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ग्वालियर: हिंदू महासभा के गढ़ में अटल भी नहीं जीत पाए थे सिंधिया का किला

अटल भी नहीं जीत पाए थे सिंधिया का किला
अटल भी नहीं जीत पाए थे सिंधिया का किला

साल 1984 के चुनावों में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी हिंदू महासभा के इस गढ़ में माधवराव सिंधिया के सामने हार का सामना करना पड़ा था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2018, 5:44 PM IST
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ग्वालियर का जय विलास महल हमेशा से ही मध्य प्रदेश की राजनीति के केंद्र में रहा है. आज़ादी के बाद यही महल रजवाड़ों की राजनीति का गढ़ था. ये वो लोकसभा सीट है जहां देश के पहले आम चुनावों में हिंदू महासभा के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी. कई मायनों में नागपुर के बाद हिंदुत्व की राजनीति का इतिहास यहां से भी जुड़ा हुआ है. सिंधिया खानदान के नेता चाहे वो कांग्रेस में रहे या फिर जनसंघ-बीजेपी में, इस सीट ने उन्हें कभी निराश नहीं किया.

साल 1984 के चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी को भी यहां से हार का सामना करना पड़ा. जब अटल पीएम बन गए तो शहर के नया बाजार की बहादुरा स्वीट्स के लड्डुओं को 'पीएम पास' के नाम से भी जाना जाता था. आज शिवपुरी विधानसभा और गुना लोकसभा के अलावा सिंधिया परिवार का असर कहीं सीधे तौर पर दिखाई नहीं देता. हालांकि इस शहर से गुजरते हुए इस सिंधिया परिवार के इतिहास से बच कर निकलना लगभग नामुमकिन नज़र आता है.

राजशाही
कहानी शुरू होती है छोटे-छोटे रजवाड़ों को जोड़कर मध्य भारत नाम के राज्य के अस्तित्व में आने के बाद. यहीं के आखिरी महाराजा थे जीवाजी राव सिंधिया. मध्य भारत के मुखिया को सांकेतिक तौर पर चुना जाता था. 28 मई 1948 से लेकर 31 अक्टूबर 1956 तक जीवाजी सिंधिया यहां के राज प्रमुख थे. 1951 के पहले लोकसभा चुनावों में यहां 11 सीटों पर चुनाव हुए जिनमें से 9 कांग्रेस और दो हिंदू महासभा के खाते में आई. 1952 में 99 सीटों पर पहले असेंबली इलेक्शन हुए, जिनमें 75 सीटों पर कांग्रेस जबकि 11 सीटों पर हिंदू महासभा ने जीत दर्ज की. गौरतलब है कि 31 अक्टूबर 1956 को ये शाही रियासतें मध्य प्रदेश में मिला दीं गई. 1957 में दूसरी लोकसभा के चुनाव होने थे और हिंदू महासभा से निपटने के लिए कांग्रेस के पास एक ही ऑप्शन था सिंधिया राजशाही का साथ.
जीवाजी राव सिंधिया




ये उस दौर की बात है जब भले ही आज़ादी मिल गई थी लेकिन देश के कई इलाकों में लोग रजवाड़ों के प्रभाव से मुक्त नहीं थे और उन्हीं के कहने पर वोट डाला करते थे. मध्य प्रदेश में विलय के बावजूद भी पुरानी ग्वालियर विरासत में 8 लोकसभा और 60 विधानसभा सीटें थीं जहां सिंधिया परिवार का एकछत्र राज था. 1957 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ग्वालियर आए और उनकी मुलाक़ात जीवाजी सिंधिया से हुई. हालांकि जीवाजी को कांग्रेस के लोकतंत्र वाले आइडिया में भरोसा नहीं था और उनकी नीतियों के प्रति भी खुलकर नाराजगी जाहिर करते रहते थे.

जीवाजी हिंदू महासभा के भी काफी करीब माने जाते थे और कांग्रेस को डर था कि कहीं वह सार्वजनिक रूप से उसकी सदस्यता ग्रहण न कर लें.


विजयाराजे सिंधिया के भाई ध्यानेंद्र सिंह बताते हैं कि जीवाजी राव पर कांग्रेस ने दबाव बनाया तो कहानी में एंट्री हुई जीवाजी की पत्नी विजयाराजे सिंधिया की. विजयाराजे दिल्ली यह कहने आईं थी कि जीवाजी राजनीति में नहीं आना चाहते लेकिन गोविन्द वल्लभ पंत और लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें ऐसा प्रस्ताव दिया कि विजयाराजे मना नहीं कर सकीं. नेहरू कामयाब रहे और ग्वालियर से तो नहीं लेकिन गुना से विजयाराजे ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और हिंदू महासभा के उम्मीदवार को 60 हज़ार से ज्यादा वोट से हरा दिया. हिंदू महासभा इन चुनावों में सिर्फ एक सीट पर सिमट कर रह गई.

विजयाराजे सिंधिया.


दूसरी बार विजयाराजे ने ग्वालियर से लोकसभा चुनाव लड़ा और फिर जीत गईं. इस दौरान मध्य प्रदेश में सीएम द्वारका प्रसाद मिश्र जिन्हें इंदिरा का करीबी माना जाता है, काफी दबदबा रखते थे. 1966 में ग्वालियर में छात्रों ने आन्दोलन किया, पुलिस ने गोली चलाई और दो छात्र मारे गए. इस घटना के बाद विजयाराजे और डीपी मिश्र के बीच के मतभेद सार्वजानिक हो गए.

इसी साल नाराज़ होकर विजयाराजे ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया और आने वाले लोकसभा-विधानसभा चुनावों में खड़ा होने का ऐलान कर दिया. कारीरा विधानसभा से जनसंघ के टिकट जबकि गुना लोकसभा से स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर उन्होंने जीत दर्ज की.

परिवार शाही
यहीं से पहली बार बेटे माधवराव सिंधिया की एंट्री हुई और जनसंघ ने विधानसभा में विजयाराजे को विपक्ष का नेता बना दिया. कांग्रेस का भी एक धड़ा जिसका नेतृत्व रीवा के जागीरदार नेता गोविन्द नारायण के पास था वह डीपी मिश्र से खफा था. विजयाराजे और गोविंद ने मिलकर डीपी मिश्र की सरकार को गिरा दिया. हालांकि गोविंद 20 महीने बाद ही कांग्रेस में वापस लौट गए और सरकार गिर गई. साल 1971 में इंदिरा गांधी ने प्रिवीपर्स ख़त्म कर दिया और राजघरानों को मिलने वाला वेतन बंद हो गया.

विजयाराजे इंदिरा के फैसले से काफी नाराज़ थी और इस दौरान उनके करीबी रहे हिंदूवादी नेता संभाजी राव आंगरे ने उन्हें बेटे माधवराव को राजनीति में ले आने की सलाह दी. आंगरे की सलाह पर ही माधवराव को जनसंघ की सदस्यता दिला दी गई. 26 साल के माधव राव ने गुना सीट से कांग्रेस के सीनियर लीडर देशराज जाधव को डेढ़ लाख वोटों से हरा दिया.


उधर इसी साल पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने ग्वालियर लोकसभा सीट से जीत दर्ज की थी. माधवराव पिता जीवाजी की तरह हिन्दुत्ववादी राजनीति से इत्तेफाक नहीं रखते थे. इमरजेंसी का साल आया और इस दौरान विजयाराजे को गिरफ्तार कर लिया गया जबकि माधवराव नेपाल भाग गए.

माधवराव सिंधिया


विजयाराजे ने जब ये वादा किया कि वह राजनीति से दूर रहेंगी तभी माधवराव के खिलाफ जारी वारंट वापस लिया गया. माधवराव कांग्रेस की तरफ झुकने लगे थे और हुआ भी यही कि बिना पार्टी जॉइन किए 1977 में उन्होंने कांग्रेस के समर्थन से ग्वालियर से निर्दलीय की तरह चुनाव लड़ा और जीत गए, हालांकि मध्य प्रदेश की 40 में से 38 सीटों पर जनता पार्टी के कैंडिडेट जीते. 1980 के विधानसभा चुनावों से पहले माधवराव ने कांग्रेस जॉइन कर ली थी और विजयाराजे नई-नई बनी बीजेपी के साथ हो गयीं. विजयाराजे की नाराज़गी इस कदर थी कि 1980 के चुनावों में वो जनता पार्टी के टिकट पर रायबरेली से चुनाव लड़ने पहुंच गई. विजयाराजे के इस फैसले के बाद जय विलास महल में मां-बेटे अलग-अलग रहने लगे.

माधवराव मां से इस अलगाव के लिए आंगरे को ज़िम्मेदार मानते थे. 1984 के चुनावों में माधवराव ने अटल बिहारी वाजपेयी को 2 लाख वोटों से हराकर उनकी सबसे सुरक्षित सीट जीत ली. माधवराव राजीव गांधी की सरकार में रेल मंत्री और राजीव की मौत के बाद नरसिम्हा सरकार में सिविल एविएशन मंत्री भी रहे. माधवराव को कांग्रेस में पीएम पद के उम्मीदवार के बतौर देखा जाने लगा था.


1996 में जैन हवाला कांड सामने आया और इसमें माधवराव का नाम भी सामने आया. नरसिम्हा राव ने उन्हें टिकट तक देने से इनकार कर दिया. कांग्रेस जब सोनिया के हाथ में आई तो उन्होंने माधवराव को सदन में उपनेता की जिम्मेदारी दे दी. साल 2001 सिंधिया परिवार के लिए काफी बुरा रहा और विजयाराजे का देहांत हो गया और उनकी वसीयत में माधवराव को अरबों की संपत्ति से बेदखल कर दिया था. करीब 8 महीने बाद 30 सितंबर 2001 को माधावराव सिंधिया कानपुर में एक रैली को संबोधित करने जा रहे थे लेकिन ख़राब मौसम के चलते मैनपुरी में उनका प्लेन क्रैश हो गया जिसमें उनकी मौत हो गई.

तीसरी पीढ़ी मैदान में
यहां से सिंधिया परिवार की तीसरी पीढ़ी राजनीति में आई और ज्योतिरादित्य को पिता की सीट गुना से बाईइलेक्शन लड़ाया गया. ये इलेक्शन उन्होंने 4 लाख से ज्यादा वोटों से जीता. तब से लगातार चौथी बार इस सीट पर उनका ही कब्ज़ा कायम है. उधर ग्वालियर सीट से 1999 में ही बीजेपी के कद्दावर नेता जयभान सिंह पवैया जीत कर आ चुके थे लेकिन 2004 में रामसेवक सिंह ने ये सीट फिर कांग्रेस को दिला दी थी.

2007 के उपचुनाव में ये सीट फिर से सिंधिया परिवार के खाते में चली गई और माधवराव की सबसे छोटी बहन यशोधरा राजे सिंधिया दो बार यहां से एमपी चुनी गईं. हालांकि 2014 में नरेंद्र सिंह तोमर को यहां से टिकट मिला और अब वही इस इलाके के सबसे बड़े नेता के बतौर जाने जाते हैं.
यशोधरा शिवपुरी से विधानसभा चुनाव लड़कर जीतीं और शिवराज सरकार में मिनिस्टर भी हैं. यशोधरा की बड़ी बहन वसुंधरा राजे फ़िलहाल राजस्थान की सीएम हैं. वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह और बहु निहारिका सिंह भी राजनीति में हैं. यशोधरा के बेटे अक्षय सिंधिया भी प्रचार सभाओं में दिखाई देते हैं और जल्दी ही राजनीति में दिखाई दे सकते हैं.

अब कैसा है ग्वालियर ?
ग्‍वालियर के क्‍या हाल हैं,  इसका जवाब ढूंढ़ते हुए जब मैं शहर के सिटी सेंटर इलाके में लोगों से बात करता हूं तो मेरी मुलाक़ात अशोक अग्रवाल नाम के एक व्यापारी से होती है जो गर्व से खुद को बीजेपी का वोटर बताते हैं. हालांकि अशोक ही कहते हैं कि सिंधिया परिवार खासकर माधवराव ने इस शहर के लिए काफी काम किया. उनके मुताबिक इस शहर में जो भी बेहतर आपको नज़र आ रहा है उसे या तो माधवराव ने बनाया या फिर उसकी नींव उन्होंने ही रखी थी. अशोक का दावा है कि अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया आज भी यहां से चुनाव लड़ जाएं तो 4 लाख वोटों से ही जीतेगा.

वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि भले ही सिंधिया परिवार के सभी लोगों से शहर का जुड़ाव न रहा हो लेकिन माधवराव जब थे तब ग्वालियर शहर के हर घर में उनके कट्टर वोटर्स थे.
पहली बात तो सिंधिया परिवार यहां किसी तरह का व्यापार नहीं करता तो छोटे-मोटे लालच के चलते उन्होंने शहर में छवि ख़राब नहीं की. इसके अलावा छोटे शहरों की पॉलिटिक्स जैसे किसी को छुड़ाना, गिरफ्तार करना या गुंडागर्दी इस सब में ये परिवार कभी शामिल रहा ही नहीं और इसलिए प्रशासन भी इस परिवार की रेस्पेक्ट करता है.

इस शहर की इकॉनोमी आज कुछ नहीं रह गई है लेकिन माधवराव के वक़्त में यहां जेसी मिल हुआ करती थी जिसमें उस ज़माने में 18 हज़ार लोग काम करते थे. आज से तीस साल पहले वो मिल हर महीने 3 करोड़ रुपए सैलेरी बांटती थी. वह मिल इस शहर की इकॉनोमी का जरिया थी,उसके लिए अलग से रेलवे स्टेशन बनाया गया था. जेसी मिल के आस-पास छह-सात और फैक्ट्रियां थीं वो भी जेसी मिल के बंद होने के बाद धीरे-धीरे बंद हो गयी.

ग्‍वालियर रेलवे स्‍टेशन.


माधवराव ने काफी मेहनत से बान्मोर और मालनपुर इन्डस्ट्रीयल एरिया विकसित करने की कोशिश की थी, अब वहां आईं 95% फैक्ट्रियां बंद हो चुकीं हैं. माधवराव ने जब देखा कि इंडस्ट्री विकसित नहीं हो रही हैं तो इस शहर को एमपी का एजुकेशन हब बनाने का फैसला लिया. इंजीनयरिंग कॉलेज खोले, नोएडा से आईआईटीएम का कैंपस ग्वालियर लेकर आए, सेन्ट्रल स्कूल के टीचर्स का ट्रेनिंग सेंटर खोला गया. ये देखकर कई प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज भी आए हालांकि आज ये सब ही अपने बुरे दौर में हैं लेकिन एक वक़्त था जब ग्वालियर शहर में देश के सबसे ज्यादा प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज थे.

अब हुआ ये कि रोजगार के साधन न बढ़ने से इलाके में क्राइम बढ़ने लगा. इसके अलावा चंबल इलाके में भी रोज़गार के लिए कुछ नहीं था तो वहां से ग्वालियर की तरफ पलायन शुरू हुआ और इस शहर का एक हिस्सा छोटा भिंड-मुरैना बन गया. उस इलाके में पहले ही क्राइम ज्यादा था तो सब बच्चों को उस माहौल से निकालने के लिए इधर आ गए और उनके साथ क्राइम भी आ गया.

इलाके के सीनियर जर्नलिस्ट जितेन्द्र पाठक भी मानते हैं कि छोटी सी कोचिंग इंडस्ट्री और मार्केट को छोड़ दें तो शहर की इकॉनोमी कुछ भी नहीं है. इस इलाके के युवाओं को नौकरी ढूंढ़ने के लिए भोपाल, इंदौर या दिल्ली का रुख करना पड़ता है. राजनीतिक तौर पर भी देखें तो जैसे-जैसे राजनीति में भी सिंधिया परिवार का रसूख ख़त्म होता गया तो इलाके के ब्राह्मण और ठाकुर क्षत्रप खुलकर सामने आ गए. जाति आधारित वोटिंग तो हो ही रही थी लेकिन एससी/एसटी के भारत बंद और अब सवर्ण आन्दोलन ने इस जाति समीकरण को भी बिगाड़ दिया है.

शहर के एक मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस लास्ट ईयर के छात्र बिजेंद्र रघुवंशी सपाक्स (सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी कर्मचारी संस्था) की बैठक से बाहर निकलते हुए मुझसे सवाल करते हैं कि समाज को इस तरह बांटे रहने से क्या किसी का भला है ? मैं जवाब में उससे कहता हूं ये सवाल अन्दर क्यों नहीं पूछा. वो मुस्कुराते हुए कहता है- 'सवाल पूछना आपका काम है आपने भी तो नहीं पूछा...'
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