ANALYSIS: कंधे पर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी, लेकिन अपनी ही सीट बचाने में उलझे राकेश सिंह

Ashutosh Nadkar | News18 Madhya Pradesh
Updated: April 27, 2019, 12:02 PM IST
ANALYSIS: कंधे पर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी, लेकिन अपनी ही सीट बचाने में उलझे राकेश सिंह
फाइल फोटो

प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राकेश सिंह के कंधों पर पूरे राज्य में बीजेपी की जीत की जिम्मेदारी है, लेकिन अध्यक्ष महोदय हैं कि जबलपुर लोकसभा की जद से बाहर ही नहीं निकल सके हैं.

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अप्रैल के महीने में ही मध्य प्रदेश में पारा 46 को पार कर गया है. लेकिन चुनावी गर्मी सूरज को भी मात देती दिखाई दे रही है. विधानसभा चुनाव नतीजों को बाद मध्य प्रदेश की राजनीतिक फिजां काफी बदली हुई दिखाई दे ही रही है. पिछली लोकसभा में 29 में से 27 सीटें फतह कर क्लीन स्वीप करने वाली बीजेपी के लिए इस बार राह आसान नहीं है. मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. खुद अपनी परंपरागत सीट अपने बेटे को सौंपकर कमलनाथ पूरे प्रदेश में कांग्रेस का झंडा बुलंद कर रहे हैं. कमलनाथ ने भोपाल जैसी सीट पर दिग्विजय सिंह को उतारकर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है.

कांग्रेस के अध्यक्ष जहां पार्टी को जिताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हैं, वहीं बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह इस बार अपनी ही सीट पर सिमटे दिखाई दे रहे हैं. वैसे तो बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष जबलपुर सीट से जीत की हैट्रिक बना चुके हैं. लेकिन शायद इस बार वे भी जानते हैं कि संसद की राह आसान नहीं है.  जबलपुर सीट को बीजेपी की अयोध्या के तौर पर देखा जाता है.  शायद इसीलिए राकेश सिंह ने पहले चुनाव में विश्वनाथ दुबे को शिकस्त दी, दूसरी बार रामेश्वर नीखरा को हराया और पिछले चुनाव में विवेक तन्खा को भी उनके सामने हार का सामना करना पड़ा. लेकिन इस बार टक्कर कांटे की दिखाई दे रही है.

प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राकेश सिंह के कंधों पर पूरे राज्य में बीजेपी की जीत की जिम्मेदारी है, लेकिन अध्यक्ष महोदय हैं कि जबलपुर लोकसभा की जद से बाहर ही नहीं निकल सके हैं. खुद प्रधानमंत्री मोदी को भी अपने प्रदेश अध्यक्ष के लिए वोट मांगने के लिए जबलपुर में सभा करनी पड़ी.

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वैसे 2004 के लोकसभा चुनाव में जबलपुर सीट से जब राकेश सिंह का नाम सामने आया तो ये एक चौंकाने वाला नाम था, क्योंकि राकेश सिंह ने इससे पहले कोई भी चुनाव नहीं लड़ा था. जाहिर है कि जिस शख्स ने कभी पार्षद तक का चुनाव न लड़ा हो उसे संसद का टिकट मिलना किसी लाटरी के लगने से कम नहीं था.

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पिछले 15 सालों से प्रदेश की सत्ता पर काबिज रही बीजेपी को इस बार विधानसभा चुनाव में हार का सामना भी राकेश सिंह के नेतृत्व में ही करना पड़ा. विधानसभा चुनाव में हार की वजह गलत टिकट वितरण भी मानी गई थी. जाहिर है कि इसकी आंच प्रदेश अध्यक्ष पर भी आती है.
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असल में एक प्रदेश अध्यक्ष के रूप में राकेश सिंह अपनी कार्यशैली से अब तक कोई विशेष प्रभाव नहीं छोड़ सके हैं. इससे पहले मध्य प्रदेश में नंदकुमार चौहान, नरेन्द्र् सिंह तोमर और प्रभात झा जैसे नेता शिवराज सरकार के दौरान प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं. इन तीनों ही नेताओं की कार्यकर्ताओं के बीच गहरी पैठ थी, जबकि राकेश सिंह अब तक अपनी प्रदेश कार्यकारिणी भी घोषित नहीं कर सके हैं और पिछले अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की टीम से ही काम चला रहे हैं. जाहिर है कि एक प्रदेशाध्यक्ष के रूप में राकेश सिंह के पास पूर्ववर्ती प्रदेश अध्यक्षों जैसा फ्री हैंड भी नहीं है.

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राकेश सिंह जबलपुर सीट से ही जीतते आए हैं. उनका प्रभाव भी जबलपुर और महाकौशल इलाके तक ही सीमित समझा जाता है. पश्चिमी मध्य प्रदेश यानि मालवा, निमाड़ में उनकी कोई विशेष पहचान ही नहीं है, जबकि बुंदेलखंड, विंध्य जैसे इलाकों पर भी उनकी पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है.

राकेश सिंह प्रदेश बीजेपी के अध्यक्ष भले ही बना दिए गए हों लेकिन प्रदेश के कद्दावर नेताओं में अब भी उनकी गिनती नहीं होती. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, नरेन्द्र सिंह तोमर, कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल, नरोत्तम मिश्र, गोपाल भार्गव जैसे कई नेता हैं जो न केवल उनसे वरिष्ठ हैं बल्कि उनका राजनीतिक कद भी ऊंचा है.

अगर जबलपुर की स्थानीय राजनीतिक की बात करें तो पूर्व मंत्री अजय विश्नोई, प्रदेश महामंत्री विनोद गोटिया और अशोक रोहाणी से उनकी अदावत भले ही न रही हो, लेकिन इन लोगों से पटरी न बैठ पाना भी परेशानी की वजह बन सकती है.

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First published: April 27, 2019, 10:16 AM IST
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