विश्व रेडियो दिवसः 'दिल के मरीज कमेंट्री न सुने तो ही बेहतर है'

धर्मयुग के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती की राय उनके बारे में यह थी कि सुशील दोषी ने क्रिकेट के बहाने हिन्दी की बहुत बड़ी सेवा की है और वे जितने बड़े सेवक क्रिकेट के हैं, उससे बड़े सेवक हिन्दी के हैं.

Manoj Khandekar | News18Hindi
Updated: February 13, 2018, 11:06 PM IST
विश्व रेडियो दिवसः 'दिल के मरीज कमेंट्री न सुने तो ही बेहतर है'
धर्मयुग के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती की राय उनके बारे में यह थी कि सुशील दोषी ने क्रिकेट के बहाने हिन्दी की बहुत बड़ी सेवा की है और वे जितने बड़े सेवक क्रिकेट के हैं, उससे बड़े सेवक हिन्दी के हैं.
Manoj Khandekar | News18Hindi
Updated: February 13, 2018, 11:06 PM IST
"जिन लोगों को दिल की बीमारी हैं, वो कमेंट्री न सुनें तो बेहतर है, क्योंकि उनके डॉक्टर उन्हें यह सलाह दे रहे होंगे कि सिर चढ़कर हावी हो रहा ये रोमांच उनके दिल के लिए हानिकारक साबित हो सकता है.' हिंदी क्रिकेट कमेंट्री के पर्याय बन चुके सुशील दोषी कुछ इसी अंदाज में रेडियो कमेंट्री करते हैं. वह जब माइक्रोफोन थामते हैं तो हर किसी की धड़कन थम सी जाती है.

पद्मश्री से नवाजे गए सुशील दोषी ने अपने रूहानी अंदाज में क्रिकेट प्रेमियों के दिल में कई दशकों तक राज किया हैं. सुशील दोषी अभी भारत और दक्षिण अफ्रीका सीरीज के लिए रेडियो पर कमेंट्री कर रहे हैं.  विश्व रेडियो दिवस पर न्यूज18 आपको बता रहा है सुशील दोषी से जुड़ी कुछ अनसुनी बातें.

क्रिकेट तो अंग्रेजों का खेल है
आजादी के पहले के इंदौर को भारतीय क्रिकेट का मक्का कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगा. मुश्ताक अली और सीके नायडू के इसी शहर से एक ऐसी आवाज निकली जिसने पूरी दुनिया में अपना डंका मचाया.

सुशील दोषी ने क्रिकेट की कमेंट्री हिन्दी में शुरू की तब लोग उन पर हंसते थे. उन पर यह कहकर कटाक्ष किया जाता था कि क्रिकेट तो अंग्रेजों का खेल है. उसकी कमेंट्री हिन्दी में कैसे होगी? लेकिन जब सुशील दोषी ने हिन्दी में अपने शब्द और अपनी शैली विकसित कर ली तब उनके नाम का डंका बजाने लगा.

जितने बड़े सेवक क्रिकेट के हैं, उससे बड़े सेवक हिन्दी के हैं
धर्मयुग के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती की राय उनके बारे में यह थी कि सुशील दोषी ने क्रिकेट के बहाने हिन्दी की बहुत बड़ी सेवा की है और वे जितने बड़े सेवक क्रिकेट के हैं, उससे बड़े सेवक हिन्दी के हैं.



इंदौर के होलकर क्रिकेट स्टेडियम के कमेंट्री बॉक्स का नाम सुशील दोषी के नाम पर रखा गया है. वो ऐसा सम्मान है जो बिरले ही लोगों को नसीब हुआ हैं.

दो दिन तक स्टेडियम के बाहर इंतजार
उनके लिए इस मुकाम तक पहुंचना आसान नहीं था. एक मीडिया इंटरव्यू में सुशील दोषी ने पुराने दिनों को याद करते हुए कहा था कि साल 1957-58 में रिची बेनो के नेतृत्व में ऑस्ट्रेलियाई टीम भारत के दौरे पर आई थी. उस वक्त उनकी उम्र करीब 14 साल थी. उन्होंने पिता के सामने भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच ब्रेबोर्न स्टेडियम में टेस्ट मैच देखने की इच्छा जाहिर की थी.

नौ वर्ल्ड कप में कमेंट्री
पिता उन्हें लेकर मुंबई पहुंच गए, लेकिन समस्या यह खड़ी हो गई कि स्टेडियम के भीतर कैसे जाए. दो दिन तक पिता और बेटा स्टेडियम के बाहर ही चक्कर लगाते रहे. तीसरे दिन पिता ने किसी तरह पुलिसकर्मी से गुजारिश की तो उसने केवल सुशील दोषी को अंदर जाने की अनुमति दी थी. सुशील दोषी का 14 साल की उम्र में क्रिकेट से शुरू हुआ जुड़ाव अब तक जारी है.

सुशील दोषी अब तक 400 से ज्यादा वनडे और 85 टेस्ट मैचों की कमेंट्री कर चुके हैं. उन्हें नौ वर्ल्ड कप (50 ओवर के पांच और चार टी20 वर्ल्ड कप) में भी कमेंट्री करने का गौरव हासिल हुआ हैं.
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