरसने लगते थे. ये उनकी आवाज का ही जादू था. क्या आप जानते हैं उनकी आवाज में किसकी वजह से दम था. उनकी आवाज में दम था एक इमली के पेड़ की वजह से. कहा जाता है कि बचपन में तानसेन बोल नहीं पाते थे. जब तानसेन ने इस करामाती इमली के पत्ते खाए तो वो बोलने लगे. उनकी न सिर्फ आवाज आई, बल्कि उसमे इतना दम आ गया कि बादशाह अकबर ने उन्हें अपने नवरत्नों में शामिल किया.

अपनी गायकी के दम पर तानसेन को दुनिया में महान संगीतकार की पहचान मिली. आज ये इमली का पेड़ दुनियाभर के गीत-संगीतकारों के लिए धरोहर से कम नहीं है. माना जाता है कि इस इमली के पेड़ के पत्ते खाने से आवाज करामाती हो जाती है, यही वजह है कि दूर-दूर से लोग आकर इसके पत्ते चबाते हैं. कई लोग इन पत्तों को अपने साथ ले जाते हैं. तानसेन समाधि स्थल के पास लगा ये इमली का पेड़ आज भी वैसा का वैसा खड़ा है.

पेड़ ने तानसेन को संगीत सम्राट बनाया

ग्वालियर के बेहट गांव में रहने वाले  तानसेन 5 साल की उम्र तक कुछ बोल नहीं पाते थे. परिवार के लोग तानसेन को ग्वालियर लाए. यहां उस्ताद मोहम्मद गौस ने तानसेन को गोद ले लिया और संगीत की तालीम शुरू की. धीरे-धीरे तानसेन बोलने तो लगे, लेकिन उनकी आवाज सुरीली नहीं हुई थी. गुरु के बताने पर तानसेन ने यहां लगे इमली के पेड़ की पत्तियों को खाना शुरू किया. करामाती इमली के पत्तों ने तानसेन का गला सुरीला कर दिया. संगीत की तालीम ले रहे तानसेन ने कठिनतम सुर साध लिए. उनकी गायकी मशहूर हुई. तानसेन ने उस दौर में ग्वालियर के तोमर शासकों सहित देश की कई रियासतों के लिए गायकी पेश की.

600 साल से संगीतकारों का तीर्थ स्थल है ये पेड़

तानसेन समाधि स्थल के पास ही लगा ये इमली का पेड़ सन 1400 के आसपास का बताया जाता है. मान्यता है कि इस करामाती इमली के पत्ते खाने से आवाज सुरीली होती है. इस वजह से दूर-दूर से संगीत साधक और संगीत प्रेमी ग्वालियर आकर इस इमली के पत्ते खाते हैं. देश के कई गायकों ने यहां आकर इसके पत्ते चबाएं हैं, तो कई कलाकारों ने यहां से इमली के पत्ते मंगवाकर खाएं है. ये पेड़ करीब 600 साल से आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है.

पेड़ की सुरक्षा के लिए लोहे का 10 फीट ऊंचा सुरक्षा घेरा

100 साल पहले ये पेड़ बुजुर्ग होकर गिर गया था, लेकिन अपनी जड़ों द्वारा ये दोबारा उगने लगा. तानसेन मकबरे के सज्जदा नशीन (मुख्य पुजारी) सैय्यद ज़िया-उल-हसन का कहना है कि मान्यता के चलते देश-विदेश से लोग इमली की पत्तियां तोड़ने आते हैं, जिससे इसे लगातार नुकसान हो रहा है. लिहाजा इसकी सुरक्षा के लिए पेड़ के चारों तरफ लोहे के एंगल का 10 फीट ऊंचा सुरक्षा घेरा लगाया गया है. बाहर से आने वालों को सीमित मात्रा में पत्ते तोड़कर खाने की गुजारिश की जाती है.

Tags: Gwalior news, Mp news

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