OPINION : 'ताई' के लिए मिशन 2019 की राह का रोड़ा बन गए हैं 'भाई'

आकाश चुनाव जीतते हैं तो इंदौर लोकसभा की 8 में से दो सीटों पर कैलाश का कब्ज़ा है. लोकसभा चुनाव में महाजन को ही टिकट मिलता है तो उनकी हार- जीत में अहम रोल इन दो सीटों का होगा

Jayshree Pingle | News18 Madhya Pradesh
Updated: November 10, 2018, 8:32 AM IST
OPINION : 'ताई' के लिए मिशन 2019 की राह का रोड़ा बन गए हैं 'भाई'
सुमित्रा महाजन (फाइल फोटो)
Jayshree Pingle | News18 Madhya Pradesh
Updated: November 10, 2018, 8:32 AM IST
भाजपा की शीर्ष राजनीति में इंदौर के ये दोनों नेता ख़ासा नाम रखते हैं, लेकिन एक इंदौरी जुमले ने उनकी एक दूसरी पहचान भी बना दी है वो है ताई और भाई की लड़ाई. बात स्पीकर सुमित्रा महाजन और भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री कैलाश विजयवर्गीय की हो रही है.ही अपने दोनों ही घरेलू मैदान इंदौर में एक दूसरे के आमने –सामने हैं.

पिछले दो दशक से वचर्स्व की ये लड़ाई जारी है. 9 विधानसभा और 22 लाख वोटर्स का इंदौर, शह- मात का ये खेल देख रहा है. इस बार भी ताई की तमाम नाराज़गी के बाद भी कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे आकाश विजयवर्गीय को टिकट दिलाने में कामयाब हो गए हैं. और ताई के बेटे – बहू का नाम टिकट की सिर्फ दावेदारी तक सिमट कर रह गया. पिछले तीन दशक से इंदौर लोकसभा की नुमाइंदगी करने वाली महाजन अपने एक भी समर्थक को विधानसभा का टिकट नहीं दिलवा पाई हैं.

सीट छोड़ने का गणित

विधानसभा टिकट को लेकर हुए ताई- भाई के विवाद को राजनीतिक हलकों में 2019 के चुनाव संदर्भ में देखा जा रहा है. लगातार 8 बार लोकसभा चुनाव जीतने वाली महाजन की उम्र 75 पार हो चुकी है. ऐसे में प्रत्याशी बदला जाता है तो कैलाश अपने को दिल्ली की राजनीति में ले जाना चाहते हैं. ऐसे में वे मज़बूत दावेदार बन कर सामने आ सकते हैं. यानि बेटे को टिकट दिलवाकर अपनी सीट छोड़ने वाले कैलाश अब महाजन के लिए एक तरह से चुनौती बन गए हैं.

खूटे से बंधी गाय

क्या कैलाश ताई पर भारी पड़े हैं? इसके जवाब में दोनों की राजनीतिक शैली का आंकलन करना होगा. ताई संघ-भाजपा संगठन की अनुशासित राजनेता के बतौर जानी जाती हैं. वे कहती भी हैं कि मैं तो संगठन के खूंटे से बंधी हुई गाय हूं. वहीं कैलाश एक दबंग और अपनी शर्तों पर राजनीति करने वालों में जाने जाते हैं. मौका आने पर कई बार वे अपनी ताकत दिखा चुके हैं. संगठन में अपनी बात मनवाने के लिए उन्होंने एक बार विधायक पद से इस्तीफे की पेशकश तक कर दी थी. भाजपा की ही सरकार में जब पटवा मुख्यमंत्री थे तब मुख्य सचिव निर्मला बुच के खिलाफ उन्होंने मोर्चा खोल दिया था.

स्वयंभू राजनीति
Loading...
ताई हमेशा कैलाश की स्वयंभू राजनीति के खिलाफ मोर्चा खोलती रहीं. संगठन तक अपनी बात पहुंचाती रहीं और आखिर में संगठन जो तय कर दे उसको अनुशासन मान कर स्वीकार करती रहीं. इंदौर के महापौर पद को लेकर ताई – भाई का झगड़ा अभी पुराना नहीं हुआ है जब महाजन ने सांसद पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी थी. लेकिन संगठन का फैसला कैलाश के साथ रहा और ताई को अपना दावा छोड़ना पड़ा.

एक भी कैबिनेट मंत्री नहीं

आख़िर इस राजनीतिक टकराहट के मायने क्या हैं? भाजपा के शीर्ष स्तर पर देखें तो इसके कोई मायने नहीं है. लेकिन भाजपा के घरेलू फ्रंट पर आम कार्यकर्ता दोनों पावर सेंटर्स को साधते – साधते अपनी राजनीति महात्वाकांक्षा को पूरा करने में लगा हुआ है. इस आपसी खींचतान का ही असर है कि प्रदेश की आर्थिक राजधानी होने के बावजूद शिवराज कैबिनेट में इंदौर का एक भी मंत्री नहीं है. जबकि यहां के 9 विधानसभा क्षेत्रों में से 8 पर भाजपा विधायक हैं.

सीएम का सीधा हस्तक्षेप

ताई –भाई की टकराहट का परिणाम है कि यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का सीधा हस्तक्षेप हो गया है. उनके सीधे समर्थन से टिकट तय हुए हैं. इंदौर की 9 सीटों में से एक भी टिकट सुमित्रा महाजन की पसंद से नहीं दिया गया. वे अपने बेटे मंदार महाजन और बहू स्नेहल महाजन में से किसी को भी टिकट नहीं दिलवा पाई हैं. उनके समर्थक गोपी नेमा, अंजू माखिजा भी दौड़ से बाहर रह गए.

कैलाश को फायदा

कैलाश इस फायदे में रहे कि उनका बेटा चुनावी राजनीति में एंट्री कर गया. हालांकि उन्हें अपने खुद का टिकट छोड़ना पड़ा. लेकिन अगर दूसरे नज़रिए से देखें तो कैलाश पिछले कुछ समय से खुद को प्रदेश की राजनीति से ऊपर ले जा चुके हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के साथ उनकी खींचतान के कारण उन्होंने न सिर्फ मंत्री पद छोड़ा बल्कि खुद को संगठन की राजनीति में झोंका है.

दूसरी बार खोया

यह दूसरा मौका है जब भाई को ताई के साथ लड़ाई में कुछ खोना पड़ा हो. दस साल पहले जब उन्होंने अपने खास सहयोगी रमेश मेंदोला के लिए पार्टी से टिकट मांगा था तब उन्हें अपना परंपरागत गढ़ इदौर का विधानसभा का क्षेत्र क्रं. 2 खोना पड़ा. ताई इस बात के लिए अड़ गई थीं कि एक ही लोकसभा क्षेत्र वो भी शहरी क्षेत्र में दो सीटें कैलाश को नहीं दी जा सकतीं. आखिर वे ग्रामीण महू विधान सभा पहुंच गए जो कांग्रेस का गढ़ रहा. और बाद में यह सीट परिसीमन के बाद धार लोकसभा में चली गई. इसका मलाल कैलाश को हमेशा बना रहा.

सुरक्षित गढ़ चाहते थे

इस बार भी कैलाश अपने बेटे के लिए अपने सुरक्षित गढ़ क्षेत्र क्रं. 2 से टिकट चाहते थे. लेकिन यह संभव नहीं हुआ. उनके खास समर्थक मेंदोला यहां से विधायक हैं. पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों से चुनाव जीतने का रेकार्ड भी मेंदोला के नाम है. ऐसी खबरें आती रहीं कि मेंदोला अपनी सीट नहीं छोड़ना चाहते. इसलिए क्षेत्र क्रमांक 3 से आकाश को टिकट दिया गया.

कैलाश का दो सीटों पर कब्ज़ा

आकाश चुनाव जीतते हैं तो इंदौर लोकसभा की 8 में से दो सीटों पर कैलाश का कब्ज़ा है. लोकसभा चुनाव में महाजन को ही टिकट मिलता है तो उनकी हार- जीत में अहम रोल इन दो सीटों का होगा. कैलाश या मेंदोला क्या ताकत रखते हैं इसका ट्रेलर 2009 के चुनाव हैं. जब महाजन के खिलाफ कैलाश के गढ़ में बगावत हो गयी थी, हालांकि वे चुनाव तो जीत गई थीं लेकिन ये किनारे वाली जीत थी.

ये भी पढ़ें - आख़िरी दिन रहा नामांकन का शोर : कोई खुश था, बाक़ी बाग़ी

VIDEO : विधानसभा अध्यक्ष ने 'दीदी' के पैर छूए तो आशीर्वाद मिला 'विजयी भव:'
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर