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ग्वालियर: सवर्ण और एससी/एसटी आंदोलनों के बीच ओबीसी तय करेंगे जीत-हार

ज्योतिरादित्य सिंधिया (File photo/twitter)
ज्योतिरादित्य सिंधिया (File photo/twitter)

पहली नज़र में देखने से सवर्ण आंदोलन का असर इस इलाके में हर सीट पर अलग तरह से और अलग पार्टी पर पड़ सकता है. इसे देखते हुए ही टिकटों के बंटवारे को दोनों बड़ी पार्टियों ने फ़िलहाल टाल दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2018, 5:47 PM IST
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राजनीति में एक अरसे तक ग्वालियर संभाग की 21 विधानसभा सीटों पर कौन चुनाव लड़ेगा और कौन जीतेगा ये सिंधिया परिवार ही तय करता था. आज़ादी के बाद जब इस इलाके में चुनावी राजनीति की शुरुआत हुई तो हिंदू महासभा और जनसंघ का प्रभाव यहां काफी था. जीवाजी राव सिंधिया भी हिंदुत्व की राजनीति का समर्थन करते थे, हालांकि राजमाता के कांग्रेस से चुनाव लड़ने के बाद यहां सभी सीटों पर कांग्रेस का कब्ज़ा हो गया था. बाद में विजयाराजे ने कांग्रेस छोड़ दी और लेकिन माधवराव ने 1996 तक इसे कांग्रेस के खाते में ही रखा.

बीते दो लोकसभा चुनावों से ग्वालियर की लोकसभा सीट पर बीजेपी का कब्ज़ा है और 6 में से 4 विधानसभा सीटें भी उसी के पास हैं. आम लोगों से बात करने पर पता चलता है कि सिंधिया परिवार के साथ उनका अभी भी वो भावुक रिश्ता ज़रूर मौजूद है, खासकर माधवराव से जुड़ी यादों को लेकर. इलाके के सीनियर जर्नलिस्ट जितेन्द्र पाठक भी मानते हैं कि सिंधिया परिवार ने शहर की इकॉनोमी के लिए काफी कुछ करना चाहा था, हालांकि ज्यादातर सब असफल ही साबित हुआ.

बहरहाल, जातियों की बात करें तो इस ग्वालियर संभाग में पांच जिले हैं और 21 विधानसभा सीटें हैं. इनमें से भी ज्यादातर सीटों पर डोमिनेंट कास्ट डेमोक्रेसी वाला फैक्टर काम करता है. कांग्रेस, बीजेपी और बसपा प्रभावी जातियों के लोगों को ही टिकट देती हैं. इन प्रभावी जातियों में ब्राह्मण, ठाकुर और कुशवाहा ओबीसी प्रमुख हैं. पहले इस इलाके में ब्राह्मण जाति सबसे ज्यादा प्रभावशाली मानी जाती थी लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के उदय के बाद से कम से कम शहर की छह सीटों पर उन्हीं का प्रभुत्व माना जाता है. जनगणना 2011 के मुताबिक ग्वालियर चंबल के इलाके में मध्य प्रदेश की 9 प्रतिशत आबादी रहती है. विंध्य के बाद आबादी में सवर्णों की सबसे ज्यादा हिस्सेदारी इसी इलाके में है. इस इलाके में 28% सवर्ण, 32% ओबीसी, 29% एससी-एसटी और 11% अन्य लोगों की आबादी है.



1. जिला: ग्वालियर, सीट: 6, प्रमुख जातियां: ब्राह्मण, ठाकुर, जाटव, कुशवाहा
सबसे पहले ग्वालियर ग्रामीण सीट की बात करें तो यहां से फ़िलहाल भारत सिंह कुशवाहा विधायक हैं. इस सीट पर कुशवाहा वोट सबसे ज्यादा हैं जबकि जाटव, बघेल और यादव वोट भी काफी हैं. इस सीट पर बीएसपी का भी प्रभाव है और उसके प्रत्याशी मदन कुशवाहा यहां से विधायक भी रह चुके हैं. कांग्रेस संगठन में यहां कोई सर्वमान्य नेता नहीं है इसलिए भितरघात के चलते वोट बंट जाता है.

ग्वलियर मेन से जयभान सिंह पवैया उम्मीदवार हैं जो कि पुराने आरएसएस नेता और उच्च शिक्षा मंत्री भी हैं. माना जा रहा है कि इस बार उनका टिकट काटा जा सकता है. ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मण और वैश्य उनके परम्परागत वोटर्स हैं. ग्वालियर पूर्व से बीजेपी की माया सिंह विधायक है और उनके टिकट पर भी संशय कायम है. असल में इस सीट पर दो बार कांग्रेस के मुन्ना लाल गोयल दो बार से काफी कम अंतर से हार रहे हैं. माया सिंह तोमर खेमे से मानी जाती हैं और ख़बरों के मुताबिक ब्राह्मण-वैश्य खेमा इनसे नाराज़ है. इसे देखते हुए डर है कि ये खेमा कांग्रेस के मुन्ना लाल गोयल को सपोर्ट न कर दे.

ग्वालियर दक्षिण से बीजेपी के नारायण सिंह विधायक हैं और उनका टिकट ही इस बार भी फाइनल माना जा रहा है. इस सीट पर कांग्रेस की उम्मीदवारी के लिए खींचतान जारी है. कथित तौर पर दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाने वाले भगवान सिंह यादव यहां से दावेदारी ठोंक रहे हैं लेकिन माना जा रहा है कि सिंधिया परिवार यहां से रश्मि पवार या रमेश अग्रवाल के लिए टिकट चाहते हैं. भितरवार से कांग्रेस के दिग्गज लाखन सिंह विधायक हैं. इस सीट पर किरार (धाकड़) जाति के लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है और लाखन इसी जाति से आते हैं. सीट पर काफी ब्राह्मण वोट होने के बावजूद बीजेपी के अनूप मिश्रा यहां से हार गए थे. माना जाता है कि किरार के आलावा आदिवासी और गुर्जर भी लाखन को ही वोट देते हैं. लाखन सिंह पहले बीएसपी में थे इसलिए जाटवों के वोट का एक हिस्सा भी उन्हें मिलता है.

डबरा परिसीमन के बाद आरक्षित सीट बनाई गई है और कांग्रेस की इमरती देवी यहां से विधायक हैं. यहां से पहले बीजेपी के कद्द्वर नेता नरोत्तम मिश्रा चुनाव लड़ा करते थे. इस सीट पर रावत वोट सबसे ज्यादा हैं और वही बाहुबली जाति भी है. इलाके के लोग रावतों की गुंडागर्दी से परेशान थे जिसका फायदा नरोत्तम मिश्रा को मिलता था. कथित तौर पर रावतों के खिलाफ ब्राह्मण, कुशवाहा और गुर्जर एक होकर बीजेपी को वोट देते थे. वैसे यहां सिंगल लार्जेस्ट जाति जाटव हैं जो आमतौर पर कांग्रेस के साथ माना जाता है. बीएसपी के अलग लड़ने से इस बार समीकरण बदल सकते हैं.

2. जिला: दतिया, सीटें: 3, प्रमुख जातियां: जाटव, यादव, कोरब, ब्राह्मण, डांगी
दतिया सीट से बीजेपी के नरोत्तम मिश्रा विधायक हैं. बताया जाता है कि नरोत्तम भले ही ब्राह्मण हैं लेकिन उनके मिलनसार स्वभाव के चलते कुशवाहा और अहिरवार जातियां भी उनका समर्थन करती हैं. इस इलाके में राजपूत वोट भी काफी हैं लेकिन उन्ही के खिलाफ बाकी जातियां एकतरफ वोट करती हैं. हालांकि इस बार बीजेपी से अवधेश नायक भी दावेदार हैं.

सेवड़ा सीट से बीजेपी के प्रदीप अग्रवाल विधायक हैं. इस सीट पर यादव सबसे ज्यादा हैं लेकिन गुर्जर, कुशवाहा, बघेल, ब्राह्मण और वैश्य वोट भी काफी हैं. परिसीमन से पहले ये आरक्षित सीट थी और यहां से बीएसपी के राधेलाल बघेल जीतते थे. राधेलाल अब बीजेपी में हैं और पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष भी हैं. इस सीट पर राजपूतों को बाहुबली जाति माना जाता है और अक्सर बाकी जातियां इनके प्रत्याशी के खिलाफ एक होकर वोट करती हैं. कांग्रेस की तरफ से यहां घनश्याम सिंह दावेदार हैं.

भांडेर से बीजेपी के घनश्याम पिरौनिया विधायक हैं. इस सीट पर ओबीसी जाट कोरब के वोट सबसे ज्यादा हैं, इसके आलावा यादव, ब्राह्मण, एससी और डांगी वोटर्स भी हैं. इस सीट पर आरएसएस का काफी प्रभाव है और कथित तौर पर वही कैंडिडेट भी फाइनल करते हैं. आमतौर पर बाकी जातियां इलाके की बाहुबली जाति यादवों के खिलाफ एक होकर मतदान करती हैं.

3. जिला: शिवपुरी, सीटें: 5, प्रमुख जातियां: जाटव, रावत, कुशवाहा, धाकड़-किरार, ब्राह्मण, आदिवासी
करैरा सीट पर फिलहाल कांग्रेस की शकुन्तला खटीक विधायक हैं. शकुन्तला को सिंधिया परिवार का नजदीकी माना जाता है लेकिन ऐसी चर्चा है कि इस बार उनका टिकट कट सकता है. यहां बीएसपी काफी मजबूत है और पिछली बार दूसरे नंबर पर रहे प्रजीलाल जाटव को मैदान में उतारा गया है. बीजेपी दिव्यांग उम्मीदवार रमेश खटीक पर दांव खेल सकती है. इस सीट पर जाटव सबसे ज्यादा हैं उनके अलावा खटीक, रावत, बघेल, कुशवाहा और वैश्य भी हैं.

शिवपुरी से यशोधरा राजे सिंधिया बीजेपी विधायक हैं. माना जाता है कि सिंधिया परिवार से होने के बावजूद उनकी स्थिति कमज़ोर है और अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हमेशा की तरह नरम रुख नहीं रखा तो काफी मुश्किल हो सकती है. इस सीट पर वैश्य-ब्राह्मण फैक्टर प्रभाव डालता है और सवर्ण आंदोलन यहां सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. पानी की काफी दिक्कत रहती है जिसके चलते लोग काफी नाराज़ हैं.

पोहरी सीट से प्रह्लाद भारती विधायक हैं जो किरार जाति से आते हैं और खुद को सीएम का रिश्तेदार भी कहते हैं. इस सीट पर किरार बनाम ब्राह्मण की लड़ाई होती है. हालांकि प्रह्लाद पर आरोप है कि उन्होंने लोकसभा चुनावों के दौरान इलाके में नरेंद्र सिंह तोमर के खिलाफ प्रचार किया था. तोमर की चली तो प्रह्लाद का टिकट कट सकता है. जबकि कांग्रेस के हरिवल्लभ शुक्ल चार बार से हार रहे हैं इसलिए इस बार यहां भी किसी किरार उम्मेदवार को टिकट मिल सकता है.

पिछोर कांग्रेस का वन मैन शो माना जाता है और पांच बार से यहां केपी सिंह ही जीत रहे हैं. यहां लोधी वोट सबसे ज्यादा हैं लेकिन वो बताया जाता है कि गुटबाजी के शिकार हो जाते हैं. केपी सिंह की छवि इलाके में रॉबिन हुड वाली है. हालांकि पिछली बार बीजेपी के प्रीतम लोधी सिर्फ 5 हज़ार वोटों से हारे थे. लोधी के अलावा ब्राह्मण और गगोई बनिया वोट हैं जो कांग्रेस का वोट बैंक माने जाते हैं. कोलारस से भी कांग्रेस के महेंद्र यादव विधायक है. यहां बीएसपी काफी मजबूत है और पिछली बार उसने कांग्रेस के खिलाफ कैंडिडेट नहीं उतारा था. इस बार बीजेपी से जितेन्द्र जैन को सबसे मजबूत उम्मीदवार माना जा रहा है. यहां सवर्ण आंदोलन का नुकसान कांग्रेस को होता नज़र आ रहा है क्योंकि बीजेपी वाले सपाक्स के साथ मिलकर कांग्रेस नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.

4. जिला: गुना, सीटें: 4, प्रमुख जातियां: किरार, आदिवासी, जाटव, गुर्जर, कुशवाहा, मुस्लिम

बमौरी सीट पर कांग्रेस के महेंद्र सिंह सिसोदिया विधयाक हैं. ये 50 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी इलाका है और यहां आदिवासियों के आलावा किरार और ब्राह्मण वोट सबसे ज्यादा हैं. यहां आदिवासियों और मुसलानों को कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है जबकि ब्राह्मण और किरार बीजेपी के साथ माने जाते हैं. गुना सीट की बात करें तो कोरी जाति से संबंध रखने वाले पन्नालाल शाक्य यहां से बीजेपी विधायक हैं. ये आरक्षित सीट है और यहां 20 प्रतिशत से ज्यादा एससी वोटर्स हैं. यहां मुस्लिम फैक्टर भी है जो कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता है हालांकि एससी वोटबैंक जायदा प्रभावी है.

चचौड़ा से बीजेपी कि ममता मीना विधायक हैं. वो मीणा जो राजस्थान में एसटी में आते हैं मध्य प्रदेश में उन्हें मीना कहा जाता है और ये ओबीसी जाति है. इस सीट पर मीना वोटर सबसे ज्यादा हैं और वो अक्सर अपनी जाति के कैंडिडेट को ही वोट करते हैं. मीणा के आलावा यहां आदिवासी भील, गुर्जर सबसे ज्यादा हैं. इस सीट पर आदिवासी बनाम मीना का मुकाबला होता है पार्टियों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. राघोगढ़ दिग्विजय सिंह की पारिवारिक सीट है और यहां से फ़िलहाल उनके बेटे जयवर्धन सिंह कांग्रेस के विधयाक हैं. इस सीट पर कुशवाहा, गुर्जर, लोधी, राजपूत, आदिवासी और मुस्लिम सभी हैं लेकिन सिर्फ दिग्विजय परिवार के नाम पर वोटिंग होती है.

5. जिला: अशोकनगर, सीटें: 3, प्रमुख जातियां: जाटव, यादव, ब्राह्मण, जैन, आदिवासी, मुस्लिम
अशोकनगर रिजर्व सीट है और यहां से कांग्रेस के गोपीलाल जाटव विधायक हैं. यहां जैन सबसे प्रभावी जाति मानी जाती है और ये बीजेपी समर्थक माने जाते हैं. यहां के ग्रामीण इलाकों में यादव और ब्राह्मण प्रमुख जातियां हैं. आरक्षित सीट होने के बावजूद भी एससी वोटों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता कैंडिडेट प्रभावशाली जातियां तय करती हैं. चंदेरी से कांग्रेस के गोपाल सिंह उर्फ़ डग्गी जबकि मुंगावली से बिजेंद्र सिंह यादव विधायक हैं. इन दोनों सीटों पर आदिवासी, जाटव, यादव और ब्राह्मण के आलावा मुस्लिम आबादी मौजूद है. चंदेरी से इस बार कांग्रेस भूपेंद्र दुबे पर दांव खेल सकती है क्योंकि गोपाल पर आरोप लगा है कि जिला पंचायत चुनावों में उन्होंने बीजेपी का साथ दिया था. यादव वोटों के चलते मुंगावली से ब्रिजेन्द्र ही कैंडिडेट हो सकते हैं.

सवर्ण आंदोलन का असर
ऐसा माना जा रहा है कि ग्वालियर शहर की छह सीटों पर सवर्ण आंदोलन का काफी असर देंखेने को मिल सकता है. इन सीटों पर ब्राह्मण और राजपूत दोनों काफी संख्या में मौजूद हैं और ये दोनों जातियां ही सवर्ण आन्दोलन को चलाने के पीछे हैं. ग्वालियर की अर्थव्यवस्था पूरी तरह व्यापारी वर्ग पर ही निर्भर मानी जाती है और ये बीजेपी का वोटबैंक है. 2 अप्रैल को हुए एससी/एसटी बंद से तीनों ही प्रभावशाली जातियां ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य सबसे ज्यादा नाराज़ हैं. इस आंदोलन के बाद इलाके की दो प्रभावशाली जातियां ठाकुर और ब्राह्मण भी मतभेद भुलाकर साथ आने के लिए मजबूर हैं.

कर्मचारी संघ (अजाक्स) के ग्वालियर प्रभारी मुकेश मौर्या साफ़ कहते हैं कि इस बार दलित, आदिवासी और पिछड़ों के एक हिस्से का वोट बैंक एक ही तरफ जाने की ठान चुका है. वो साफ़ कहते हैं कि बीजेपी उनके लिए कभी कोई विकल्प रहा ही नहीं और अपने समाज के नेताओं को ही सपोर्ट किया जाएगा. जबकि सपाक्स ग्वालियर के प्रमुख ब्रिजेश भदौरिया खुलकर कहते हैं कि बीजेपी ने सवर्ण समाज को अपनी जागीर समझा हुआ था लेकिन इस बार उन्हें अक्ल आ जाएगी. इस तरह पहली नज़र में ये नुकसान बीजेपी का नज़र आ रहा है लेकिन सीनियर जर्नलिस्ट जितेन्द्र गौतम इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनका मानना है कि सवर्ण आंदोलन का असर रहा तो ये कांग्रेस और बीजेपी दोनों को ही नुकसान पहुंचाएगा क्योंकि दोनों की ही लीडरशिप सवर्ण ही है और इन्हें ही धोखेबाज की तरह देखा जा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली कहते हैं कि सवर्ण आंदोलन ने एससी/एसटी वोट बैंक पर से ध्यान हटा दिया है जबकि सच ये है कि वो भी इन चुनावों में संगठित हो गया है. अब दो संगठित वोटबैंकों के बीच ओबीसी भी मौजूद हैं जो कि 32% से भी ज्यादा हैं. ऐसे में निर्णायक मुकाबला ओबीसी जातियां तय करती नज़र आ रही हैं. हालांकि सवर्ण आंदोलन के नेता कह रह हैं कि ओबीसी उनके साथ हैं लेकिन ऐसा अभी तक कुछ नज़र नहीं आ रहा.

ओबीसी महासभा के विजय याग्निक भी ये सवाल उठाते हैं कि जो लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं उनका साथ भला ओबीसी समाज कैसे दे सकता है. हालांकि वो ये भी साफ़ नहीं करते कि उनका सपोर्ट किस तरफ रहेगा. बहरहाल पहली नज़र में देखने से सवर्ण आंदोलन का असर इस इलाके में हर सीट पर अलग तरह से और अलग पार्टी पर पड़ सकता है. इसे देखते हुए ही टिकटों के बंटवारे को दोनों बड़ी पार्टियों ने फ़िलहाल टाल दिया है. क्योंकि इस इलाके में ज्यादातर सीटों पर उम्मीदवारी सवर्णों के पास ही रही है और इस समीकरण में ओबीसी लोगों के प्रतिनिधित्व की संख्या बढ़ाना सुरक्षित माना जा रहा है.
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