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MP के ग्वालियर-चंबल में सवर्ण आंदोलन ने बिगाड़ा कांग्रेस-बीजेपी का खेल

ग्वालियर-चंबल में सवर्ण आंदोलन ने बिगाड़ा कांग्रेस-बीजेपी का खेल
ग्वालियर-चंबल में सवर्ण आंदोलन ने बिगाड़ा कांग्रेस-बीजेपी का खेल

टिकट बांटने में हो रही देरी से साफ है कि सवर्ण आंदोलन ने मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के ही समीकरण बिगाड़ दिया हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 17, 2018, 11:49 AM IST
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शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर, कमलनाथ, प्रभात झा, थावरचंद गहलोत के साथ रविवार को लाल सिंह आर्य भी उस लिस्ट में शामिल हो गए जिन्हें सवर्ण संगठनों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले एससी/एसटी एक्ट के विरोध में शुरू हुआ सवर्ण आंदोलन काफी आक्रामक रूप अख्तियार करता जा रहा है.

सवर्ण संगठन सपाक्स, ब्राह्मण सभा और करणी सेना के बाद अब दलितों के संगठन अजाक्स ने भी रैली निकालकर सवर्ण उम्मीदवारों को वोट न करने की अपील की है. भले ही कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इसके पीछे एक दूसरे का हाथ बताएं लेकिन करीब से देखने पर पता चलता है कि इस आंदोलन ने ग्राउंड पर दोनों का ही खेल बिगाड़ दिया है.

सपाक्स उतरा चुनावी मैदान में
सामान्य, पिछड़ा एवं कर्मचारी संघ (सपाक्स) ने भी मध्य प्रदेश की सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. इसके बाद से ही बीजेपी और कांग्रेस ने टिकट बांटने के लिए जो भी राजनीतिक समीकरण सोच कर रखे थे वो अब बेकार हो गए हैं. सपाक्स ग्वालियर के प्रमुख ब्रिजेश भदौरिया खुलकर कहते हैं कि बीजेपी ने सवर्ण समाज को अपनी जागीर समझा हुआ था लेकिन इस बार उन्हें अक्ल आ जाएगी. सपाक्स ने बीते दिनों अपनी मांगों में भी परिवर्तन कर दिया. पहले वे एससी/एसटी एक्ट को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक लागू करने की मांग कर रहे थे, अब वे इसे पूरी तरह ख़त्म करने की मांग कर रहे हैं.
भदौरिया कहते हैं कि सपाक्स कांग्रेस और बीजेपी दोनों का ही विरोध करेगी और किसी का भी साथ नहीं देगी. सीएम शिवराज के ट्वीट पर भदौरिया ने कहा कि सीएम लोगों से मुंह छुपाकर घूम रहे हैं और ट्विटर पर कह रहे हैं कि अन्याय नहीं होने दूंगा. बातचीत में भदौरिया अपने संगठन को देश की 78% जनता (सामान्य+ओबीसी+अल्पसंख्यक) का प्रतिनिधि बताते हैं हालांकि सवाल पूछने पर एक भी ओबीसी या मुस्लिम संगठन का नाम नहीं बता पाते, जो उनका समर्थन कर रहा है.



क्या कह रहे हैं एससी/एसटी
अनुसूचित जाति, जनजाति अधिकारी और कर्मचारी संघ (अजाक्स) के ग्वालियर प्रभारी मुकेश मौर्या साफ़ कहते हैं कि इस बार दलित, आदिवासी और पिछड़ों के एक हिस्से का वोट बैंक एक ही तरफ जाने की ठान चुका है. वो साफ़ कहते हैं कि बीजेपी उनके लिए कभी कोई विकल्प रहा ही नहीं और अपने समाज के नेताओं को ही सपोर्ट किया जाएगा.



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अजाक्स ने रविवार को एक अपील जारी की है जिसमें कहा गया है कि एससी/एसटी समाज के लोग आगामी विधानसभा चुनाव में ऊंची जाति के उम्मीदवारों को वोट न दें. इस तरह की अपील से समाज में और खाई पैदा नहीं हो जाएगी? इस सवाल के जवाब में मौर्या कहते हैं कि लोगों को दिखता ही नहीं कि ये खाई पहले से मौजूद है और हम लोग पहले से ही खाई के एक तरफ रह रहे हैं. हालांकि इस इलाके में जाटव के आलावा कोइरी जाति के लोगों की संख्या भी काफी है और ये लोग अक्सर एक ही जगह वोट नहीं करते हैं.

बीजेपी में ही मतभेद शुरू
ग्वालियर-चंबल संभाग वो इलाका है जहां से शिवराज कैबिनेट में सात मंत्री- नरोत्तम मिश्रा, यशोधरा राजे सिंधिया, रुस्तम सिंह, जयभान सिंह पवैया, लाल सिंह आर्य, नरेंद्र कुशवाहा शामिल हैं. केंद्रीय मंत्री और एमपी बीजेपी चुनाव प्रचार समिति के मुखिया नरेंद्र सिंह तोमर भी ग्वालियर से ही सांसद हैं. इस इलाके के बीजेपी के तीन बड़े नेताओं में नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा और अनूप मिश्रा शामिल हैं. अनूप मिश्रा इलाके के पुराने ब्राह्मण नेता माने जाते हैं और बीते दिनों उन्होंने सवर्ण आंदोलन को अपना समर्थन देकर तोमर को बड़ा झटका दे दिया. इसके अलावा बीजेपी से विधायक रहे रघुनंदन शर्मा ने भी इस मुद्दे पर इस्तीफ़ा दे दिया है.

दूसरी तरफ दिल्ली हाईकमान के आदेशों का पालन कर रहे तोमर इस मामले पर कुछ भी बोलने से बचते नज़र आते हैं. कुछ दिन पहले मामला तब और बिगड़ गया जब तोमर के कार्यक्रम में सपाक्स और करणी सेना के लोग विरोध दर्ज कराने पहुंचे और किसी उत्साही आन्दोलनकारी ने तोमर समर्थकों के सामने ही उनके पोस्टर पर कालिख पोत दी. सवर्ण समाज के लोग आरोप लगाते हैं कि इसके बाद तोमर के समर्थकों ने उनके साथ मारपीट भी की.

तोमर का ठाकुरवाद!
ग्वालियर संभाग में कुल पांच जिले हैं जिनमें 21 विधानसभा सीटें हैं. ग्वालियर जिले में ही 6 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 4 पर बीजेपी जबकि 2 पर कांग्रेस का कब्जा है. नरेंद्र सिंह तोमर इस इलाके के ठाकुर नेताओं में सबसे प्रभावशाली माने जाते हैं. जैसे-जैसे उनका कद बीजेपी में बढ़ रहा है उन्हें शिवराज के बाद सीएम पद के मजबूत उम्मीदवार के रूप में भी देखा जाता है. इलाके के वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली बताते हैं कि सिंधिया परिवार की इस सीट पर तोमर ने भले ही जीत दर्ज कर ली लेकिन बीजेपी के ही कुछ धड़े उनसे नाराज़ रहते हैं.



श्रीमाली के मुताबिक पहली वजह है कि तोमर सिर्फ 25 हज़ार वोटों के अंतर से जीते और कांग्रेस के अशोक सिंह ने उन्हें कड़ी टक्कर दी थी. काउंटिंग में धांधली के आरोप भी लगे जिससे उनकी छवि को नुकसान पहुंचा था. दूसरा इस इलाके की दो प्रमुख जातियों ब्राह्मण और ठाकुर के आधार पर ही बीजेपी में भी गुट बने हुए हैं. एक गुट प्रभात झा का है, एक अनूप मिश्रा का और एक खुद तोमर का. ठाकुर क्योंकि बाहुबल वाले भी हैं इसलिए तोमर के आने के बाद खनन, टोल और अन्य सरकारी ठेके अब उन्हें ही मिल रहे हैं जिससे इलाके के ब्राह्मण काफी नाराज़ चल रहे हैं. इसके आलावा ग्वालियर की ही किसी सीट से तोमर अपने बड़े बेटे रामू तोमर को टिकट दिलाना चाह रहे हैं. सूत्रों के मुताबिक तोमर की नज़र माया सिंह या फिर जयभान सिंह पवैया की सीट पर है.



सपाक्स के पीछे कौन ?
NEWS18 Hindi से ख़ास बातचीत में खुद सीएम शिवराज ने आरोप लगाया कि सपाक्स और सवर्ण आंदोलन को कांग्रेस हवा दे रही है. उधर कांग्रेस नेताओं का कहना है कि स्पाक्स के पीछे आरएसएस ही है. अब इन दोनों ही थ्योरी में दम नज़र आता है. कांग्रेस को सपाक्स के आंदोलन से सीधा फायदा होता नज़र आ रहा है क्योंकि अगर वो चुनाव लड़ती है तो बीजेपी के कोर वोट बैंक (ठाकुर+वैश्य+ब्राह्मण) में बड़ी सेंध लगा सकती है.

इलाके के कुछ पत्रकार तो ये तक मानते हैं कि ऐसा पहली बार है कि सवर्ण आंदोलन के नाम पर इलाके के ब्राह्मण और ठाकुर एक मंच पर आ रहे हैं. अगर ये दोनों जातियां बीजेपी से हाथ खींच लें तो पार्टी को ऐतिहासिक नुकसान झेलना पड़ सकता है. कांग्रेस चाहेगी ही कि भले ही उसके वोटों में इजाफा न हो लेकिन बीजेपी के वोट कम हो जाएं. शिवपुरी में विरोध होने पर ज्योतिरादित्य का ये कहना कि- 'जाइए जो सरकार में हैं उनसे सवाल कीजिए, ये हमने नहीं किया है' और भी स्पष्ट कर देता है कि कांग्रेस चुपचाप बीजेपी का नुकसान होते देखना चाहती है.

उधर सपाक्स के पीछे बीजेपी के होने वाली थ्योरी पर भी खूब चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व की अदूरदर्शिता के चलते बीजेपी अपने ही ट्रैप में फंस गयी है. पहले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद एससी/एसटी नाराज़ हुए तो सरकार ने ऑर्डिनेंस लाकर पहले से भी कड़ा कानून बना दिया. अब इससे उनका कोर वोट बैंक सवर्ण तो नाराज़ हुए ही लेकिन एससी/एसटी वोट बैंक भी खाते में आता नज़र नहीं आ रहा. अब सवर्ण वोट खिसकता देख आरएसएस की सलाह पर सपाक्स को इसलिए मैदान में उतारा गया है जिससे ये वोट खिसक कर कम से का कांग्रेस के खाते में न जाए. इसके आलावा मायावती की एंट्री के जरिए एससी/एसटी वोटों को भी कांग्रेस से दूर रखने का प्लान है.



सिर्फ सपाक्स ही नहीं आने वाले दिनों में क्षत्रिय और ब्राह्मण महासभा भी अपने-अपने कैंडिडेट लेकर सामने आ सकते हैं जिससे बीजेपी से खिसका वोट बैंक बंट जाएं. आरएसएस से जुड़े रहे स्थानीय निवासी बिजेंद्र रघुवंशी एक अहम् सवाल उठाते हैं. वो कहते हैं कि सपाक्स सरकारी अधिकारियों -कर्मचारियों का संगठन है जिसके मुखिया हीरालाल त्रिवेदी आरएसएस के करीबी माने जाते हैं. शिवराज सरकार ने ही उन्हें मुख्य सूचना आयुक्त जैसा पद भी दिया था. अब ऐसा कैसे हो सकता है कि एक आईएएस अधिकारी ग्वालियर के सर्किट हाउस में बैठकर मौजूदा सरकार के खिलाफ पार्टी बनाकर टिकट बांटे, और सरकार चुपचाप देखती रहे.

कांग्रेस-बीजेपी दोनों ही फंसे हैं ?
इलाके के सीनियर जर्नलिस्ट जितेन्द्र पाठक का मानना है कि असल में ऐसे किसी सवर्ण आंदोलन से निपटने की तैयारी किसी भी पार्टी की नहीं थी. सबसे पहले तो 2 अप्रैल को दलित इतना बड़ा आंदोलन कर देंगे इसका अंदाज़ा किसी को नहीं था फिर वो सरकार जिसे सवर्ण अपना मानते हैं वो ऐसा कानून पास कर देगी ये भी किसी को अंदाज़ा नहीं था.

सवर्ण आंदोलन कि खासियत ये है कि ये अपनों का अपनों के खिलाफ आंदोलन है. ग्वालियर में उग्र इसलिए दिखाई देता है क्योंकि यहां सवर्णों की आबादी भी 28% है और एससी/एसटी की 30% के आस-पास है. ऐसे में अब सारा खेल 32% ओबीसी और अल्पसंख्यकों के हाथ में रह गया है. इसी के चलते कांग्रेस और बीजेपी टिकट बंटवारे की तारीखों को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं. सवर्ण आंदोलन नहीं थमा तो टिकटों के बंटवारे में भारी फेरबदल भी देखने को मिल सकता है.
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