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सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रही है राजा बाक्षर की दरगाह, रुद्राभिषेक के साथ चढ़ती है चादर

ग्वालियर में भी राजा बाक्षर की दरगाह सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रही है.जहां हिंदू पूरे रीति रिवाज से उनकी पूजा ...अधिक पढ़ें

विजय राठौड़
ग्वालियर: किसी ने खूब ही कहा है कि ‘कहीं मंदिर कहीं मस्जिद की तख्ती लगा बैठे, बनाना था हमें एक घर मगर हम क्या बना बैठे, परिंदों में नहीं होती यह फिरकापरस्ती जाने क्यों, कभी मंदिर पर जा बैठे तो कभी मस्जिद पर जा बैठे’. जिस तरह परिंदों में मजहब के नाम पर कोई झगड़ा नहीं होता उसी तरह ग्वालियर में भी राजा बाक्षर की दरगाह सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश कर रही है. जहां हिंदू पूरे रीति रिवाज से उनकी पूजा करते हैं. तो वहीं मुस्लिम भी उनके सजदे में सिर झुकाते हैं. तो आइए जानते हैं, राजा बाक्षर की दरगाह के बारे में जिसे हिंदू राजा बाक्षर का मंदिर भी कहते हैं.

मंदिर के सेवादार संदीप शर्मा ने बताया कि इस दरगाह के बारे में बताया कि यह तकरीबन 300 साल पुरानी दरगाह है. जहां मुस्लिम इन्हें पीर मानते हैं. तो वहीं हिंदू इन्हें शिव भक्त कहते हैं. यही कारण है कि यहां दोनों ही तरीकों से बाबा की पूजा व इबादत की जाती है. ऐसा बताया जाता है कि लगभग 300 वर्ष पहले सिंधिया राजवंश के विशेष आग्रह पर बाबा को महाराष्ट्र से ग्वालियर लाया गया था.

महाराष्ट्र के सतारा में बाबा का प्रमुख स्थान है. जहां आज भी हिंदू मुस्लिम दोनों ही बाबा के दर पर अपने सिर को झुकाते हैं. बताया जाता है कि संत बाक्षर महाराज हिंदू थे. जोकि मूलत सतारा महाराष्ट्र के गांव खाते के रहने वाले थे. इतिहास में किसी मुस्लिम राजा ने उनके दर पर सिर को झुकाया और इबादत की, वो भी किसी विशेष प्रयोजन के लिए. जिसे बाबा के आशीर्वाद ने पूरा भी किया. तभी से बाबा के यहां चादर भी चढ़ाई जाती है और अभिषेक भी किया जाता है.

संदीप ने बताया कि होली के लगभग 10 दिन बाद बाबा का सालाना उर्स मनाया जाता है. जिसमें पूरे हिंदू रीति रिवाज के साथ शिव भक्त बाबा की पूजा की जाती है और मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार बाबा पर चादर चढ़ाई जाती है. इस दौरान 11 ब्राह्मणों द्वारा बाबा का अभिषेक कर उन्हें भोज कराया जाता है.

तो वहीं मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार बाबा को चादर चढ़ाई जाती हैं. कमाल की बात यह भी है कि यह दोनों ही कार्य एक साथ भी यहां पर होते नजर आते हैं. जहां बाबा की मजार पर चंदन से तिलक किया जाता है और फिर उस पर चादर भी चढ़ाई जाती है.

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