Article 370: ग्वालियर में कश्मीरी पंडितों ने कुछ इस तरह किया अपनी खुशी का इजहार

कश्मीरी पंडितों की आंखों में आज भी आंसू है लेकिन ये आंसू दुख के नहीं खुशी के हैं. सब साथ मिल कर आपनी कुलदेवी खीर भवानी को गीत गाकर याद कर रहे हैॆं.

News18 Madhya Pradesh
Updated: August 7, 2019, 12:16 PM IST
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Updated: August 7, 2019, 12:16 PM IST
कश्मीर से 1600 किलोमीटर दूर ग्वालियर से फिर एक बार वादी को आवाज़ दी जा रही है, फिर उम्मीदों के आसमान बन रहे हैं, अपने घर आँगन में लौट जाने के ख्वाब संजोए जा रहे हैं. कश्मीरी पंडित 19 जनवरी 1990 की काली रात को कश्मीर से बेदखल कर गए थे. एक रात की मियाद पर बेघर बेदर होकर भागे थे घाटी से, और जब जब पलटकर देखा तो वापिसी के सारे रास्ते बंद मिले. इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा था आर्टिकल 370. कश्मीरी पंडितों की आंखों में आज आंसू है लेकिन ये आंसू दुख के नहीं खुशी के हैं. ग्वालियर में रहने वाले कश्मीरी पंडितों का कहना है कि ये दिन उनके लिए बहुत बड़ा दिन है. वो दिन जहां से फिर उनके अपनी सरज़मी पर लौट जाने की राह बनती दिखाई दे रही है. आज ये कश्मीरी पंडित एक दूसरे को मिठाइयां खिला रहे. सब साथ मिल कर अपनी कुलदेवी खीर भवानी को गीत गाकर याद कर रहे हैॆं और कुलदेवी को बता रहे कि अब हम जल्द अपने घर आंगन और अपनी सरज़मी में वापस आ सकते हैं.

आर्टिकल 370, Article 370
एक दूसरे को मिठाई खिला कर आर्टिकल 370 के खत्म होने की खुशियां मनाते हुए ग्वालियर में बसे कश्मीरी पंडित


एक रात में उजड़ गई थी इनकी दुनिया

एक रात में अपनी बसी बसाई  दुनिया छोड़ कर भागे थे. इतनी मोहलत कहां थी कि कुछ ला पाते. रातों-रात कश्मीर से भागे इन 45 परिवारों ने ग्वालियर में अपनी दुनिया फिर खड़ी कर ली, लेकिन कश्मीर से मीलों दूर निकल आने के बाद भी आज भी इनकी आत्मा कश्मीर में बस्ती है. ये जानते हुए कि लौटने के बाद ना वादियों में इनका घर मिलेगा ना ही आंगन, तब भी अपने गांव लौट जाने का सुकून तो होगा.

आर्टिकल 370, Article 370
अपनी यादों में कश्मीर को बसाए कश्मीरी पंडित


उम्र के आखिरी दिनों को घाटी में बिताना चाहते हैं ये बुजुर्ग

कश्मीर के हालात पर फिल्म बना चुके नेशनल अवार्ड विनर डायरेक्टर ज्योति स्वरुप अब पार्ट टू बनाने की प्लानिंग कर रहे हैं, जिसमें धारा 370 का भी जिक्र होगा.अपनी पढाई लिखाई कश्मीर में ही पूरी करने वाले ज्योति स्वरुप की मां कश्मीर से रातों रात भागी थी. सारे बच्चों की शादियां कश्मीर में ही कीं. ज्योति कहते हैं जिस्म आ गया था कश्मीर से बाहर रूह तो वहीं छूट गई थी. जवानी में मजबूरन कश्मीर छोड़कर निकला हर कश्मीरी पंडित उम्र के आखिरी दिनों को वहीं बिताना चाहता है.
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आर्टिकल 370, Article 370
उम्र के आखिरी पड़ाव पर घाटी में अपने घर, अपने आंगन और अपनी सरज़मी में वापस जाने की उम्मीद संजोए बुजुर्ग.


(ग्वालियर से सुशील कौशिक और भोपाल से शिफाली की रिपोर्ट)

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First published: August 6, 2019, 2:05 PM IST
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