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क्‍या आप जानते हैं 'कोहिनूर' के चलते गुलाम था भारत!

क्‍या आप जानते हैं 'कोहिनूर' के चलते गुलाम था भारत!

मान्यता है कि 'बिजली एक बार गिरे तो दुर्घटना, उसी जगह पर दूसरी बार गिरे तो इत्तेफाक और वहीं तीसरी बार ऐसा हो तो समझ लेना चाहिए कि किसी श्राप का प्रकोप है।'

मान्यता है कि 'बिजली एक बार गिरे तो दुर्घटना, उसी जगह पर दूसरी बार गिरे तो इत्तेफाक और वहीं तीसरी बार ऐसा हो तो समझ लेना चाहिए कि किसी श्राप का प्रकोप है।'

मान्यता है कि 'बिजली एक बार गिरे तो दुर्घटना, उसी जगह पर दूसरी बार गिरे तो इत्तेफाक और वहीं तीसरी बार ऐसा हो तो समझ लेना चाहिए कि किसी श्राप का प्रकोप है।'

  • News18
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    मान्यता है कि 'बिजली एक बार गिरे तो दुर्घटना, उसी जगह पर दूसरी बार गिरे तो इत्तेफाक और वहीं तीसरी बार ऐसा हो तो समझ लेना चाहिए कि किसी श्राप का प्रकोप है।'

    अंग्रेज भारत के अनमोल धरोहर 'कोहिनूर' हीरा को लंदन ले चले गए थे। किंवदंती है कि कोहिनूर की जगह बदलने पर सैंकड़ो लोगों की मौत के साथ बड़ी तबाही होती है। शायद अंग्रेज कोहिनूर को अपने देश ले गए इसलिए उनपर आफत आई और इसका फायदा भारत और इस जैसे सैंकड़ों गुलाम देशों को हुआ।

    जानें कोहिनूर के बारे में
    प्राचीन भारत की शान कोहिनूर हीरे की खोज वर्तमान भारत के आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले में स्तिथ गोलकुंडा की खदानों में हुई थी। जहां से दरियाई नूर और नूर-उन-ऐन जैसे विश्व प्रसिद्ध हीरे भी निकले थे। यह हीरा खदान से कब बाहर आया इसकी कोई पुख्ता जानकारी इतिहास में नहीं है।

    कोहिनूर का अर्थ है रोशनी का पहाड़, लेकिन इस हीरे की चमक से कई सल्तनत के राजाओं का सूर्य अस्त हो गया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह हीरा अभिशप्त है और यह मान्यता अब से नहीं 13वीं शताब्दी से है। इस हीरे का प्रथम प्रमाणिक वर्णन बाबरनामा में मिलता है, जिसके अनुसार 1294 के आस-पास यह हीरा ग्वालियर के किसी राजा के पास था।

    हालांकि, तब इसका नाम कोहिनूर नहीं था। पर इस हीरे को पहचान 1306 में मिली, जब इसको पहनने वाले एक शख्स ने लिखा कि जो भी इंसान इस हीरे को पहनेगा वह इस संसार पर राज करेगा और इसके साथ उसका दुर्भाग्य शुरू हो जाएगा। तब उसकी बात को उसका वहम कह कर खारिज कर दिया गया, यदि हम तब से लेकर अब तक का इतिहास देखें तो कह सकते हैं कि यह बात काफी हद तक सही है।

    कोहिनूर ने नष्‍ट किए कई साम्राज्‍य
    कई साम्राज्यों ने इस हीरे को अपने पास रखा, लेकिन जिसने भी रखा वह कभी भी खुशहाल नहीं रह पाया। 14वीं शताब्दी की शुरुआत में यह हीरा काकतीय वंश के पास आया और इसी के साथ 1083 ई. से शासन कर रहे काकतीय वंश के बुरे दिन शुरू हो गए। 1323 में तुगलक शाह प्रथम से लड़ाई में हार के साथ काकतीय वंश समाप्त हो गया।

    काकतीय साम्राज्य के पतन के पश्चात यह हीरा 1325 से 1351 ई. तक मोहम्मद बिन तुगलक के पास रहा और 16वीं शताब्दी के मध्य तक यह विभिन्न मुगल सल्तनत के पास रहा और सभी का अंत इतना बुरा हुआ जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।

    शाहजहां ने इस कोहिनूर हीरे को अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया लेकिन उनका आलीशान और बहुचर्चित शासन उनके बेटे औरंगजेब के हाथ चला गया। उनकी पसंदीदा पत्नी मुमताज का इंतकाल हो गया और उनके बेटे ने उन्हें उनके अपने महल में ही नजरबंद कर दिया। 1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर आक्रमण कर दिया। इस तरह मुगल सल्तनत का पतन हो गया और नादिर शाह अपने साथ तख्ते ताउस और कोहिनूर हीरों को पर्शिया ले गया। उसने इस हीरे का नाम कोहिनूर रखा।

    1747 ई. में नादिरशाह की हत्या हो गई और कोहिनूर हीरा अफगानिस्तान शाहंशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंच गया और उनकी मौत के बाद उनके वंशज शाह शुजा दुर्रानी के पास पहुंचा। कुछ समय बाद मो. शाह ने शाह शुजा को अपदस्थ कर दिया। 1813 ई. में अफगानिस्तान के अपदस्त शाहंशाह शाह शूजा कोहीनूर हीरे के साथ भाग कर लाहौर पहुंचा।

    उसने कोहिनूर हीरे को पंजाब के राजा रंजीत सिंह को दिया और इसके एवज में राजा रंजीत सिंह ने शाह शूजा को अफगानिस्तान का राज-सिंहासन वापस दिलवाया। इस प्रकार कोहिनूर हीरा वापस भारत आया। लेकिन, कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। कोहिनूर हीरा आने के कुछ सालों बाद महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु हो जाती है और अंग्रेज सिख साम्राज्य को अपने अधीन कर लेते हैं। इसी के साथ यह हीरा ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा हो जाता है।

    कहा जाता है की खदान से निकला हीरा 793 कैरेट का था। अलबत्ता 1852 से पहले तक यह 186 कैरेट का था। पर जब यह ब्रिटेन पहुंचा तो महरी को यह पसंद नहीं आया इसलिए इसकी दुबारा कटिंग करवाई गई जिसके बाद यह 105.6 कैरेट का रह गया।

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