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Kargil Vijay Diwas : पढ़िए एक कर्नल की दास्तान, जब गर्मी में तोप छूने से हाथ जल जाते थे...

Kargil vijay diwas - कर्नल निखिल दीवानजी भारतीय इतिहास के पहले स्काय मार्शल हैं.

Kargil Vijay Diwas : कर्नल निखिल दीवानजी बताते हैं कि किसी भी पल कुछ भी हो सकता था. सेना हर पल अलर्ट थी. भयंकर गर्मी में हथियार और तोपें गर्म हो जाती थीं. उन्हें छूने पर हाथ जल जाते थे. ऐसे में ग्लब्ज पहनकर उन्हें चलाना पड़ता था. सेना रेत में 10 से 12 फिट नीचे बंकर बनाकर रहती थी.

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इंदौर.आज करगिल विजय दिवस (Kargil Vijay Diwas ) है. भारत का इतिहास वीर जांबाज़ों की शौर्य गाथाओं से आबाद है. इनके त्याग की वजह से ही तिरंगा शान से लहरा रहा है. ऐसे ही जांबाजों में से एक हैं इंदौर के कर्नल (रिटा.) निखिल दीवानजी. हालांकि वो उस दौरान करगिल से बहुत दूर राजस्थान सीमा पर तैनात थे, लेकिन तनाव वहां भी था और सेना अलर्ट थी. मोर्चे पर डटी सेना के वो  कैसे बीते दिन और रात ये कर्नल दीवानजी बता रहे हैं.

भारत और पाकिस्तान के बीच करीब 60 दिन तक चला करगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 को खत्म हुआ. उसमें हमारे वीर जवानों ने पाकिस्तान को नाकों चने चबवा दिए. इस युद्ध में कई रणबांकुरों ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहूति दे दी. इस युद्ध में इंदौर के कर्नल निखिल दीवानजी भी शामिल हुए थे. उनके जहन में उस युद्ध की यादें आज भी ताजा हैं कि कैसे भारत के जांबाज सैनिकों ने पाकिस्तानी सेना को धूल चटा दी थी.

6 साल की उम्र में सेना में जाने का संकल्प
निखिल दीवानजी ऐसे फौजी हैं रहे हैं जिन्होंने महज 6 साल की उम्र में ही आर्मी में जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया था. सन 1971 में जब देश के वीर जवान पाकिस्तान से जंग लड़ रहे थे, उस समय इंदौर में जन्मे निखिल दीवानजी की उम्र महज 6 साल की थी. घर में दिन रात युद्ध की खबरें सुनते और देश की ऐतिहासिक जीत ने उनके बालमन पर ऐसा असर डाला कि उन्होंने सेना में जाने का मन बना लिया और जनवरी 1984 में इन्होंने इंडियन मिलिट्री अकादमी ज्वॉइन कर ली. 21 साल की उम्र में सेकेंड लेफ्टिनेंट बने और उसके बाद 24 साल तक देश सेवा करने के बाद कर्नल के पद से रिटायर हुए.

आग बरसाती गर्मी में 3 दिन में एक बार स्नान
निखिल दीवानजी बताते हैं कि जब कारगिल वॉर चल रहा था, तब वे राजस्थान बार्डर पर तैनात थे. युद्ध भले ही दूर जारी था लेकिन तनाव तो राजस्थान से लगी भारत-पाकिस्तान की इस सीमा पर भी था. किसी भी पल कुछ भी हो सकता था. सेना हर पल अलर्ट थी. भयंकर गर्मी में हथियार और तोपें गर्म हो जाती थीं. उन्हें छूने पर हाथ जल जाते थे. ऐसे में ग्लब्ज पहनकर उन्हें चलाना पड़ता था. सेना रेत में 10 से 12 फिट नीचे बंकर बनाकर रहते थे. उन्होंने अपने बल के साथ पाकिस्तान की एक पोस्ट पर हमला कर उसे नेस्तनाबूत कर दिया था. वे बताते हैं कि रेगिस्तान में पानी की कमी रहती है, इसलिए सेना के लिए पीने का पानी दो सौ किलोमीटर दूर से आता था. पानी बचाने के लिए ऐसी भीषण गर्मी में भी 3-4 दिन में एक बार ही नहाने का मौका मिलता था. खाने के लिए सब्जी पूड़ी लेकर निकलते थे. लेकिन सब्जी दो घंटे में खराब हो जाती थी. इसलिए पूड़ियों को तीन चार दिन तक सुखाकर वे चाय और पानी से खाकर अपना पेट भरते थे. उसके बावजूद देश के लिए लड़ने का जज्बा कम नहीं होता था. मन में बस एक ही विश्वास रहता था कि विषम परिस्थितियों से जूझते हुए भारत को जीत दिलाना है. हर सैनिक के इसी जज्बे से भारत जीता भी, क्योंकि रूस से मंगाए गए हथियार ठंडे प्रदेशों के लिए बनाए गए थे,ऐसे में भयंकर गर्मी में उनको चलाना मुश्किल था

संदेसे आते थे...
युद्ध के दौरान अपने परिवार के बारे में बताते हुए कर्नल निखिल दीवानजी कहते हैं कि उस बॉर्डर पर फोन चलते नहीं थे. इसलिए सिर्फ चिट्ठियों का ही सहारा रहता था. घर से चिट्ठियां आतीं थीं और हम लोग भी चिट्ठियों में सब अच्छा है. सभी लोग अच्छे से रह रहे हैं, किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं है, सब कुशल मंगल है, ये सब लिखकर घर वालों को भेजते थे. क्योंकि यदि असलियत लिख देते तो घर वाले परेशान हो उठते.  इसलिए घरवालों को खुश रखने के लिए झूठ का सहारा लेते थे. वो कहते हैं क्योंकि डिफेंस की लाइफ बहुत कठिन है. देश के लिए बॉर्डर पर लड़ना मानो ऐसा लगता है कि आपका जीवन सफल हो गया. कर्नल निखिल कहते हैं कि देश में हर घर से एक बच्चे को सेना में अवश्य होना चाहिए. ये देशभक्ति के लिए भी जरूरी है. लेकिन मध्यप्रदेश में बहुत कम लोग डिफेंस में जाते हैं, जबकि पंजाब जैसे छोटे राज्य से डिफेंस में जाने वालों की तदाद बहुत अधिक है.

देश के पहले स्काय मार्शल
जनवरी 1984 में कर्नल निखिल दीवानजी ने आर्मी ज्वाइन कर इंडियन मिलिट्री अकादमी देहरादून में डेढ़ साल की ट्रेनिंग पूरी की थी और 14 जून 1986 को 21 साल की उम्र में सेकेंड लेफ्टिनेंट बने. रैंक से नवाजा गया. इनकी पहली पोस्टिंग हरियाणा के हिसार में हुई और वे ऑपरेशन्स के लिए डिप्लाय हो गए. नेशनल सिक्योरिटी गार्ड में उनका सिलेक्शन ब्लैक कैट कमांडो के रूप में हुआ और 13 अप्रैल 1993 को उन्होंने पहले काउंटर हाईजेक ऑपरेशन में अहम रोल निभाया. वे भारतीय इतिहास के पहले स्काय मार्शल हैं. रिटायर होने के बाद निखिल दीवानजी देश की रक्षा के लिए युवाओं को तराशने का काम कर रहे हैं. इसके लिए वे नौजवानों में देशभक्ति के जज्बे के साथ देश की रक्षा करने की भावना भर रहे हैं इसके लिए वो अपनी एक अकादमी भी चला रहे हैं.

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