सियासी रंग में रंगा आदिवासियों का प्रणय पर्व ‘भगोरिया’, नेता जी लगा रहे हैं हाजिरी

नेता मेलों में पहुंचकर मतदाताओं से मेल-मुलाकात कर रहे हैं और आदिवासियों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं.

Arun Kumar Trivedi | News18 Madhya Pradesh
Updated: March 17, 2019, 5:08 PM IST
Arun Kumar Trivedi | News18 Madhya Pradesh
Updated: March 17, 2019, 5:08 PM IST
मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में आदिवासियों का प्रणय पर्व भगोरिया का उत्साह अपने चरम पर है. इस सांस्कृतिक पर्व के तहत लग रहे सभी मेले गुलजार नजर आ रहे हैं. इन मेलों में ढोल-मांदल और बांसुरी की तान पर युवक-युवतियों की टोलियां थिरकती नजर आ रहीं है. आदिवासी पर्व देखने के लिए देश और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंच रहे हैं. लोकसभा चुनाव को देखते हुए प्रमुख राजनीतिक दल भी इस बार पीछे रहना नहीं चाहते. वे मेलों में पहुंचकर मतदाताओं से मेल-मुलाकात कर रहे हैं और आदिवासियों को आकर्षित करने का प्रयास कर रहे हैं.

लोकसभा चुनाव की आचार संहिता के चलते भगोरिया मेलों की निगरानी इस बार खुफिया कैमरों से की जा रही है. शाम चार बजे तक ही मेला लगाने के निर्देश दिए गए हैं. इसके बाद पुलिस प्रशासन सभी को मेला स्थल से अपने घरों की ओर सुरक्षित जाने को कह रहा है. मेलों में हथियार ले जाना पूर्णतः प्रतिबंधित है पार्टी के झंडे और बैनर के साथ किसी राजनीतिक दल ने यदि भगोरिया मेले में गैर निकाली तो उसका तमाम व्यय चुनावी खर्चे में जोड़ा जाएगा. प्रशासन मेले में सेल्फी पाइंट बनाकर लोगों से वोट डालने की अपील कर रहा है. अलीराजपुर के कलेक्टर शमीम उद्दीन का कहना है कि भगोरिया में बड़ी संख्या में लोग शामिल होने पहुंचते हैं और मतदान के लिए प्रेरित करने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता है.

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क्या है भगोरिया पर्व-

बता दें कि भगोरिया हाट-बाजारों में युवक-युवती बेहद सजधज कर अपने भावी जीवनसाथी को ढूंढने आते हैं. इनमें आपसी रजामंदी जाहिर करने का तरीका भी बेहद निराला होता है. सबसे पहले लड़का, लड़की को पान खाने के लिए देता है यदि लड़की पान खा ले तो हां समझा जाता है. इसके बाद लड़का, लड़की को लेकर भगोरिया हाट से भाग जाता है और दोनों विवाह कर लेते हैं. इसी तरह यदि लड़का, लड़की के गाल पर गुलाबी रंग लगा दे और जवाब में लड़की भी लड़के के गाल पर गुलाबी रंग मल दे तो भी रिश्ता तय माना जाता है.

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रियासत काल से चली आ रही है परंपरा-रियासत काल से ही ये पारंपरिक त्योहार मनाने की परम्परा चली आ रही है. इसे मनाने के पीछे अलग-अलग मान्यताएं हैं. कुछ लोग इसे प्रणव पर्व भी मानते हैं. उनका कहना है कि आदिवासी युवक मेले में अपनी प्रेयसी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखता है, स्वीकार होने पर उसे भगा ले जाता है. इसीलिए पर्व का नाम भगारिया पड़ा. हालांकि, आदिवासी संगठन इससे इनकार करते हैं उनका कहना है कि भगोरिया रबी की अच्छी फसल आने के बाद होली पर मनाया जाने वाला पर्व है. ये पंजाब में मनाए जाने वाले लोहड़ी पर्व की तरह है इसका विवाह या भागने से कोई लेना-देना नहीं है.

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‘जयस’ दिखा रही है ताकत-

आदिवासी इस पर्व को भौंगर्या भी कहते हैं लेकिन इस बार आम चुनाव के सियासी माहौल में शुरू हुए भगोरिया में बगावत के रंग घुल गए हैं. ये बगावत लोकसभा सीटों के अधिकार को लेकर शुरू हुई है. अंचल के युवाओं का संगठन जय आदिवासी युवा शक्ति मदमाते रंगों से उत्सव के जरिए अपनी ताकत को एकजुट करने में जुट गया है. भगोरिया के पहले ही दिन एक तीर एक कमान, आदिवासी एक समान के नारे फिर से बुलंद कर दिए हैं. जय आदिवासी युवा संगठन के झाबुआ, धार, खरगोन और बैतूल सीट पर अपना दावा ठोंकने से कांग्रेस के सामने संकट खड़ा हो गया है तो वहीं बीजेपी भी जयस के बढ़ते जनाधार से परेशान नजर आ रही है.

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