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मध्यप्रदेश में नहीं दिख रही कोई लहर, आज जनता करेगी मतदान

मध्यप्रदेश में नहीं दिख रही कोई लहर, आज जनता करेगी मतदान

सांकेतिक तस्वीर

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मध्यप्रदेश में कांग्रेस, बीएसपी, एसपी और गोंडवाना गणतंत्र के साथ गठबंधन करने में असफल रही. खंडित जनादेश की स्थिति में, क्षेत्रीय ताकतें, किंग या किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं.

    मध्यप्रदेश में बुधवार को विधानसभा चुनाव के लिए मतदान किया जाएगा. सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के कामों का हवाला देकर चुनावों में उतरी है. समीक्षकों का मानना है कि राज्य में मोदी या कोई अन्य लहर नजर नहीं आ रही है.

    राज्य में शिवराज सिंह चौहान एंटी इनकंबेंसी का सामना कर रहे हैं, हालांकि वह अपने कल्याणकारी योजनाओं के बलबूते एक बार फिर से सत्ता में आने का दावा कर रहे हैं. संबल योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, लाडली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना समेत अन्य योजनाओं के आधार पर बीजेपी को उम्मीद है कि वह फिर से बाजी मार ले जाएगी.

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    चौहान ने न सिर्फ साल 2008 और साल 2013 के विधानसभा चुनाव में जीत कर पार्टी की मदद की बल्कि नगर निकाय और पंचायत चुनावों में भी बीजेपी का झण्डा बुलंद रखा. शिवराज, मध्यप्रदेश में 'मामा' के नाम से प्रचलित हैं. चौहान राज्य को कथित बीमारू राज्य की हालत से बाहर लाने का दावा करते हैं. चौहान ने कृषि क्षेत्र में 'असाधारण' विकास को ज्यादा प्रचारित किया. हालांकि व्यापम सरीखे घोटालों के चलते राज्य की शिवराज सरकार पर तमाम आरोप भी हैं.

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    वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह विधानसभा चुनाव अभी या कभी नहीं सरीखा बन गया है. दिग्विजय सिंह, रामेश्वर नेखरा और महेश जोशी जैसे सीनियर नेताओं ने इस बार सलाहकार की भूमिका निभाई है, जबकि कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेताओं ने अभियान प्रभारी का नेतृत्व किया.

    कांग्रेस व्यापम, ई-टेंडर और बिजली घोटालों को लेकर जनता के बीच गई. कांग्रेस अध्यक्ष ने राज्य में किसान आत्महत्या के लिए शिवराज सरकार पर निशाना साधा. राहुल गांधी ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी राज्य में सत्ता में आने के 10 दिनों के भीतर कृषि ऋण माफ कर देगी. माना जा रहा है कि कांग्रेस द्वारा ऋण माफी की घोषणा से बीजेपी को कड़ी टक्कर मिल रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत बीजेपी नेताओं ने कांग्रेस के इस वादे को झूठा बताया है.

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    हालांकि मध्यप्रदेश में किसानों की आत्महत्या के मामले ज्यादा सामने आए हैं, ऐसे में यह वादा काफी मायने रखता है. दूसरी ओर मतदाताओं ने अब तक कोई स्पष्ट इशारा नहीं किया है कि उनका झुकाव किस ओर है.

    आरक्षण और कोटा के मुद्दे ने 2 अप्रैल दलित महाबंद के बाद राज्य को बुरी तरह प्रभावित किया है. इससे ऊपरी जातियों के सदस्यों में, खासतौर से ग्वालियर-चंबल और विंध्य क्षेत्रों में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली. सपाक्स के अस्तित्व में आने के बाद लड़ाई टक्कर वाली हो गई है. हालांकि बीजेपी की कोशिश से आंदोलन चुनाव से पहले खत्म हो गया. दूसरी ओर कई सीटों पर आरक्षण से जुड़ी भावनाएं मतदान परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं, खासकर जहां सपाक्स ने शक्तिशाली उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.

    विभाजित विपक्ष के चलते चुनाव की परिस्थिति में बदलाव आया है क्योंकि कांग्रेस, बीएसपी, एसपी और गोंडवाना गणतंत्र के साथ गठबंधन करने में असफल रही. खंडित जनादेश की स्थिति में, क्षेत्रीय ताकतें, किंग या किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं. राज्य में मतदाता स्थानीय मुद्दों, उम्मीदवार की छवि और उनके बीच मौजूदगी को ध्यान में रखकर मतदान कर सकते हैं, ऐसे में यह लड़ाई हर सीट पर प्रत्याशी बनाम प्रत्याशी के बीच की होगी.

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    Tags: BJP, Congress, Jyotiraditya Madhavrao Scindia, Kamal nath, Madhya Pradesh Assembly Election 2018, Madhya pradesh news, Shivraj singh chouhan

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