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इंदिरा-वाजपेयी के करीबी थे दिलीप सिंह भूरिया, दिग्विजय से बगावत और मोदी ने दिलाया टिकट

रतलाम से भाजपा सांसद दिलीप सिंह भूरिया का बुधवार को निधन हो गया. आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे पर दिग्विजय सिंह से मतभेद के बाद भूरिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था. 2014 में भाजपा के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर वह संसद पहुंचे थे. उन्होंने दो बार कांग्रेस छोड़ी थी और एक बार भाजपा छोड़कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी हाथ थामा था.

रतलाम से भाजपा सांसद दिलीप सिंह भूरिया का बुधवार को निधन हो गया. आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे पर दिग्विजय सिंह से मतभेद के बाद भूरिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था. 2014 में भाजपा के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर वह संसद पहुंचे थे. उन्होंने दो बार कांग्रेस छोड़ी थी और एक बार भाजपा छोड़कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी हाथ थामा था.

रतलाम से भाजपा सांसद दिलीप सिंह भूरिया का बुधवार को निधन हो गया. आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे पर दिग्विजय सिंह से मतभेद के बाद भूरिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था. 2014 में भाजपा के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर वह संसद पहुंचे थे. उन्होंने दो बार कांग्रेस छोड़ी थी और एक बार भाजपा छोड़कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी हाथ थामा था.

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रतलाम से भाजपा सांसद दिलीप सिंह भूरिया का बुधवार को निधन हो गया. आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे पर दिग्विजय सिंह से मतभेद के बाद भूरिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था. 2014 में भाजपा के टिकट पर पहली बार चुनाव जीतकर वह संसद पहुंचे थे. उन्होंने दो बार कांग्रेस छोड़ी थी और एक बार भाजपा छोड़कर गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का भी हाथ थामा था.

इंदिरा गांधी के करीबी

दिलीप सिंह भूरिया की ताकत और क्षमता को सबसे पहले इंदिरा गांधी ने पहचाना था. वे इंदिरा गांधी के करीबी रहे थे. इंदिरा गांधी ने ही उन्हें लोकसभा में सचेतक बनाया था. नरसिम्हाराव की सरकार में भी वह प्रदेश की पटवा सरकार के लिए सिरदर्द साबित हुए थे. उनके उठाए मुद्दे से पटवा सरकार कई बार परेशानियों में घिर गई थी.

अटलजी की थी विशेष कृपा

झाबुआ अंचल आजादी के बाद से ही कांग्रेस का मजबूत गढ़ रहा है. 1998 में यहां भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने के बाद दिलीप सिंह भूरिया को हार झेलनी पड़ी थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें राष्ट्रीय अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया था. अध्यक्ष के नाते उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा हासिल था. अटलजी के कार्यकाल में पैसा कानून जो आदिवासियो को सुरक्षा प्रदान करता है उसे बनाने का श्रेय भूरिया को ही जाता है.

मोदी की वजह से मिला टिकट

कांग्रेस के बेहद मजबूत गढ़ माने जाने वाले आदिवसी अंचल झाबुआ में दिलीप सिंह भूरिया ने पहली लोकसभा चुनाव में कमल खिलाया. हालांकि, पार्टी का एक तबका उनकी जगह बेटी निर्मला भूरिया को टिकट देना चाहता था. काफी हद तक निर्मला का टिकट तय भी हो गया था, लेकिन मोदी ने ऐन मौके पर हस्तक्षेप कर दिलीप सिंह भूरिया के टिकट पर अपनी मुहर लगा दी थी.

दिग्विजय सिंह से आदिवासी मुख्यमंत्री पर विवाद

दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते हुए दिलीप सिंह भूरिया ने आदिवासी मुख्यमंत्री का मुद्दा उठाया था. इस दौरान उन्हें अजीत जोगी का भी साथ मिल गया था. दोनों ने इस मुहिम को काफी जोर-शोर से चलाया था. मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह से आदिवासी मुख्यमंत्री के मुद्दे पर मतभेद होने की वजह से भूरिया ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए. कांग्रेस की राजनीति में माना जाता है कि आदिवासी मुख्यमंत्री का मुद्दा उठाने के बाद दिग्विजय सिंह ने उन्हें दरकिनार करना शुरू कर दिया था. दिग्विजय सिंह ने ही कांग्रेस के मजबूत गढ़ में कांतिलाल भूरिया को आगे बढ़ाना शुरू किया और अंततः दिलीप सिंह भूरिया को पार्टी छोड़नी पड़ी.

जोगी के खिलाफ भी जांच की सिफारिश

दिलीप सिंह भूरिया ने जोगी के साथ बगावत की थी और फिर भाजपा में शामिल हो गए थे. मध्यप्रदेश का विभाजन हो गया और जोगी के 2001 में मरवाही विधानसभा से चुनाव लड़ने के साथ ही यह विवाद खड़ा हो गया था कि जोगी आदिवासी हैं या नहीं. मरवाही आदिवासियों के लिये सुरक्षित सीट रही है. एक राजनीतिक कार्यकर्ता संत कुमार नेताम ने राष्ट्रीय आदिवासी आयोग से शिकायत की थी. तब आयोग के अध्यक्ष दिलीप सिंह भूरिया ने सरकार से जांच का अनुरोध किया था.

तेंदूपत्ता नीति बनाने में अहम रोल

मोतीलाल वोरा के सीएम रहते दिलीपसिंह भूरिया के नेतृत्व मे तेंदूपत्ता नीति बनाने के लिए भूरिया कमेटी बनाई गई थी जिसकी अनुशंसा पर मध्य प्रदेश की तेंदूपत्ता नीति बनकर लागू हुई थी.

बोफोर्स जांच समिति में भी शामिल

दिलीपसिंह भूरिया अखिल भारतीय सहकारी संघ के अध्यक्ष भी थे ओर बोफोर्स घोटाले की प्रारंभिक जांच के लिए बनी संसदीय कमेटी के भी वे सदस्य थे. वे कई संसदीय समितियों के सदस्य भी रहे ओर हाल ही में भूमि अधिग्रहण बिल पर उन्होंने कांग्रेस को संसद मे करारा जवाब भी देकर सुर्खियां बटोरी थी.

एक बेबाक राजनेता थे भूरिया

दिलीपसिंह भूरिया एक बेबाक, ईमानदार, सरल, सहज नेता माने जाते थे. उनका राजनीतिक जीवन बेदाग रहा. वह बड़े से बड़े नेता के सामने अपनी बात बेबाकी से रखने में घबराते नहीं थे. विगत एक साल में वे NH-79 को लेकर परिवहन मंत्री नितिन गडकरी की शिकायत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कर चुके थे. मध्यप्रदेश सरकार पर आदिवासियों को बदनाम कर शराब ठेकों के जरिए करो़ड़ों रुपये कमाने का आरोप लगा चुके थे. साथ ही पीएम से हस्तक्षेप करने की मांग भी कर चुके थे, जिसके बाद शिवराज सरकार की किरकिरी भी हुई थी.

छह बार सांसद

भूरिया का जन्म 19 जून 1944 को हुआ था और वह सबसे पहले 1972 में कांग्रेस टिकट पर पेटलावद सीट से विधायक चुने गए थे. लोकसभा के लिए वह पहली बार 1980 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में निर्वाचित हुए. वह झाबुआ से 1996 तक लगातार पांच बार चुने जाते रहे.
भाजपा ने 1998 के संसदीय चुनाव में भूरिया को झाबुआ सीट से टिकट दिया लेकिन वह कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया से चुनाव हार गए. लेकिन 2014 का चुनाव जीतकर वह एक बार फिर संसद पहुंचे थे.

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