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जॉनी वाकर: कंडक्‍टर की JOB से घूमी मुंबई, नौकरी करने का अंदाज था निराला

जॉनी वाकर: कंडक्‍टर की JOB से घूमी मुंबई, नौकरी करने का अंदाज था निराला

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी यानि जॉनी वाकर की आज पुण्यतिथि हैं. ताउम्र दर्शकों को हंसाते रहे जॉनी वाकर 29 जुलाई, 2003 को सबको रोता छोड़ गए. 50 और 60 के दशक में हिंदी फिल्मों में कई यादगार भूमिका करने वाले जॉनी वाकर का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था. ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां' जैसे गीतों को सदा के लिए अमर करने वाले जानी वाकर अपने मासूम, लेकिन शरारती चेहरे से सबको अपनी ओर खींचने का माद्दा रखते थे. उनकी पुण्यतिथि पर जानते है बॉलीवुड के इस सुपर स्टार की जिंदगी से जुड़ी खास बातें.

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी यानि जॉनी वाकर की आज पुण्यतिथि हैं. ताउम्र दर्शकों को हंसाते रहे जॉनी वाकर 29 जुलाई, 2003 को सबको रोता छोड़ गए. 50 और 60 के दशक में हिंदी फिल्मों में कई यादगार भूमिका करने वाले जॉनी वाकर का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था. ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां' जैसे गीतों को सदा के लिए अमर करने वाले जानी वाकर अपने मासूम, लेकिन शरारती चेहरे से सबको अपनी ओर खींचने का माद्दा रखते थे. उनकी पुण्यतिथि पर जानते है बॉलीवुड के इस सुपर स्टार की जिंदगी से जुड़ी खास बातें.

बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी यानि जॉनी वाकर की आज पुण्यतिथि हैं. ताउम्र दर्शकों को हंसाते रहे जॉनी वाकर 29 जुलाई, 2003 को सबको रोता छोड़ गए. 50 और 60 के दशक में हिंदी फिल्मों में कई यादगार भूमिका करने वाले जॉनी वाकर का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था. ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां' जैसे गीतों को सदा के लिए अमर करने वाले जानी वाकर अपने मासूम, लेकिन शरारती चेहरे से सबको अपनी ओर खींचने का माद्दा रखते थे. उनकी पुण्यतिथि पर जानते है बॉलीवुड के इस सुपर स्टार की जिंदगी से जुड़ी खास बातें.

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    बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी यानि जॉनी वाकर की आज पुण्यतिथि हैं. ताउम्र दर्शकों को हंसाते रहे जॉनी वाकर 29 जुलाई, 2003 को सबको रोता छोड़ गए. 50 और 60 के दशक में हिंदी फिल्मों में कई यादगार भूमिका करने वाले जॉनी वाकर का जन्म मध्यप्रदेश के इंदौर में हुआ था. ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां' जैसे गीतों को सदा के लिए अमर करने वाले जानी वाकर अपने मासूम, लेकिन शरारती चेहरे से सबको अपनी ओर खींचने का माद्दा रखते थे. उनकी पुण्यतिथि पर जानते है बॉलीवुड के इस सुपर स्टार की जिंदगी से जुड़ी खास बातें.

    1. मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में 11 नवंबर, 1920 एक मध्यमवर्गीय मुस्लिम परिवार मे जन्में जॉनी वाकर का असली नाम बदरूदीन जमालुदीन काजी था. वे बचपन से ही अभिनेता बनने का ख्वाब देखा करते थे.

    2. जॉनी वाकर के पिता इंदौर में एक मिल में नौकरी करते थे. मिल बंद होने के बाद 1942 में पूरा परिवार मुंबई पहुंच गया. पिता के लिए अपने 15 सदस्यीय परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो रहा था. मुश्किल हालात में 10 भाई-बहनों में दूसरे नंबर के जॉनी वाकर पर परिवार की जवाबदारी आ गई.

    3. कई नौकरी में हाथ आजमाने के बाद आखिर में मुंबई मे उनके पिता के एक जानने वाले पुलिस इंस्पेक्टर की सिफारिश पर जॉनी वाकर को बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई.

    4. इस नौकरी को पाकर जॉनी वाकर काफी खुश हो गए क्योंकि उन्हें मुफ्त में ही पूरी मुंबई घूमने को मौका मिल जाया करता था इसके साथ ही उन्हें मुंबई के स्टूडियों में भी जाने का मौका मिल जाया करता था.

    5. जॉनी वॉकर का बस कंडक्टरी करने का अंदाज काफी निराला था. वह अपने विशेष अंदाज मे आवाज लगाते 'माहिम वाले पेसेन्जर उतरने को रेडी हो जाओ लेडिज लोग पहले.'

    6. इसी दौरान जॉनी वाकर की मुलाकात फिल्म जगत के मशहूर खलनायक एन.ए.अंसारी और के आसिफ के सचिव रफीक से हुई. लंबे संघर्ष के बाद जॉनी वाकर को फिल्म 'आखिरी पैमाने' में एक छोटा सा रोल मिला.

    7. उन्हें जल्द ही फिल्मों में भीड़ वाले सीन में खड़े होने का मौका मिल गया. जिसके लिए उन्हें 5 रुपए मिला करते थे. पहली इस फिल्म मे उन्हें पारश्रमिक के तौर पर 80 रूपए मिले जबकि बतौर बस कंडकटर उन्हें पूरे महीने के मात्र 26 रूपये हीं मिला करते थे.

    8. उसी समय अभिनेता बलराज साहनी की नजर जॉनी वाकर पर पड़ी, उन्होंने गुरूदत्त से मिलने की सलाह दी. जॉनी वाकर ने गुरूदत्त के सामने शराबी की एक्टिंग की थी. उसे देख गुरूदत्त को लगा कि वाकई में वह शराब पीए हुए है, इससे वह काफी नाराज भी हुए. उन्हें जब असलियत पता चली तो उन्होंने जॉनी को गले लगा लिया.

    9.गुरूदत्त ने जॉनी वाकर की प्रतिभा से खुश होकर अपनी फिल्म बाजी में काम करने का अवसर दिया. इसके बाद उन्होंने मुड़कर पीछे नहीं देखा.

    10. कहा जाता है कि उन्हें 'जॉनी वाकर' नाम देने वाले गुरु दत्त ही थे. उन्होंने वाकर को यह नाम एक लोकप्रिय व्हिस्की ब्रांड के नाम पर दिया था. हालांकि, फिल्मों में अक्सर शराबी की भूमिका में नजर आने वाले वाकर असल जिंदगी में शराब को कतई हाथ नहीं लगाते थे.

    11. जॉनी वाकर ने गुरूदत्त की कई फिल्मों मे काम किया जिनमें आर पार, मिस्टर एंड मिसेज 55, प्यासा, चौदहवी का चांद, कागज के फूल जैसी सुपर हिट फिल्में शामिल हैं.

    12. गुरूदत्त की फिल्मों के अलावा जॉनी वाकर ने टैक्सी ड्राइवर, देवदास, नया अंदाज, चोरी चोरी, मधुमति, मुगल-ए-आजम, मेरे महबूब, बहू बेगम, मेरे हजूर जैसी कई सुपरहिट फिल्मों मे अपने हास्य अभिनय से दर्शको का भरपूर मनोरंजन किया.

    13. जॉनी वाकर की हर फिल्म मे एक या दो गीत उन पर अवश्य फिल्माए जाते थे जो काफी लोकप्रिय भी हुआ करते थे. वर्ष 1956 मे प्रदर्शित गुरूदत्त की फिल्म सीआईडी में उन पर फिल्माया गाना ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हट के जरा बच के ये है बंबई मेरी जान ने धूम मचा दी.

    14. इसके बाद हर फिल्म में जॉनी वाकर पर गीत अवश्य फिल्माए जाते रहे. यहां तक कि फाइनेंसर और डिस्ट्रीब्यूटर की यह शर्त रहती कि फिल्म में जॉनी वाकर पर एक गाना अवश्य होना चाहिए.

    15. जॉनी वाकर ने अपने चेहरे के हाव-भाव की बदौलत ही 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी' (मिस्टर एंड मिसेज 55), 'सिर जो तेरा चकराए या दिल डूबा जाए' (प्यासा) और 'ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां' जैसे गीतों को सदा के लिए अमर कर दिया.

    16. फिल्म मधुमति तथा शिकार के लिए उन्हें दो बार फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया. 70 के दशक में जॉनी वाकर ने फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि फिल्मों में कॉमेडी का स्तर काफी गिर गया है.

    17. इसी दौरान ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म आनंद मे जॉनी वाकर ने एक छोटी सी भूमिका निभाई. इस फिल्म के एक दृश्य मे वह राजेश खन्ना को जीवन का एक ऐसा दर्शन कराते है कि दर्शक अचानक हंसते हंसते संजीदा हो जाता है.

    18. गुलजार और कमल हसन के बहुत जोर देने पर वर्ष 1998 मे प्रदर्शित फिल्म चाची 420 मे उन्होंने एक छोटा सा रोल निभाया जो दर्शको को काफी पसंद आया.

    19. जॉनी वाकर ने परिवार की इच्छा के विरुद्ध नूरजहां से शादी की. दोनों की मुलाकात 1955 में फिल्म 'आरपार' के सेट पर हुई थी, जिसका एक गीत नूर और वाकर पर फिल्माया जाना था. इस गीत के बोल थे 'अरे ना ना ना ना तौबा तौबा.'

    20. जॉनी वाकर महज छठी कक्षा तक पढ़ाई कर पाए थे. उन्होंने इस कसक को दूर करने के लिए अपने बेटे और बेटियों को अच्छी तालीम दी. एक बेटे को तो उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भी भेजा.

    21. ताउम्र दर्शकों को हंसाते रहे वाकर 29 जुलाई, 2003 को सबको रोता छोड़ गए. उनके निधन पर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने शोक जताते हुए कहा था, "जॉनी वाकर की त्रुटिहीन शैली ने भारतीय सिनेमा में हास्य शैली को एक नया अर्थ दिया है.

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