'खूब लड़ी मर्दानी वो तो...' शहीद ज्योति स्थापना के साथ ग्वालियर में शुरू हुआ वीरांगना लक्ष्मीबाई बलिदान मेला

18 जून 1858 में रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर में बलिदान दिया था.

Veerangana Laxmi Bai Balidan Mela in Gwalior: 163 साल पहले 18 जून को रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर किले पर अंग्रेजों से जमकर संघर्ष किया. दोनों हाथों में तलवार लेकर रानी ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा. किले से रानी अपने घोड़े सहित स्वर्ण रेखा नदी किनारे कूद गईं और शहीद हो गईं.

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ग्वालियर. वीरांगना लक्ष्मीबाई का आज बलिदान दिवस है. उनके सम्मान में हर साल ग्वालियर (Gwalior) में होने वाला वीरांगना बलिदान मेला गुरुवार से शुरू हुआ. वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की समाधि पर रानी की शहादत की 163 वी वर्षगांठ पर मेले का आयोजन कोविड गाइडलाइन के तहत हो रहा है. झांसी के किले से आई शहीद ज्योति को समाधि स्थल पर स्थापित किया गया. शुभारंभ के मौके पर शहर के 51 तिराहों-चौराहों पर शहीदों के नाम के दीप जलाए गए.

झांसी किले से चलकर "शहीद ज्योति" गुरुवार रात ग्वालियर पहुंची. पड़ाव चौराहे पर मेला के संस्थापक पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया, सांसद विवेक शेजवलकर सहित 20 लोगों ने शहीद ज्योति की अगवानी की. पड़ाव चौराहा से वीरांगना के वेश में घोड़े पर सवार युवतियों के साथ शहीद ज्योति बलिदान भूमि लक्ष्मीबाई समाधिस्थल पहुंची. समाधि स्थल पर लाकर शहीद ज्योति स्थापित की गई.

रोशनी से जगमग हुआ समाधि स्थल
रात 8 बजे से शहर के प्रमुख 51 चौराहों और तिराहों पर एक साथ रानी के चित्र के सामने शहीदों, क्रांतिकारियों के नाम 21 दीप जलाए गए. दीप जलाने के साथ ही राष्ट्रगीत गायन किया गया. जयभान सिंह पवैया ने कहा शहीद ज्योति आज रानी लक्ष्मीबाई की 1857 की क्रांति की याद दिलाती है. इस मौके पर वीरांगना लक्ष्मी बाई को नमन करने के लिए पर बड़ी संख्या में लोग समाधि स्थल पहुंचे.

ग्वालियर में सन् 1858 में हुई थी रानी लक्ष्मीबाई की शहादत
महारानी लक्ष्मीबाई की शहादत ग्वालियर में हुई थी. 18 जून को रानी लक्ष्मीबाई ने ग्वालियर किले पर अंग्रेजों से जमकर संघर्ष किया. दोनों हाथों में तलवार लेकर रानी ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा. किले से रानी अपने घोड़े सहित स्वर्ण रेखा नदी किनारे कूद गईं. घायल हालत में रानी गंगादास जी की शाला में पहुंचीं, जहां संतों ने रानी की देह को अंग्रेजों के हाथ नहीं लगने देने की इच्छा जताई. साधुओं ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी. 745 संत शहीद हो गए, लेकिन रानी लक्ष्मीबाई की देह का अंतिम संस्कार संतों ने ही किया. इसी जगह पर वीरांगना की समाधि है, जहां हर साल बलिदान मेला लगता है.

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