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इधर रेल पटरी-उधर नेशनल हाई-वे, ट्रैफिक वॉलिंटियर बनकर बच्चों को रास्ता पार कराते हैं टीचर

Praveen Singh Tanwar | News18 Madhya Pradesh
Updated: December 4, 2019, 1:51 PM IST
इधर रेल पटरी-उधर नेशनल हाई-वे, ट्रैफिक वॉलिंटियर बनकर बच्चों को रास्ता पार कराते हैं टीचर
हरदा में जान जोखिम में डालकर स्कूल आते हैं बच्चे

1971 में यह स्कूल (school) बना है तब से बच्चे इसी तरह स्कूल आते हैं. हमेशा दुर्घटना का भय बना रहता है. गांव में सरकारी ज़मीन (government school) नहीं है. दान की जमीन लेने का प्रयास किया था लेकिन वो मिली नहीं.

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हरदा.हरदा (harda) के एक गांव के नन्हे-मुन्ने बच्चे स्कूल (school) जाने के लिए रोज़ अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा रहे हैं. स्कूल जाने के लिए उन्हें रेल की पटरी (railway track) और नेशनल हाई-वे (national highway) पार करना पड़ता है. इसकी वजह ये है कि गांव में स्कूल नहीं है. बच्चों को पटरी और रोड पार कराने के लिए स्कूल के शिक्षक (teacher) रोज़ ट्रैफिक वॉलेंटियर का रोल निभाते हैं.

ट्रैफिक टीचर
हरदा ज़िले के मालोना गांव में रोज किसी फिल्म की शूटिंग की तरह सीन होता है. यहां छोटे-छोटे बच्चे सड़क के किनारे खड़े होते हैं. फिर उनके साथ आयी टीचर किसी ट्रैफिक पुलिस वाले की तरह दोनों तरफ से दौड़ रही गाड़ियों को रुकने का इशारा करती हैं. ट्रैफिक रुकता है और टीचर जल्दी से सारे बच्चों को सड़क पार कराती हैं. दरअसल ये नेशनल हाई-वे है जहां दिन रात भारी गाड़ियां अंधी रफ़्तार से भागती हैं.

नेशनल हाईवे के बाद रेलवे ट्रैक

बच्चों का सफर अभी जारी है. उसके बाद रेलवे ट्रैक है. बच्चों को अब रेल पटरी पार करना है. टीचर फिर से साथ होती हैं. वो पहले पटरी के दोनों ओर दायें-बायें देखती हैं. जब दूर तक दिख जाता है कि ट्रैक पर कोई ट्रेन नहीं है, तब वो बच्चों को रेल पटरी पार कराती हैं.

रोज का रिस्क
मालोना गांव के ये बच्चे स्कूल जाने के लिए रोज ये कसरत करते हैं. वजह ये है कि इस गांव में स्कूल नहीं है.स्कूल के लिए सरकारी ज़मीन नहीं है. इसलिए नेशनल हाईवे-59 और पटरी के दूसरी ओर प्राइमरी स्कूल बनाया गया है. इस स्कूल में 95 बच्चे फिलहाल पढ़ रहे हैं. ये बच्चे रोज सुबह अपने पापा-मम्मी के साथ रेल पटरी तक आते हैं. फिर दूसरी ओर खड़े शिक्षक सभी बच्चों को स्कूल तक लेकर आते हैं. हालांकि यह दूरी ज्यादा नहीं करीब 300 मीटर की है. यह क्रम रोज और वर्षो से चल रहा है. शिक्षकों और अभिभावकों दोनों को डर लगा रहता है कि कभी चूक होने पर कोई हादसा ना हो जाए.
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पंचायत ने प्रस्ताव भेजा
चारखेड़ा के सरपंच रमेश टेकाम का कहना है 1971 में यह स्कूल बना है तब से बच्चे इसी तरह स्कूल आते हैं. हमेशा दुर्घटना का भय बना रहता है. गांव में सरकारी ज़मीन नहीं है. दान की जमीन लेने का प्रयास किया था लेकिन वो मिली नहीं.गांव में रेलवे विभाग ने अंडर ब्रिज बनवाया था.लेकिन दूरी ज्यादा और हमेशा पानी भरा होने के कारण लोग इसका कम ही उपयोग करते हैं. अब पंचायत ने शासन को प्रस्ताव भेजा है कि स्कूल पटरी पार कर गांव में बनाया जाए.यही स्थिति हायर सेकेंड्री छात्राओं की भी है. उन्हें भी रोज पढ़ाई के लिए चारखेड़ा उच्चतर माध्यमिक शाला जाना पड़ता है. रास्ता इनका भी यही है. पहले रेल पटरी और फिर नेशनल हाई-वे.

क्या कहते है जि़म्मेदार अधिकारी
शिक्षा विभाग के ज़िला स्त्रोत समन्वयक (डीपीसी ) डॉ आर एस तिवारी का कहना है कि प्रशासन इस बात से वाकिफ है. बच्चों और अभिभावकों की चिंता को समझते हुए कोशिश की जा रही है कि शाला भवन यहीं गांव में बनाया जाए.

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First published: December 4, 2019, 1:51 PM IST
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