…तो 1 अरब आबादी को नहीं मिलेगा पानी, जानिए IIT के प्रोफेसर की रिसर्च और कितना डराती है

आईआईटी इंदौर के शोध के मुताबिक हमे पहाड़ों को किसी भी कीमत पर बचाना होगा. ये नहीं बचेंगे तो इंसान का बचना भी मुश्किल है. (सांकेतिक तस्वीर)

IIT इंदौर के असिस्टेंट प्रोफेसर की रिपोर्ट डराती है. उनका कहना है कि पहाडों को बचाना होगा. अगर पहाड़ों को नुकसान पहुंचाते रहे तो इंसानों को भी नुकसान होगा. हिमालय के ग्लेशियर न पिघलने से बहुत नुकसान होगा.

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इंदौर. ‘जलवायु परिवर्तन के कारण पर्वतों की बर्फ अधिक तेज़ी से पिघल रही है. हिमनद सिकुड़ रहे हैं और हिमालय-काराकोरम पर्वत श्रृंखलाओं में बार-बार खतरे पैदा हो रहे हैं. अगर हिमालय के ग्लेशियर पिघलना बंद हुए तो एक अरब आबादी को पानी मिलना बंद हो जाएगा.’ यह बात भारतीय प्रौद्योगिक संस्थान (IIT) के शोध में निकलकर आई.

IIT के असिस्टेंट प्रोफेसर फारूक आजम का शोध साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ. वे एक दशक से ज्यादा समय से हिमालय के ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की जांच कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि "हिमालय-काराकोरम के ग्लेशियो-हाइड्रोलॉजी" के नए शोध के अनुसार, ग्लेशियरों पर पड़ने वाले ये प्रभाव पड़ोसी देशों की जल आपूर्ति को बदल रहे हैं, जो इन पर्वत श्रृंखलाओं में नदियों पर निर्भर हैं.

इस वजह से पड़ेगा असर

प्रोफेसर फारूक आजम ने बताया कि एक अरब से अधिक लोग अपना पानी हिमालय और काराकोरम पहाड़ों में पिघलने वाले ग्लेशियरों से प्राप्त करते हैं. जब इस शताब्दी में ग्लेशियर का अधिकांश भाग पिघल जाएगा और पानी की आपूर्ति बंद कर देगा, तो इतनी बड़ी आबादी को पानी नहीं मिलेगा. ग्लेशियर के पिघलते पानी और ग्लेशियरों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव सिंधु बेसिन में महत्वपूर्ण हैं.

250 से ज्यादा रिसर्च के परिणाम शामिल

बता दें, शोध दल ने अधिक सटीक समझ पर पहुंचने के लिए 250 से अधिक विद्वानों के शोध पत्रों के परिणामों को इकट्ठा किया. ‘जलवायु, वार्मिंग, वर्षा परिवर्तन और ग्लेशियर संकोचन के बीच संबंधों के बारे में आम सहमति के करीब’- पेपर के सह-लेखक, प्लैनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट, यूएसए के जेफ कारगेल ने कहा कि इस अध्ययन ने समूह को जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक ज्ञान में अंतर की पहचान करने और उसे दूर करने में भी मदद की. बड़ी तस्वीर की बेहतर समझ हमें परिप्रेक्ष्य देती है, और हमें उन क्षेत्रों को पहचानने और लक्षित करने की अनुमति देती है जहां आगे के क्षेत्र, रिमोट सेंसिंग और मॉडलिंग अनुसंधान की आवश्यकता है.

जलवायु विविधता में पहाड़ों की भूमिका

उत्तरी ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर और अध्ययन के सह-लेखक डॉ. जोसेफ शी ने कहा कि जलवायु में विविधताओं को निर्धारित करने में पहाड़ों की भूमिका है. इस क्षेत्र की मुख्य पर्वत श्रृंखलाएं कार्य करती हैं. मानसून और सर्दियों के तूफानों द्वारा ले जाने वाली नमी को नियंत्रित करती हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी इंदौर में पीएचडी की छात्रा और पेपर की सह-लेखक स्मृति श्रीवास्तव नें भी विचार प्रकट किए.

चमोली आपदा पर भी स्टडी

डॉ. आज़म ने एक अन्य शोध लेख के सह-लेखक के रूप में भी योगदान दिया. इसमें 7 फरवरी को चमोली जिले में हुई प्राकृतिक आपदा का अध्ययन किया गया. कैलगरी विश्वविद्यालय में डैन शुगर ने उत्तराखंड आपदा के कारण को निर्धारित करने के लिए उच्च-रिज़ॉल्यूशन उपग्रह इमेजरी का उपयोग किया. डॉ. आज़म ने कहा कि जलवायु परिवर्तन हिमालय-काराकोरम पर्वतमाला में नदी के प्रवाह को बदल रहा है. यह पर्वतीय खतरे पैदा कर रहा है. चमोली आपदा इस बात का प्रमाण है कि हिमालय के नाजुक पहाड़ों में विकास की गतिविधियां न की जाएं.

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