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गुमनामी के अंधेरे में संगीत की दुनिया का 'प्रभात', कभी ये इंदौर की हर महफिल की शान थे

चटर्जी ग्रुप की लोकप्रियता का आलम ये था कि प्रभात दा को शहर में सेलिब्रिटी स्टेटस हासिल था.
चटर्जी ग्रुप की लोकप्रियता का आलम ये था कि प्रभात दा को शहर में सेलिब्रिटी स्टेटस हासिल था.

1970 में कब चटर्जी ब्रदर्स ऑर्केस्ट्रा बन गया,ये संस्था के मुखिया प्रभात दा (Chatterjee) को भी मालूम नहीं पड़ा. चटर्जी ब्रदर्स ने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह (Arjun singh) के पारिवारिक कार्यक्रम में पहला प्रोफेशनल म्यूज़िक प्रोग्राम 500 रुपए में पेश किया था.

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इंदौर.कहते हैं जिसके आने से महफिलें रौशन हो जाया करती थीं अकॉर्डियन पर उंगुलियां चलते ही राह चलते लोग रुक जाया करते थे. वही कलाकार प्रभात चटर्जी आज दो जून की रोटी के लिए मोहताज हैं. इंदौर शहर के पहले आर्केस्ट्रा (orchestra master) चटर्जी ग्रुप के संस्थापक प्रभात चटर्जी (Prabhat Chatterjee). एक समय चटर्जी नाइट्स के जरिये पूरे देश में धूम मचाने वाले 76 साल के प्रभात चटर्जी गुमनामी का जीवन गुजार रहे थे. लेकिन अब सरकार ने उनकी सुध ली है. और उनका जीवन संवारने का बीड़ा उठाया है.

साल 1975 से तीन दशकों से भी ज्यादा समय तक इंदौर के जिस ग्रुप ने बेहिसाब मंचीय प्रस्तुतियां दीं.कई कलाकारों को ऊंचा मुकाम दिलाया,आज वही फनकार शरीर और मन से टूट चुका है.कलाकारों और कला के कद्रदानों से भरे इस शहर में एक हुनरमंद आज उस हाल में पहुंच गया था जहां से उसे अब आशा की किरण कम और मतलबी संसार की रौशनी ज्यादा चुभ रही थी. अपनों ने ही उसे बेघर कर दिया. जिन्हें उसने कामयाबी के शिखर पर पहुंचाया,उन्होंने भी खबर नहीं ली.बंगाली चौराहे के पास तंग बस्ती के एक अंधेरे कमरे में अकेले दिन गुजार रहे प्रभात चटर्जी की सुध अब सरकार ने ली है.

कलेक्टर की संवेदनशीलता
कलेक्टर मनीष सिंह को जब एकॉर्डियन प्लेयर प्रभात चटर्जी के दुख भरे जीवन की जानकारी मिली तो उन्होंने संवेदनशीलता दिखाते हुए तत्काल सामाजिक न्याय विभाग के अधिकारियों को प्रभात चटर्जी के घर भेजा.अधिकारियों न केवल उनके रहने की व्यवस्था की बल्कि उनके खाने पीने का इंतजाम भी कर दिया है. प्रशासन उन्हें सभी सुविधाएं मुहैय्या कराएगा जिससे वे बेहतर जीवन जी सकें.



गुरबत के दिन
बढ़ी हुई दाढ़ी, कपड़ों से आती दुर्गंध लिए प्रभात चटर्जी अपने घर के पास हमेशा एक पत्थर पर बैठे दिखाई देते हैं. वो कहते हैं कि एक कलाकार अपनी कला का गुलाम होता है. वो कभी अपने बारे में नहीं सोचता. शायद मेरे साथ भी यही हुआ. सबने मुझे अकेला छोड़ दिया. दिन में एक बार छोटा भाई खाना दे जाता है,एक-दो लोग कभी-कभी आ जाते हैं और मेरी उनसे यही गुजारिश रहती है कि यहां से मुझे कहीं दूर ले जाएं.

बस इतना का ख्वाब है
इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़े प्रभात चटर्जी को गाने का शौक और कुछ वाद्यों को बजाने का हुनर था.उनके तीन छोटे भाई भी वादन में दखल रखते थे.1970 में कब चटर्जी ब्रदर्स ऑर्केस्ट्रा बन गया,ये संस्था के मुखिया प्रभात दा को भी मालूम नहीं पड़ा. चटर्जी ब्रदर्स ने प्रदेश के तत्कालीन मंत्री अर्जुन सिंह के पारिवारिक कार्यक्रम में पहला प्रोफेशनल म्यूज़िक प्रोग्राम 500 रुपए में पेश किया था.इस तरह प्रभात चटर्जी, मनोज चटर्जी, प्रदीप चटर्जी और संजय चटर्जी भाइयों ने की शुरुआत. अगले 30 साल तक अपनी कला के प्रदर्शन से कई युवाओं को गायक और संगीतकार बना दिया.उसी दौरान आईटीसी कंपनी ने अपने प्रचार के लिए ग्रुप को दो साल के लिए सारे देश में कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए अनुबंधित कर लिया था. उसके बाद चटर्जी ब्रदर्स का जादू सारे देश में गूंज गया था.ग्रुप ने राजस्थान के लगभग हर शहर में कार्यक्रम पेश किया.वे सीएम शिवराज सिंह चौहान के गांव बुधनी में भी अपने कार्यक्रम की प्रस्तुतियां दे चुके हैं. प्रभात दा की बस अब इतनी-सी ख्वाहिश है कि वे एक बार फिर चटर्जी ऑर्केस्ट्रा को उसी रूप में देखना चाहते हैं.

सेलिब्रिटी स्टेटस
चटर्जी ग्रुप की लोकप्रियता का आलम ये था कि प्रभात दा को शहर में सेलिब्रिटी स्टेटस हासिल था. दादा ज्यादातर अकॉर्डियन बजाया करते थे.उनके संगीत सफर में कई कलाकारों ने नाम कमाया. इनमें कुछ खास हैं. सबसे छोटे भाई संजय चटर्जी जिन्होंने भजन सम्राट अनूप जलोटा के साथ लगभग 20 साल गिटार पर संगत की. गिरीश विश्वा ने रिदम के मामले में सारी दुनिया में नाम कमाया.राजू कुलपारे सेक्सोफोन के वरिष्ठ और लोकप्रिय कलाकार हैं. सारिका सिंह इंडियन आइडल में फाइनलिस्ट रही हैं.

गणेशोत्सव का दौर
इंदौर में जब कपड़ा मिलें चालू थीं तब गणेशोत्सव के दौरान कव्वाली के अलावा मुख्य कार्यक्रम आर्केस्ट्रा होता था.इन कार्यक्रमों में सड़कों पर इतनी भीड़ उमड़ती थी कि चारों तरफ से रास्ते ब्लॉक हो जाते थे.कई लोग फिल्म का आखिरी शो देखकर पहुंचते और रातभर संगीत का लुत्फ लेते थे.चटर्जी ब्रदर्स को श्रेय हासिल है कि इन्होंने आम आदमी और उस दौर की युवा पीढ़ी को सरल और सुगम संगीत के जरिये मौसिक़ी से जोड़ा.

देवी अहिल्या की नगरी में
देवी अहिल्या की नगरी इंदौर के बारे में कहा जाता है कि यहां न कोई अनाथ रहता है न ही कोई भूखा सोता है.इसलिए प्रशासन इस कलाकार की ज़िंदगी फिर से संवारने और उनकी बेरंग ज़िंदगी में फिर से रंग भरने की कोशिश कर रही है. मुफलिसी के अंधेरे में गुम प्रभात की खबर विधायक रमेश मेंदोला ने भी ली है. वे भी मदद के लिए आगे आए हैं.
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